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allahabad highcourt: दुष्कर्म कर लड़की को जिंदा जलाने के आरोपी  की फांसी की सजा रद्द, रिहा करने का आदेश

Wed, 09 Mar 2022 01:12 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 09 Mar 2022 01:12 AM IST
सार

हाथरस का मामला : कोर्ट ने कहा, निचली अदालतों ने साक्ष्यों को समझने में गलती की

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allahabad highcourt: death sentence of the accused of raping and burning the girl alive canceled order to be released
इलाहाबाद हाईकोर्ट

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 14 वर्ष की बालिका के साथ दुष्कर्म कर जिंदा जलाने के आरोपी की फांसी की सजा रद्द कर उसे बरी करने का आदेश दिया है। निचली अदालत ने आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने कहा पॉक्सो एक्ट के तहत स्वीकार्य आधारभूत सबूतों के बगैर मात्र इस अवधारणा पर सजा नहीं दी जा सकती कि अभियुक्त स्वयं को निर्दोष साबित करने में नाकाम रहा है।
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कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त पर स्वयं को निर्दोष साबित करने का दायित्व होता है, वहीं अभियोजन पक्ष के पास उसके अपराध में लिप्त होने का प्रथमदृष्टया पर्याप्त तथ्य व आधारभूत साक्ष्य होना चाहिए।
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 कोर्ट ने कहा कि अभियोजन ने पीड़िता के मृत्युकालिक बयान को साबित करने के लिए बयान दर्ज करने वाले मजिस्ट्रेट व डॉक्टर का बयान नहीं लिया और ना ही फोरेंसिक व डीएनए जांच करायी। निचली अदालत में पीड़िता का बयान दर्ज करने वाले मजिस्ट्रेट को समन करने की अर्जी भी नहीं दी। कोर्ट ने कहा अधीनस्थ अदालतों ने सबूतों को समझने में गलती की। आरोप साबित किए बगैर इस आधार पर सजा सुना दी कि आरोपी खुद को निर्दोष साबित नहीं कर सका।
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अभियोजन की ओर से तर्क दिया गया कि पीड़िता अपनी नानी के घर में थी। आरोपी ने घर में आकर छेड़छाड़ की। दुष्कर्म कर मिट्टी तेल डालकर आग लगा दी। गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया। 20 दिन बाद उसकी मौत हो गई, जिसकी एफआईआर हाथरस के सिकंदराराऊ थाने में दर्ज कराई गई। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और ट्रायल कोर्ट ने फांसी, आजीवन कारावास सहित विभिन्न अपराधों में सजा व लाखों रुपये का जुर्माना लगाया।


सत्र अदालत ने अपील खारिज करते हुए सजा बहाल रखी। वरिष्ठ अधीक्षक, जिला जेल अलीगढ़ ने फांसी की सजा की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट को अपील संदर्भित की। कोर्ट ने कहा कि आरोपी पर स्वयं को निर्दोष साबित करने का भार है। यह अनुच्छेद 14 और 21 के मूल अधिकारों के विपरीत नहीं है। मगर जरूरी है कि सजा संतोषजनक व विश्वसनीय सबूतों के आधार पर दी जाए।



अगर अभियोजन तथ्यों व आधारभूत सबूतों के आधार पर प्रथम दृष्टया अपराध साबित करने में सफल रहा हो तो वहीं यह अवधारणा लागू होगी कि आरोपी स्वयं को निर्दोष साबित करे। कोर्ट ने कहा नकारात्मक तथ्य साबित करना कठिन है किंतु असंभव नहीं है। सजा के लिए आरोप संदेह से परे साबित होना चाहिए।
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