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सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के 13 अपर महाधिवक्ता बने लोक अभियोजक
Updated Tue, 24 Jul 2018 12:30 AM IST
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13 अपर महाधिवक्ता बनाए गए पदेन लोक अभियोजक
0 बिना अधिकार फौजदारी मुकदमों में बहस करने की शिकायत पर शासन ने सुधारी गलती
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। प्रदेश सरकार ने सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में मुकदमों की पैरवी के लिए नियुक्त अपने 13 अपर महाधिवक्ताओं को पदेन लोक अभियोजक घोषित किया है। अभी तक यह अपर महाधिवक्ता बिना अधिकार के ही फौजदारी के मुकदमों में पैरवी कर रहे थे। इसकी शिकायत के बाद प्रदेश शासन के न्याय विभाग के उपसचिव ने 18 जुलाई 2018 को शासनादेश जारी कर सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में प्रदेश के 13 अपर महाधिवक्ताओं को पदेन लोक अभियोजक घोषित कर दिया है। इससे उन्हें आपराधिक मामलों में भी बहस करने का अधिकार मिल गया है।
हाईकोर्ट के आदर्श अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष एससी मिश्र ने प्रमुख सचिव न्याय और विधि परामर्शी को इन अपर महाधिवक्ताओं द्वारा बिना अधिकार फौजदारी के मुकदमों में पैरवी करने और उनको विधि विरुद्ध भुगतान की शिकायत की थी। कहा था कि सीआरपीसी की धारा 24 के प्रावधानों के अनुसार सिर्फ लोक अभियोजक को ही फौजदारी के मुकदमों में पैरवी का अधिकार है। अपर महाधिवक्ता लोक अभियोजक नहीं होते हैं। साथ ही उन्होंने इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग करते हुए 17 जुलाई 2018 को प्रत्यावेदन भेजा था। इसके बाद शासन सचेत हो गया। गलती का एहसास होते ही तत्काल 18 जुलाई को शासनादेश जारी कर अपर महाधिवक्ताओं को पदेन लोक अभियोजक घोषित कर दिया गया। हालांकि, अब इस शासनादेश पर ही सवाल उठने लगे हैं, क्योंकि कहा जा रहा है कि हाईकोर्ट की अनुमति लिए बिना ऐसा शासनादेश नहीं जारी हो सकता है।
जानकारों का कहना है कि न्याय विभाग ने शासनादेश जारी करने में 1991 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 24 में हुए संशोधन से का सहारा लिया है, जिसमें लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक की नियुक्ति में हाईकोर्ट से परामर्श का उपबंध हटा दिया गया है। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता एएन त्रिपाठी का कहना है कि सुप्रीमकोर्ट ने एआईआर 2004 एससी 3800 उप्र राज्य बनाम जौहरी मल केस में राज्य सरकार द्वारा 1991 में धारा 24 में किए गए संशोधन को औचित्यहीन करार दिया है और राज्य सरकार को इसे संशोधित करने का आदेश दिया। साथ ही कहा है कि जब तक संशोधन कानून हटाया नहीं जाता, सरकार हाईकोर्ट के परामर्श से ही लोक अभियोजक और अपर लोक अभियोजकों की नियुक्ति करे।
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0 बिना अधिकार फौजदारी मुकदमों में बहस करने की शिकायत पर शासन ने सुधारी गलती
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। प्रदेश सरकार ने सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में मुकदमों की पैरवी के लिए नियुक्त अपने 13 अपर महाधिवक्ताओं को पदेन लोक अभियोजक घोषित किया है। अभी तक यह अपर महाधिवक्ता बिना अधिकार के ही फौजदारी के मुकदमों में पैरवी कर रहे थे। इसकी शिकायत के बाद प्रदेश शासन के न्याय विभाग के उपसचिव ने 18 जुलाई 2018 को शासनादेश जारी कर सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में प्रदेश के 13 अपर महाधिवक्ताओं को पदेन लोक अभियोजक घोषित कर दिया है। इससे उन्हें आपराधिक मामलों में भी बहस करने का अधिकार मिल गया है।
हाईकोर्ट के आदर्श अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष एससी मिश्र ने प्रमुख सचिव न्याय और विधि परामर्शी को इन अपर महाधिवक्ताओं द्वारा बिना अधिकार फौजदारी के मुकदमों में पैरवी करने और उनको विधि विरुद्ध भुगतान की शिकायत की थी। कहा था कि सीआरपीसी की धारा 24 के प्रावधानों के अनुसार सिर्फ लोक अभियोजक को ही फौजदारी के मुकदमों में पैरवी का अधिकार है। अपर महाधिवक्ता लोक अभियोजक नहीं होते हैं। साथ ही उन्होंने इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग करते हुए 17 जुलाई 2018 को प्रत्यावेदन भेजा था। इसके बाद शासन सचेत हो गया। गलती का एहसास होते ही तत्काल 18 जुलाई को शासनादेश जारी कर अपर महाधिवक्ताओं को पदेन लोक अभियोजक घोषित कर दिया गया। हालांकि, अब इस शासनादेश पर ही सवाल उठने लगे हैं, क्योंकि कहा जा रहा है कि हाईकोर्ट की अनुमति लिए बिना ऐसा शासनादेश नहीं जारी हो सकता है।
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जानकारों का कहना है कि न्याय विभाग ने शासनादेश जारी करने में 1991 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 24 में हुए संशोधन से का सहारा लिया है, जिसमें लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक की नियुक्ति में हाईकोर्ट से परामर्श का उपबंध हटा दिया गया है। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता एएन त्रिपाठी का कहना है कि सुप्रीमकोर्ट ने एआईआर 2004 एससी 3800 उप्र राज्य बनाम जौहरी मल केस में राज्य सरकार द्वारा 1991 में धारा 24 में किए गए संशोधन को औचित्यहीन करार दिया है और राज्य सरकार को इसे संशोधित करने का आदेश दिया। साथ ही कहा है कि जब तक संशोधन कानून हटाया नहीं जाता, सरकार हाईकोर्ट के परामर्श से ही लोक अभियोजक और अपर लोक अभियोजकों की नियुक्ति करे।
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