नाम बदलने पर कसा तंज : यहां धरा क्या है सिवा अकबर के और अमरूद के
वैसे न जाने क्या तासीर है ‘इलाहाबाद’ नाम में कि हर कोई इससे जुड़ना चाहता है। इतिहास गवाह है कि एक समय था कि बॉलीवुड की कई फिल्में बिना इलाहाबाद का जिक्र किए पूरी ही नहीं होती थीं। राजनीति के कई फलक अपने में जगह-जगह ‘इलाहाबाद’ को दर्ज किए हुए हैं।
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यह यूं ही नहीं था कि अकबर ने यह कह दिया ‘कुछ इलाहाबाद में सामां नहीं बहबूद के, यहां धरा क्या है ब-जुज़ अकबर के और अमरूद के’। या फिर भारत के इतिहास में अपनी आवाज रिकार्ड कराने वाली पहली कुछ प्रमुख गायिकाओं में शुमार जानकी बाई उर्फ छप्पन छूरी ने अंग्रेज अफसरों से भरी एक महफिल में अपना परिचय बड़े गर्व से ‘मैं छप्पन छूरी इलाहाबादी’ कहकर दिया। प्रख्यात साहित्यकार धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों का देवता पढ़ें या फिर निराला की कविता- देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर, वह तोड़ती पत्थर’ तो हमें इलाहाबाद ही इलाहाबाद नजर आएगा।
इतिहास इस बात का गवाह है कि इलाहाबाद की मुहरबंदी कराने के लिए देश भर के साहित्यकार यहां आने के लिए तरसते थे। यह शहर साहित्य, संस्कृति और शिक्षा से जुड़े लोगों को अपनी ओर खींचता रहा और लोग यहां से जुड़कर अपने को धन्य मानते रहे। यह अनायास नहीं है कि हिंदी के कई बड़े रचनाकारों की कृतियों में इलाहाबाद की गूंज अपने समूचे सरोकार के साथ सुनी जा सकती है।
कई शायरों ने नाम में इलाहाबादी जोड़कर बनाई पहचान
भैरव प्रसाद गुप्त, महादेवी, कमलेश्वर, गोविन्द मिश्र, नासिरा शर्मा, दूधनाथ सिंह, ममता कालिया जैसे अनगिनत रचनाकारों ने जगह-जगह ‘इलाहाबाद’ को लिखा है, रचाया-बसाया है। शायरों ने तो जमकर अपने नाम के आगे इलाहाबादी जोड़कर पहचान बनाई। अकबर इलाहाबादी के साथ अकेले राशिद इलाहाबादी और तेग इलाहाबादी ही थोड़े ही हैं। अकबर इलाहाबादी के समकालीन शायर हैरत इलाहाबादी या फिर ‘लज़्ज़त-ए-गम बढ़ा दीजिए , आप फिर मुस्कुरा दीजिए’ जैसी पंक्तियां रचकर अमर हो गए शायर राज इलाहाबादी भी इसमें हैं।
सच तो यह कि यह परंपरा आज भी जारी है। वैसे न जाने क्या तासीर है ‘इलाहाबाद’ नाम में कि हर कोई इससे जुड़ना चाहता है। इतिहास गवाह है कि एक समय था कि बॉलीवुड की कई फिल्में बिना इलाहाबाद का जिक्र किए पूरी ही नहीं होती थीं। राजनीति के कई फलक अपने में जगह-जगह ‘इलाहाबाद’ को दर्ज किए हुए हैं।