Allahabad High Court : गवाहों के बयान परखने का काम ट्रायल कोर्ट का, हाईकोर्ट का नहीं
यह फैसला न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की अदालत ने याची ओम प्रकाश उर्फ जानी की याचिका खारिज करते हुए सुनाया। याची के विरुद्ध वाराणसी की सत्र अदालत ने पंद्रह साल पुराने देह व्यापार से जुड़े मामले में महिला आरक्षी द्वारा पीड़िता के दर्ज बयान के आधार पर बतौर आरोपी तलब किए जाने और दुष्कर्म की धाराओं में आरोप सृजन की अनुमति दी थी।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवेचना के दौरान पीड़िता के दर्ज हुए बयान को चुनौती देने वाली याचिका में हस्ताक्षेप करने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस विवेचना के दौरान दर्ज गवाहों के बयान की शुद्धता और वैधता परखने का काम ट्रायल कोर्ट का है, इसके लिए हाईकोर्ट द्वारा अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग किया जाना उचित नहीं।
यह फैसला न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की अदालत ने याची ओम प्रकाश उर्फ जानी की याचिका खारिज करते हुए सुनाया। याची के विरुद्ध वाराणसी की सत्र अदालत ने पंद्रह साल पुराने देह व्यापार से जुड़े मामले में महिला आरक्षी द्वारा पीड़िता के दर्ज बयान के आधार पर बतौर आरोपी तलब किए जाने और दुष्कर्म की धाराओं में आरोप सृजन की अनुमति दी थी। याची ने निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी।
मामला वाराणसी के मड़ुवाडीह थाना क्षेत्र का है। वर्ष 2005 में मड़ुवाडीह के निरीक्षक ने अलग-अलग स्थानों से युवतियों को बरामद करते हुए देह व्यापार के आरोप में दो अभियुक्तों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। इसके आधार पर चले मुकदमे में दोनों आरोपियों को दोषसिद्ध किया गया। उनकी सजा हाईकोर्ट द्वारा भी वर्ष 2019 में पुष्ट कर दी गई।
इस बीच अभियाेजन द्वारा 22 जून 2010 को अर्जी दाखिल कर याची समेत आठ अन्य लोगों को बतौर आरोपी तलब किए जाने की मांग की गई थी, जिसे निरस्त कर दिया गया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जिसे कोर्ट ने वापस निचली अदालत को नए सिरे से विचार करने के लिए वापस भेज दिया। निचली अदालत ने पुलिस को मामले में अग्रिम विवेचना का आदेश दिया।
विवेचना के दौरान दर्ज पीड़िता के बयान के आधार पर याची का नाम पूरक आरोप पत्र में शामिल कर दिया गया। कोर्ट ने वर्ष 2020 में आरोप पत्र पर संज्ञान भी ले लिया। मामला दर्ज होने के 15 साल बाद अभियोजन की ओर से वर्ष 2021 में नई अर्जी देते हुए याची के खिलाफ दुष्कर्म की धाराएं बढ़ाते हुए आरोप सृजन की मांग की गई, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
याची ने दुष्कर्म के आरोप सृजन की स्वीकृति को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दया शंकर मिश्रा ने दलील पेश करते हुए अभियोजन की अर्जी की पोषणीयता पर सवाल खड़े करने के साथ ही पीड़िता के बयान की शुद्धता और वैधता पर आपत्ति जताई। कहा कि पीड़िता का बयान विवेचनाधिकारी की जगह महिला आरक्षी द्वारा दर्ज किया गया, जो विधि विरूद्ध है।
पीड़िता के बयान के अलावा दुष्कर्म का कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। जबकि राज्य सरकार के वकील ने निचली अदालत के आदेश को विधि सम्मत बताया, कहा कि विवेचना के दौरान दुष्कर्म पीड़िता का बयान विवेचक के निर्देश पर महिला पुलिस द्वारा दर्ज किया जाना गलत नहीं है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि विवेचना के दौरान दर्ज गवाहों के बयान की शुद्धता और वैधता की जांच ट्रायल के दौरान होगी, जिसका क्षेत्राधिकार ट्रायल कोर्ट को है। हाईकोर्ट इस स्तर पर गवाहों के बयान की शुद्धता और वैधता की जांच के लिए अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकती।