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Prayagraj News: बेलहासिंघामऊ गांव... देसी मिट्टी में उपजे पान के पत्तों से आई जिंदगी में हरियाली
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मुख्यालय से महज छह किमी की दूरी पर स्थित बेलहासिंघामऊ गांव के अंदर घुसते ही खेतों में बांस की बल्लियों के सहारे बने बाड़ आपको नजर आए जाएंगे। इन खेतों में गांव के करीब 52 परिवार पान उगाते हैं।
यहां की मिट्टी में उपजे बांग्ला, कपूरी और ककेर पान के पत्ते देश भर में मशहूर हैं। बांग्ला पान की डिमांड तो दिल्ली, कोलकाता और बंगलूरू तक है। जबकि कपूरी और ककेर के पत्ते वाराणसी और अन्य आसपास के जिले के व्यापारी खरीदकर ले जाते हैं। पान की खेती यहां के लोगों की जिंदगी में हरियाली लेकर आई है।
गांव के चौरसिया बस्ती के लगभग एक दर्जन परिवार के लोग जमींदारी व्यवस्था के समय से ही पान की खेती व व्यवसाय कर रहे हैं। देसी बांग्ला पत्ते के स्वाद ने कई शहरों में इस गांव को नई पहचान दी।
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वहीं, पान की खेती करने वाले किसानों ने बताया कि बच्चों ने पढ़ाई कर अलग-अलग शहरों में रोजगार तलाश लिया। कुछ सरकारी नौकरी में चले गए। अब ज्यादातर पुरनिये ही पान उगा रहे हैं। बेलहासिंघामऊ के चौरसिया बस्ती के जयचंद, लालचंद और चंद्रशेखर कोलकाता व दिल्ली में, गौरीशंकर राजपति, शंकर लाल, रामदेव मुंबई में पान की दुकान चलाते हैं। वह यहीं से पान मंगाकर व्यवसाय करते हैं। इसी की बदौलत बच्चों की अच्छी परवरिश कर रहे हैं।
बस्ती के वासुदेव चौरसिया, किशुन उर्फ बब्बू चौरसिया, गौरीशंकर चौरसिया जीतलाल चौरसिया समेत करीब 52 परिवारों के 1300 लोग चौरसिया बस्ती में रहते हैं। लेकिन नौकरी और अन्य व्यवसाय से जुड़कर लोग दूसरे शहरों में जा बसे। इस वजह से पान की खेती का दायरा सीमित होता गया। संवाद
इनसेट
शिक्षक और डॉक्टर भी निकले हैं बस्ती से
चौरसिया बस्ती से डॉक्टर और शिक्षक भी निकले हैं। जंगीलाल चौरसिया व शिव शंकर चौरसिया परिषदीय विद्यालय में शिक्षक हैं। डॉ. चंद्रेश चौरसिया चिकित्सक हैं। लेकिन आज भी इनके घर के पुरनिये अपनी दुकान चला रहे हैं। उन्होंने पुश्तैनी व्यवसाय को नहीं छोड़ा।
प्रधान बोले
कई बस्तियों में आपसी विवाद के चलते जल निकासी की समस्या बनी हुई है। प्रयास किया जा रहा है कि आपसी सहमति बनाकर जल निकासी के लिए नालियां बनवाई जाएं।
- ग्राम प्रधान क्षमानाथ सरोज
बाक्स
बेलहासिंघामऊ : एक नजर में
कुल आबादी - 9400
पुरुष- 6000
महिला- 3400
मुख्य व्यवसाय- खेती किसानी
जल निकासी की समस्या है
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यहां की मिट्टी में उपजे बांग्ला, कपूरी और ककेर पान के पत्ते देश भर में मशहूर हैं। बांग्ला पान की डिमांड तो दिल्ली, कोलकाता और बंगलूरू तक है। जबकि कपूरी और ककेर के पत्ते वाराणसी और अन्य आसपास के जिले के व्यापारी खरीदकर ले जाते हैं। पान की खेती यहां के लोगों की जिंदगी में हरियाली लेकर आई है।
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गांव के चौरसिया बस्ती के लगभग एक दर्जन परिवार के लोग जमींदारी व्यवस्था के समय से ही पान की खेती व व्यवसाय कर रहे हैं। देसी बांग्ला पत्ते के स्वाद ने कई शहरों में इस गांव को नई पहचान दी।
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वहीं, पान की खेती करने वाले किसानों ने बताया कि बच्चों ने पढ़ाई कर अलग-अलग शहरों में रोजगार तलाश लिया। कुछ सरकारी नौकरी में चले गए। अब ज्यादातर पुरनिये ही पान उगा रहे हैं। बेलहासिंघामऊ के चौरसिया बस्ती के जयचंद, लालचंद और चंद्रशेखर कोलकाता व दिल्ली में, गौरीशंकर राजपति, शंकर लाल, रामदेव मुंबई में पान की दुकान चलाते हैं। वह यहीं से पान मंगाकर व्यवसाय करते हैं। इसी की बदौलत बच्चों की अच्छी परवरिश कर रहे हैं।
बस्ती के वासुदेव चौरसिया, किशुन उर्फ बब्बू चौरसिया, गौरीशंकर चौरसिया जीतलाल चौरसिया समेत करीब 52 परिवारों के 1300 लोग चौरसिया बस्ती में रहते हैं। लेकिन नौकरी और अन्य व्यवसाय से जुड़कर लोग दूसरे शहरों में जा बसे। इस वजह से पान की खेती का दायरा सीमित होता गया। संवाद
इनसेट
शिक्षक और डॉक्टर भी निकले हैं बस्ती से
चौरसिया बस्ती से डॉक्टर और शिक्षक भी निकले हैं। जंगीलाल चौरसिया व शिव शंकर चौरसिया परिषदीय विद्यालय में शिक्षक हैं। डॉ. चंद्रेश चौरसिया चिकित्सक हैं। लेकिन आज भी इनके घर के पुरनिये अपनी दुकान चला रहे हैं। उन्होंने पुश्तैनी व्यवसाय को नहीं छोड़ा।
प्रधान बोले
कई बस्तियों में आपसी विवाद के चलते जल निकासी की समस्या बनी हुई है। प्रयास किया जा रहा है कि आपसी सहमति बनाकर जल निकासी के लिए नालियां बनवाई जाएं।
- ग्राम प्रधान क्षमानाथ सरोज
बाक्स
बेलहासिंघामऊ : एक नजर में
कुल आबादी - 9400
पुरुष- 6000
महिला- 3400
मुख्य व्यवसाय- खेती किसानी
जल निकासी की समस्या है