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मौला की सदाओं के बीच मातमी जुलूस

Fri, 10 Jul 2015 01:58 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Fri, 10 Jul 2015 01:58 AM IST
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Between the doleful procession of Maula Sadaon
इलाहाबाद। पैगंबरे इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब के दामाद और पहले इमाम हजरत अली की शहादत की1396 वीं बरसी पर तीन दिनी गम का सिलसिला बृहस्पतिवार को पूरा हुआ। शहर में जगह-जगह मातमी जुलूस निकाले गए। पूरे दिन या अली मौला, हैदर मौला की सदाएं गूंजती रहीं। ताबूत का बोसा लेेने के लिए अकीदतमंदों में होड़ सी लगी रही।
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इमामबाड़ा आजम हुसैन खां रानीमंडी से कदीमी जुलूस निकाला गया। काला लिबास पहने नकाबपोश खवातीन सहित हजारों लोगों ने शिरकत की। जुलूस बच्चा जी की कोठी, चौक, कोतवाली, नखास कोहना, खुल्दाबाद, हिम्मतगंज होते हुए करबला पहुंचा। मजलिस के बाद शबीहे ताबूत हजरत इमाम अली निकाला गया। इसके आगे जायर हुसैन कज्जन व साथियों ने मरसिया पढ़ा। इससे पहले अंजुमन अब्बासिया के साहिबे बयाज डॉ.अबरार हुसैन, डॉ.बाकर कर्रार, मो. कलाम, असगर अब्बास, हुसैन मेंहदी, फैज जाफरी, जफर ने मासूम आजमी के पुरदर्द नौहे पढ़े। जुलूस में शकील, मुन्ना, कम्मू, मंजर कर्रार, डॉ.फाजिल हाशमी, कमर अब्बास, प्यारे, मेहंदी हसन, आलिम रिजवी समेत काफी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे। दूसरा बड़ा जुलूस इमामबाड़ा हुसैन अली खां से अंजुमन हाशमिया के नेतृत्व में निकला। काबे में विलादत होती है, मस्जिद में शहादत होती है, के नौहे के साथ जुलूस दरगाह इमाम हुसैन पहुंचकर पूरा हुआ। तीसरा बड़ा जुलूस इमामबाड़ा जददनमीर साहब दरियाबाद से अंजुमन मुहाफिजे अजा कदीम की सरपरस्ती में निकाला गया।
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दरगाह मौला अली प्रबंध समिति के अध्यक्ष सैयद अजादार हुसैन ने कहा कि आज दुनिया में इबादतगाहों के भीतर, बाहर हो रहे हमले निंदनीय हैं। इससे पहले अंजुमन गुंचाए कासिमिया की ओर से बक्शी बाजार स्थित मस्जिद काजीजी में सभी लाइट्स बुझाकर मौलाना रजी हैदर की इमामत में नमाज फाजिर अदा की गई। शबीहे ताबूत पर फूलों की चादर चढ़ाकर खिराजे अकीदत पेश की गई।
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शहादत हजरत अली पर बृहस्पतिवार को चक, जीरो रोड स्थित मोहम्मद जिया साहब के अजाखाने पर महिलाओं की मजलिस का आयोजन किया गया। इसे खिताब करते हुए सुरैया आब्दी ने हजरत अली की शहादत बयां की। बाद मजलिस महिलाओं ने शबीहे ताबूत मौला अली उठाया। इस मौके पर मशहूर नौहाख्वान रुखसार हुसैन ने अपनी पुरदर्द आवाज में मौला अली की याद में ‘जैनब की दुहाई पर तरस खाइये बाबा, मस्जिद में न लिल्लाह अभी जाइये बाबा’ सहित कई और नौहे पढ़कर सभी की आंखें नम कर दीं।
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