Research : उल्कापिंड के टकराने से बना गांव, जमीन में मिले हीरे, इलाहाबाद विवि वैज्ञानिकों ने शोध में किया दावा
मध्य प्रदेश में ढाला एक जगह का नाम है, जहां यूरेनियम का भंडार है। इस क्षेत्र से यूरेनियम प्राप्त करने के लिए भारत सरकार के बड़े प्रोजेक्ट पर लंबे समय से काम चल रहा है। इविवि के भू एवं ग्रहीय विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक प्रो. जेके पति ने वर्ष 2005 में ही यह खोज कर ली थी कि ढाला उल्कापिंड संरचना है।
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एक दुर्लभ उल्कापिंड के टकराने से मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में 18 साल पहले ‘ढाला उल्कापिंड संरचना’ की खोज हुई थी। वैज्ञानिकों ने अब इस दुर्लभ उल्कापिंड का पता लगा लिया है। वर्ष 2005 में इस उल्कापिंड संरचना की खोज करने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के वैज्ञानिक प्रो. जेके पति ने लंबे शोध के बाद पाया कि यह संरचना यूरेलाइट नाम के उल्कापिंड के टकराने से बनी, जिसमें छोटे-छोटे हीरे भी मौजूद हैं।
मध्य प्रदेश में ढाला एक जगह का नाम है, जहां यूरेनियम का भंडार है। इस क्षेत्र से यूरेनियम प्राप्त करने के लिए भारत सरकार के बड़े प्रोजेक्ट पर लंबे समय से काम चल रहा है। इविवि के भू एवं ग्रहीय विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक प्रो. जेके पति ने वर्ष 2005 में ही यह खोज कर ली थी कि ढाला उल्कापिंड संरचना है, लेकिन यह पता नहीं लगाया जा सका था कि यह संरचना किस उल्लापिंड के टकराने से बनी।
इसके लिए बहुत ही महंगे और अत्याधुनिक उपकरणों की जरूरत थी। इस शोध में उनके साथ बर्न विश्वविद्यालय, स्विट्जरलैंड के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. आर्यावर्त आनंद जुड़े, जिन्होंने क्रोमियम-आयसोटोप सिस्टमैटिक्स प्रणाली का उपयोग करके उल्कापिंड की पहचान में सहयोग किया और शोध में पता चला कि ढाला उल्कापिंड संरचना का निर्माण एक अत्यधिक, दुर्लभ और आदिम प्रकार के धातुधारी उल्कापिंड ‘यूरेलाइट’ के टकराव से हुआ था।
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित लगभग 11 किमी व्यास वाली ढाला उल्कापिंड संरचना पृथ्वी पर सबसे प्राचीन (250-170 करोड़ वर्ष पूर्व) उल्कापिंड संरचनाओं में से एक है। यह भूमध्यसागरीय एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच अब तक की खोजी गई सबसे बड़ी उल्कापिंड संरचना है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह खोज पृथ्वी पर उल्कापिंडों के टकराव की घटनाओं एवं सौर मंडल के प्रारंभिक इतिहास के बारे में हमारी समझ में अभूतपूर्व बदलाव लाने के लिए तैयार है।
यह खोज हाल ही मेमीटोरिटिकल सोसाइटी, यूएसए की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘मीटियोरिटिक्स एंड प्लैनेटरी साइंस’ के मई 2023 अंक में प्रकाशित हुई है। शोध में पता चला है कि यूरेलाइट एक प्राचीन शैली का प्राथमिक एकॉन्ड्राइट का एक विशेष वर्ग है, जो पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी ज्ञात उल्कापिंडों का केवल एक छोटा सा अंश है। ये पथरीले उल्कापिंड ऑलिवाइन, पायरोक्सीन, सहित थोड़ी मात्रा में कार्बन (हीरा और अन्य बहुरूप), सल्फाइड, सिलिकेट आदि से बने होते हैं।
15 किमी प्रति सेकेंड की गति से टकराया था उल्कापिंड
प्रो. जेके पति बताते हैं कि शोध में यह तथ्य सामने आया है कि यूरेलाइट उल्कापिंड, जिसका व्यास संभवत: एक किमी था, असाधारण गति (15 किमी/सेकंड) से बुंदेलखंड क्रेटन की ग्रैनिटॉइड चट्टानों पर टकराया था, जिसके परिणामस्वरूप ‘ढाला उल्कापिंड संरचना’ का निर्माण हुआ। ढाला उल्कापिंड संरचना का व्यास 11 किमी और क्षेत्रफल 65 वर्ग किमी है।
अब भी रहस्य, कहां से आया उल्कापिंड
अब भी यह रहस्य बना है कि यह उल्कापिंड कहां से आया, लेकिन इस खोज ने दुनिया भर में उल्कापिंड एवं ग्रहीय विज्ञान के अनुसंधान क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण क्षण को चिह्नित किया है। इस खोज में शामिल वैज्ञानिक अनुज कुमार सिंह, (पृथ्वी एवं ग्रहीय विज्ञान विभाग, इविवि) ने बताया है कि ढाला उल्कापिंड संरचना को लेकर चल रहा शोध अभी जारी रहेगा। अब यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि यूरेलाइट उल्कापिंड मंगल और बृहस्पतिवार गृह के बीच घूम रहे उल्कापिंडों में से एक है या उल्कापिंड कहीं और से आया।