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Prayagraj : असम के बांसों को भा गई संगम नगरी की जलवायु, वन अनुसंधान केंद्र की नर्सरी में बांस की 42 प्रजातियां

Thu, 19 Sep 2024 06:46 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 19 Sep 2024 06:46 PM IST
सार

कृषि वानिकी को बढ़ावा देने वाले पारि-पुनर्स्थापन वन अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक आलोक यादव ने पांच वर्ष पहले बांस पर शोध शुरू किया। उन्होंने बताया कि बांस का प्रयोग संगीत वाद्ययंत्र, गुड़िया, खिलौने, मछली पकड़ने के जाल, कृषि उपकरण, बीज ट्रे, चटाई, शेड, पंडाल, नावों की छत, घर आदि बनाने में होता है।

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Bamboos of Assam liked the climate of Sangam city, 42 species of bamboo in the nursery of Forest Research Cen
असम प्रजाति के बांस। - फोटो : संवाद

विस्तार

पूर्वोत्तर राज्य असम में बांस की खेती सबसे अधिक होती है। अब वहां के सात प्रजातियों को संगम नगरी की जलवायु भा गई है। पांच वर्ष पहले वहां से लाए गए बांस के बीज और पाैधे अब यहां पर कोट बन गए हैं। वैज्ञानिकों ने उसकी ग्रोथ देखी तो किसानों को इसे लगाने के लिए प्रेरित किया। कई किसानों ने इसकी खेती भी शुरू कर दी है।

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कृषि वानिकी को बढ़ावा देने वाले पारि-पुनर्स्थापन वन अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक आलोक यादव ने पांच वर्ष पहले बांस पर शोध शुरू किया। उन्होंने बताया कि बांस का प्रयोग संगीत वाद्ययंत्र, गुड़िया, खिलौने, मछली पकड़ने के जाल, कृषि उपकरण, बीज ट्रे, चटाई, शेड, पंडाल, नावों की छत, घर आदि बनाने में होता है। इसके कुछ व्यंजन भी बनते हैं। इन सबके लिए असम के बांस का प्रयोग होता है। प्रदेश में होने वाले कटीले और लाठी बांस का उपयोग कम हैं।
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ऐसे में वह असम गए और वहां से लाॅगीपैथस, टूल्डा, डुलुआ, हैमलटोनाई, कछरैंसिस, ओलीवरी और पाॅलीमार्फा प्रजाति के बांसों के बीज और पाैधे लाए। इसके लिए पड़िला में एक एकड़ में नर्सरी बनाई। वहां पर लगाए गए बांस के बीज और पाैधे बेहतर चल गए। अब तक बेचने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने बताया कि टूल्डा बांस से हैंडीक्राफ्ट की वस्तुएं जैसे ज्वैलरी, गले का हार, गुलदस्ते, हाथ का चुल्ला आदि बनता है।
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इसके अलावा पेपर उद्योग में इसका प्रयोग है। इसी से अगरबत्ती भी बनती है। इसके अलावा पाॅलीमार्फा और ओलीवरी का प्रयोग फर्नीचर उद्योग में सबसे अधिक है। ओलीवरी ठोस बांस और बाढ़ वाले इलाकों में इसकी सबसे अधिक मांग है। इसके बारे में किसानों को बताया तो वह इसकी खेती करने के लिए बीज और पाैधे ले गए। इसके अलावा कई और देशी विदेशी प्रजाति के बंसों के बीज जुटाए। नर्सरी में उन्होंने 42 तरह के बांस लगाए हैं।


किसानों को आर्थिक समृद्ध बनाएगा बांस

उन्होंने बताया कि बांस की खेती में कम लागत से अधिक फायदा कमाया जा सकता है। फसलों के लिए अनुपयोगी या बाढ़ प्रभावित वाली जमीन में भी बांस की खेती अच्छी होती है। पांच वर्ष में बांस की तैयार हो जाता है। एक बार तैयार हो जाने पर नियमित उसे बेचते रहे। पारि-पुनर्स्थापन वन अनुसंधान केंद्र से लखीमपुर, बांदा, रायबरेली, मिर्जापुर आदि जिलों के किसान बांस के बीज और पाैधे ले गए। गंगापार और यमुनापार के भी कुछ किसानों ने इसकी खेती शुरू कर दी है।

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