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हाईकोर्ट : मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बिल्डर की जमानत खारिज, मामला ईडी की ओर से दर्ज ईसीआईआर से जुड़ा

Sat, 19 Sep 2026 06:11 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 19 Sep 2026 06:11 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 126.30 करोड़ रुपये की कथित मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गाजियाबाद निवासी आरोपी बिल्डर अनिल मिठास की जमानत अर्जी खारिज कर दी है।

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Builder bail plea rejected in money laundering case; matter linked to ECIR registered by the ED.
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 126.30 करोड़ रुपये की कथित मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गाजियाबाद निवासी आरोपी बिल्डर अनिल मिठास की जमानत अर्जी खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की एकल पीठ ने दिया है। मामला प्रवर्तन निदेशालय की ओर से दर्ज प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) से संबंधित है। इसमें धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा-तीन और चार के तहत कार्रवाई की गई है। ईसीआईआर 23 दिसंबर 2024 को लखनऊ में दर्ज हुई थी। अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने अरन्या प्रोजेक्ट में 1,468 यूनिट के लिए घर खरीदारों से 522.90 करोड़ रुपये एकत्र किए थे जबकि केवल 35 खरीदारों को कब्जा दिया गया। ऑडिट रिपोर्ट में 107 करोड़ रुपये के डायवर्जन की बात सामने आई थी।

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ईडी ने कोर्ट को बताया कि जांच में 126.30 करोड़ रुपये को अपराध से अर्जित आय के रूप में चिह्नित किया गया है। आरोप है कि यह रकम विभिन्न वित्तीय माध्यमों से आरोपी के नियंत्रण वाली कंपनियों में डायवर्ट की गई। ईडी ने आरोपी के खिलाफ कई आपराधिक मामलों और पूर्व में फरार रहने की कार्यवाही का भी हवाला दिया। बचाव पक्ष ने आरोपों से इन्कार करते हुए कहा कि आरोपी ने जांच में सहयोग किया है और कंपनी आर्थिक संकट के कारण प्रभावित हुई थी। कोर्ट ने कहा कि 126.30 करोड़ रुपये के डायवर्जन का आरोप स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट से समर्थित है और ट्रायल में देरी को देखते हुए जमानत देना उचित नहीं है। जमानत अर्जी खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट को मुकदमे का शीघ्र निस्तारण करने का निर्देश दिया।

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धन और हैसियत से न्याय में नरमी की धारणा खत्म होनी चाहिए

हाईकोर्ट ने आदेश में व्हाइट-कॉलर अपराधों की गंभीरता पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि कॉरपोरेट धोखाधड़ी, गबन और बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी से लोगों की पेंशन, बचत और आजीविका को भारी नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे अपराधों के मामले में केवल जुर्माना या ऐसी सजा पर्याप्त नहीं हो सकती जिसे कंपनियां कारोबार की लागत के रूप में वहन कर लें। कोर्ट ने कहा कि धन और सामाजिक हैसियत के कारण न्याय में किसी तरह की नरमी मिलने की धारणा को समाप्त किया जाना चाहिए। आर्थिक अपराधों के साथ भी कानून के तहत गंभीरता से निपटा जाना चाहिए।

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