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तबस्सुम के हौसलों के आगे हार गईं मुश्किलें
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 17 Nov 2015 12:04 AM IST
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इलाहाबाद। कहते हैं हौसले अगर बुलंद हों और मन में कुछ करने की लगन हो तो मुश्किलें खुदबखुद आसां होती चली जाती हैं। फिर इससे फर्क नहीं पड़ता कि लोग क्या कहेंगे। ऐसे ही मजबूत इरादों के साथ तेलियरगंज की तबस्सुम शहर की पहली महिला ऑटोरिक्शा चालक बन गई हैं। ऑटो रिक्शा से शहर की सड़कें नापतीं तबस्सुम बानो उन महिलाओं के लिए मिसाल हैं, जो मुश्किलों के आगे हार जाती हैं।
तबस्सुम के हौसले और जज्बे के आगे मुश्किलें हार गईं। उन्होंने ई रिक्शा चलाने की शुरुआत की थी, अब वह शहर की पहली और अकेली ऑटो रिक्शा चालक बन गई हैं। बकौल तबस्सुम तब ई-रिक्शा लेकर निकलने पर लोग हैरत भरी नजरों से देखते थे लेकिन अब जिंदगी की मुश्किलों ने इतना मजबूत बना दिया है कि लोग क्या कहेंगे जैसे सवाल बेमानी हो गए हैं। आत्मनिर्र्भर बनने के लिए इज्जत और ईमानदारी से करने वाला हर काम सही है। मुश्किलें तो जिंदगी में आएंगी ही, उससे हारने से कुछ नहीं होगा। उसका सामना करते हुए महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करनी चाहिए।
जिंदगी की तमाम परेशानियों से जूझते हुए तबस्सुम ने जीवकोपार्जन के लिए लोगों की मदद से वर्ष 2014 में ई-रिक्शा खरीदकर आत्मनिर्भर बनने की शुरुआत की थी। उस वक्त भी वह शहर की अकेली ई-रिक्शा चालक थीं। अब दिन-रात की मेहनत के बाद वह ऑटोरिक्शा की मालकिन और चालक बन गई हैं। अपने पैरों पर खड़े होने के साथ ही तबस्सुम परिवार की जिम्मेदारियां भी बखूबी संभाल रही हैं।
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तब्बसुम की कहानी जितनी हौसलों भरी है, मुश्किलें भी उन पर उतना ही मेहरबान रही हैं। अपनों से इतने दर्द मिले कि जिंदगी से ही भरोसा उठ गया था लेकिन सिस्टर शीबा और कई मददगार लोगों के सहारे ने जीवन को नई राह दे दी। बकौल तबस्सुम, सत्रह वर्ष की उम्र में वर्ष 2000 में ही मेरी शादी कर दी। वर्ष 2003 में बेटे अब्दुला का जन्म हुआ। इसी बीच ससुराल वालों ने तरह-तरह से दहेज के लिए परेशान करना शुरू कर दिया। हद यह हो गई कि पति ने दूसरी शादी कर ली सो घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मायका भी आर्थिक रूप से कमजोर था सो जिंदगी के लिए नई राह चुननी पड़ी।
बेटे को लेकर प्रतापगढ़ से इलाहाबाद आ गई। भटकते हुए सिस्टर शीबा से मुलाकात हुई। वहीं ठिकाना मिला। यहीं पर रहकर हाईस्कूल पास किया। बेटा बड़ा हुआ तो किराए का मकान लेकर रहने लगी। हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद जीविका के लिए पहले गाड़ियों को पेंट करने का काम शुरू किया। इसके बाद सहयोग से ई-रिक्शा खरीदा। ई रिक्शा चलाकर जुटाए गए पैसों से अब ऑटो रिक्शा खरीदा है।
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तबस्सुम के हौसले और जज्बे के आगे मुश्किलें हार गईं। उन्होंने ई रिक्शा चलाने की शुरुआत की थी, अब वह शहर की पहली और अकेली ऑटो रिक्शा चालक बन गई हैं। बकौल तबस्सुम तब ई-रिक्शा लेकर निकलने पर लोग हैरत भरी नजरों से देखते थे लेकिन अब जिंदगी की मुश्किलों ने इतना मजबूत बना दिया है कि लोग क्या कहेंगे जैसे सवाल बेमानी हो गए हैं। आत्मनिर्र्भर बनने के लिए इज्जत और ईमानदारी से करने वाला हर काम सही है। मुश्किलें तो जिंदगी में आएंगी ही, उससे हारने से कुछ नहीं होगा। उसका सामना करते हुए महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करनी चाहिए।
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जिंदगी की तमाम परेशानियों से जूझते हुए तबस्सुम ने जीवकोपार्जन के लिए लोगों की मदद से वर्ष 2014 में ई-रिक्शा खरीदकर आत्मनिर्भर बनने की शुरुआत की थी। उस वक्त भी वह शहर की अकेली ई-रिक्शा चालक थीं। अब दिन-रात की मेहनत के बाद वह ऑटोरिक्शा की मालकिन और चालक बन गई हैं। अपने पैरों पर खड़े होने के साथ ही तबस्सुम परिवार की जिम्मेदारियां भी बखूबी संभाल रही हैं।
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तब्बसुम की कहानी जितनी हौसलों भरी है, मुश्किलें भी उन पर उतना ही मेहरबान रही हैं। अपनों से इतने दर्द मिले कि जिंदगी से ही भरोसा उठ गया था लेकिन सिस्टर शीबा और कई मददगार लोगों के सहारे ने जीवन को नई राह दे दी। बकौल तबस्सुम, सत्रह वर्ष की उम्र में वर्ष 2000 में ही मेरी शादी कर दी। वर्ष 2003 में बेटे अब्दुला का जन्म हुआ। इसी बीच ससुराल वालों ने तरह-तरह से दहेज के लिए परेशान करना शुरू कर दिया। हद यह हो गई कि पति ने दूसरी शादी कर ली सो घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मायका भी आर्थिक रूप से कमजोर था सो जिंदगी के लिए नई राह चुननी पड़ी।
बेटे को लेकर प्रतापगढ़ से इलाहाबाद आ गई। भटकते हुए सिस्टर शीबा से मुलाकात हुई। वहीं ठिकाना मिला। यहीं पर रहकर हाईस्कूल पास किया। बेटा बड़ा हुआ तो किराए का मकान लेकर रहने लगी। हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद जीविका के लिए पहले गाड़ियों को पेंट करने का काम शुरू किया। इसके बाद सहयोग से ई-रिक्शा खरीदा। ई रिक्शा चलाकर जुटाए गए पैसों से अब ऑटो रिक्शा खरीदा है।