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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Blacklisting a firm indefinitely is improper; Food Inspector's order quashed.

High Court : किसी फर्म को अनिश्चितकाल के लिए ब्लैकलिस्ट करना गलत, खाद्य निरीक्षक काआदेश रद्द

Wed, 08 Jul 2026 04:50 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 08 Jul 2026 04:50 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी फर्म या ठेकेदार को अनिश्चितकाल के लिए ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने भदोही स्थित मिश्रा राइस मिल को अनिश्चितकालीन अवधि के लिए काली सूची में डालने के आदेश को रद्द कर दिया।

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Blacklisting a firm indefinitely is improper; Food Inspector's order quashed.
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी फर्म या ठेकेदार को अनिश्चितकाल के लिए ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने भदोही स्थित मिश्रा राइस मिल को अनिश्चितकालीन अवधि के लिए काली सूची में डालने के आदेश को रद्द कर दिया।

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प्रोपराइटर अनिल मिश्रा की याचिका के मुताबिक मिर्जापुर के क्षेत्रीय खाद्य नियंत्रक (विंध्याचल मंडल) ने 25 अगस्त 2023 को आदेश जारी कर मिश्रा राइस मिल को धानक्रय और उसकी प्रक्रिया से अनिश्चितकाल के लिए प्रतिबंधित कर दिया था। यह कार्रवाई भदोही में दर्ज एक प्राथमिकी के आधार पर की गई थी।
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आरोप था कि संतोष कुमार शुक्ला नामक व्यक्ति ने जिला खाद्य आपूर्ति अधिकारी की लॉगिन आईडी और पासवर्ड का दुरुपयोग कर कई किसानों की पहचान फर्जी तरीके से सत्यापित की थी। मामले में याची फर्म का नाम भी सामने आया। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि अनिश्चितकालीन ब्लैकलिस्टिंग पूरी तरह अवैध है।

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कारण बताओ नोटिस पहले से ही पूर्वाग्रहग्रस्त मानसिकता से जारी किया गया था। आदेश में कोई ठोस कारण नहीं दिए गए और पूरा निर्णय केवल आरोप की गंभीरता के आधार पर लिया गया, जो किसी ठोस साक्ष्यों से समर्थित नहीं है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया। कहा कि किसी भी ठेकेदार या व्यापारी को हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट करना एक असंगत और अत्यधिक दंड माना जाता है, जब तक कि बेहद गंभीर कदाचार सिद्ध न हो जाए।

इसके साथ ही जब कारण-बताओ नोटिस में ही प्राधिकारी अपना निष्कर्ष पहले से तय कर लेता है तो बाद की पूरी प्रक्रिया एक खोखली औपचारिकता बनकर रह जाती है। कोर्ट ने खाद्य विभाग को स्वतंत्रता दी है कि वह चाहे तो कानून के अनुरूप नया कारण बताओ नोटिस जारी कर सकता है और नया आदेश पारित कर सकता है। 

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