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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Allahabad High Court: Hearing underway today in Gyanvapi Mosque and Visvesvarnath Temple dispute case

Gyanvapi Case : कभी मस्जिद के रूप में रूपांतरित नहीं हुआ विश्वेश्वरनाथ मंदिर, अगली सुनवाई 26 जुलाई को

Fri, 22 Jul 2022 09:12 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 22 Jul 2022 09:12 PM IST
सार

सुनवाई के दौरान पहले मंदिर पक्ष की ओर से अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने अपनी बहस की। उन्होंने कहा कि वक्फ अधिनियम 1995 के प्रावधान केवल मुसलमानों पर लागू होते हैं। वह केवल मुसलमानों के बीच विवाद के समाधान के लिए है।

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Allahabad High Court: Hearing underway today in Gyanvapi Mosque and Visvesvarnath Temple dispute case
ज्ञानवापी मस्जिद, काशी विश्वनाथ मंदिर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

शुक्रवार को ज्ञानवापी मस्जिद व विश्वेश्वर नाथ मंदिर विवाद मामले में दोनों पक्षों ओर से तर्क पेश किए गए। मंदिर पक्ष की ओर से तर्क दिया गया कि विश्वेश्वर मंदिर कभी मस्जिद में रूपांतरित हुआ ही नहीं। सतयुग से सबकुछ वैसे ही चला आ रहा है। जबकि, मस्जिद पक्ष की ओर से कहा गया कि 15 अगस्त 1947 में मस्जिद अस्तित्व में थी। 1995 में वक्फ बोर्ड में हुए संशोधन होने के बाद मस्जिद को वक्फ में पंजीकृत कराने की जरूरत नहीं रही। तकरीबन सवा घंटे हुई बहस के बाद समयाभाव की वजह से कोर्ट ने मामले की सुनवाई केलिए 26 जुलाई की तिथि निर्धारित की है।

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मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड और अंजुमने इंतजामिया मस्जिद कमेटी की ओर से दाखिल याचिकाओं पर न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान पहले मंदिर पक्ष की ओर से अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने बहस की। उन्होंने कहा कि वक्फ  अधिनियम 1995 के प्रावधान केवल मुसलमानों पर लागू होते हैं। वह केवल मुसलमानों के बीच विवाद के समाधान के लिए हैं।
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गैर मुस्लिमों पर ये लागू नहीं होते। यह कानून हिंदुओं पर भी बाध्यकारी नहीं है। यदि वक्फ बोर्ड और गैर मुस्लिमों के बीच कोई विवाद उत्पन्न होता है तो अनिवार्य रूप से विरोधी पक्ष को नोटिस जारी किया जाना चाहिए। मौजूदा मामले में वादी को कभी भी कोई नोटिस या अवसर नहीं दिया गया था। इसलिए विवादित संपत्ति को न तो वक्फ  संपत्ति माना जा सकता है न कहा जा सकता है।

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मंदिर पक्ष के अनुसार अधिनियम 1995 लागू होने के बाद जो संपत्तियां गैर पंजीकृत थीं या पहले पंजीकृत थीं, उन सभी को फिर से पंजीकृत करने की आवश्यकता थी। वर्तमान मामले में विवादित संपत्ति को अधिनियम 1995 के लागू होने के बाद धारा 36 के तहत आवश्यक रूप से फिर से पंजीकृत नहीं किया गया है और इसलिए विवादित संपत्ति को वक्फ  संपत्ति नहीं कहा जा सकता है।


मंदिर पक्ष के अनुसार भगवान विश्वेश्वर का मंदिर प्राचीन काल से अस्तित्व में है और स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर विवादित ढांचे में स्थित हैं। इसलिए पूरी संपत्ति स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर में निहित है। उन्होंने उत्तर प्रदेश श्री काशी विश्वनाथ एक्ट 1983 के तहत दी गई परिभाषा की भी व्याख्या की। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के अयोध्या प्रसाद व सुप्रीम कोर्ट केसरदार खां केफैसले का हवाला दिया। कहा कि 18 अप्रैल 1678 को औरंगजेब के आदेश के तहत मंदिर गिराया गया। उसके बाद मंदिर को मस्जिद में रूपांतरित करने का कोई उल्लेख या रिकॉर्ड नहीं है।

पंजीकृत वक्फ संपत्ति का दोबारा पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं
सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद फरमान अहमद नकवी ने तर्क दिया कि जो संपत्ति 1995 के अधिनियम के शुरू होने से पहले वक्फ  अधिनियम के तहत पंजीकृत थी। उसे फिर से पंजीकृत करने की आवश्यकता नहीं है। नकवी ने तर्क दिया कि जहां तक उत्तर प्रदेश श्री काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम 1983 का संबंध है।


वह केवल काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रबंधन के लिए है और उक्त अधिनियम का वर्तमान विवाद से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रतिवादी ने यह स्वीकार किया है कि औरंगजेब द्वारा मंदिर के ध्वस्तीकरण किए जाने के बाद मस्जिद अस्तित्व में आई और उसका अस्तित्व 15 अगस्त 1947 में भी रहा। इसलिए पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के तहत उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है।

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