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कॅरियर संवारने में लड़खड़ा रहे किशोर
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 09 Feb 2016 12:24 AM IST
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कॅरियर संवारने में हजारों किशोर भले ही अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण पल गवां रहे हों, लेकिन इस उम्र में मिल रहा तनाव, अवसाद किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्तियों के तनाव से कम नहीं है। उनके तनाव, अवसाद में आने पर उनके अभिभावक न केवल कॅरियर काउंसलर का सहारा ले रहे बल्कि उपचार के लिए मनोचिकित्सकों के पास भी पहुंच रहे हैं। दस वर्षों में इसके आंकड़े कई गुना बढ़े हैं। मनोचिकित्सक इसकी मुख्य वजह प्रतिस्पर्धा सहित तमाम तरह के पारिवारिक और व्यक्तिगत कारणों को मानते हैं।
स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय के मनोचिकित्सा विभाग केअध्यक्ष प्रो.वीके सिंह कहते हैं कि आजकल जितना तनाव कंपनियों, सरकारी पदों, संस्थानों के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे व्यक्तियों में है, उन्हीं स्थितियों से अब किशोर गुजर रहे हैं। अवसाद की स्थिति से गुजरने वालों में ज्यादातर 17 से 19 वर्ष के हैं। किशोरों में पहले इतना तनाव नहीं था। मनोचिकित्सक केपास एक-दो किशोर ही अपनी समस्या लेकर आते थे, लेकिन अब यह आंकड़ा कई गुना तक बढ़ गया है। एक मनोचिकित्सक केपास आमतौर पर रोजाना आठ से 10 किशोरों की समस्याएं लेकर उनके अभिभावक पहुंच रहे हैं। उनकी हताशा का मुख्य कारण कॅरियर की चिंता है। हालांकि किशोरों में तनाव, अवसाद का कारण कभी-कभी घर से दूर रहना और बेहतर खान-पान न होना भी है।बावजूद इसके किशारों में कॅरियर को लेकर कई तरह की उम्मीदें हैं।
मनोचिकित्सक डॉ.अभिनव टंडन कहते हैं, रोजाना तकरीबन 10 से 12 अभिभावक उपचार के लिए अपने बच्चों को लेकर पहुंच रहे हैं। कई किशोर तो तनाव और अवसाद के अधिक बढ़ने और मनमाफिक सफलता न मिलने से आत्महत्या तक के अवसाद में मिले। हालांकि ऐसे मामले बहुत ही गिने-चुने हैं लेकिन जिन किशोरों में बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं रह जाती है, वे ऐसा कर ही बैठते हैं। एसआरएन के मनोचिकित्सक डॉ.अनुराग वर्मा कहते हैं कि तनाव बढ़ने का कारण है, कॅरियर को लेकर तेजी से बढ़ती प्रतिस्पर्धा है। आज एक-एक पद के लिए हजारों आवेदक हैं। ऐसे में अपना स्थान सुनिश्चित कर पाने की चिंता किशोरों को असमय और अकारण अवसाद के मुंह में धकेल रही है। कई बार माता-पिता अपने बच्चों का सही मूल्यांकन न करके उन पर अनावश्यक दबाव थोपते हैं, ऐसा करने से उन्हें बचना चाहिए।
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स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय के मनोचिकित्सा विभाग केअध्यक्ष प्रो.वीके सिंह कहते हैं कि आजकल जितना तनाव कंपनियों, सरकारी पदों, संस्थानों के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे व्यक्तियों में है, उन्हीं स्थितियों से अब किशोर गुजर रहे हैं। अवसाद की स्थिति से गुजरने वालों में ज्यादातर 17 से 19 वर्ष के हैं। किशोरों में पहले इतना तनाव नहीं था। मनोचिकित्सक केपास एक-दो किशोर ही अपनी समस्या लेकर आते थे, लेकिन अब यह आंकड़ा कई गुना तक बढ़ गया है। एक मनोचिकित्सक केपास आमतौर पर रोजाना आठ से 10 किशोरों की समस्याएं लेकर उनके अभिभावक पहुंच रहे हैं। उनकी हताशा का मुख्य कारण कॅरियर की चिंता है। हालांकि किशोरों में तनाव, अवसाद का कारण कभी-कभी घर से दूर रहना और बेहतर खान-पान न होना भी है।बावजूद इसके किशारों में कॅरियर को लेकर कई तरह की उम्मीदें हैं।
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मनोचिकित्सक डॉ.अभिनव टंडन कहते हैं, रोजाना तकरीबन 10 से 12 अभिभावक उपचार के लिए अपने बच्चों को लेकर पहुंच रहे हैं। कई किशोर तो तनाव और अवसाद के अधिक बढ़ने और मनमाफिक सफलता न मिलने से आत्महत्या तक के अवसाद में मिले। हालांकि ऐसे मामले बहुत ही गिने-चुने हैं लेकिन जिन किशोरों में बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं रह जाती है, वे ऐसा कर ही बैठते हैं। एसआरएन के मनोचिकित्सक डॉ.अनुराग वर्मा कहते हैं कि तनाव बढ़ने का कारण है, कॅरियर को लेकर तेजी से बढ़ती प्रतिस्पर्धा है। आज एक-एक पद के लिए हजारों आवेदक हैं। ऐसे में अपना स्थान सुनिश्चित कर पाने की चिंता किशोरों को असमय और अकारण अवसाद के मुंह में धकेल रही है। कई बार माता-पिता अपने बच्चों का सही मूल्यांकन न करके उन पर अनावश्यक दबाव थोपते हैं, ऐसा करने से उन्हें बचना चाहिए।
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