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55 दिन नहीं चली 55 लाख की स्वीपिंग मशीन
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 01 Dec 2014 12:51 PM IST
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इलाहाबाद। बंगलुरु, चंडीगढ़ की तर्ज पर शहर की सड़कों को चमकाने के लिए नगर निगम ने चार वर्ष पहले 55 लाख रुपये की स्वीपिंग मशीन खरीदी। सड़कों की स्थिति बिना जाने-समझे खरीदी गई मशीन 55 दिन भी नहीं चली। दो वर्ष से मशीन नगर निगम के लीडर रोड स्थित वर्कशाप में कबाड़ की तरह पड़ी है।
इतनी मंहगी मशीन खरीदने और उसके मेंटेनेंस पर मोटी रकम खर्च करने का मामला 2010 में तत्कालीन पार्षद आनंद घिल्डियाल ने निगम सदन में भी उठाया था। तत्कालीन महापौर चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह ने सीएफओ से इसकी जांच कराने और शासन को रिपोर्ट भेजने का आदेश दिया लेकिन यह आदेश ठंडे बस्ते में चला गया।
नगर निगम ने चार वर्ष जिस कंपनी से मशीन खरीदी, उसी से इसके मेंटेेनेंस के लिए सालाना 35 रुपये का करार भी किया। मशीन आने के बाद करीब छह माह तक तो यूं ही वर्कशॉप में खड़ी रही। फिर उससे पत्थर गिरजाघर से हनुमान मंदिर तक सड़क की सफाई शुरू हुई।
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स्वीपिंग मशीन में दोनों तरफ लगे ब्रश से सड़क को साफ किया जाता था। बाद में मशीन को कमला नेहरू रोड, स्टेनली रोड की सफाई में भी लगाया गया लेकिन 15-20 दिन बाद ही फिर से वर्कशॉप में खड़ा करा दिया गया। वर्ष 2011 में सिविल लाइंस, स्टेनली रोड पर सीवर लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ तो निगम भी स्वीपिंग मशीन को वर्कशॉप से निकालना भूल गया।
करीब साल भर तक मशीन वहीं खड़ी रही। कुंभ मेला के मद्देनजर वर्ष 2013 की शुरूआत में एमजी मार्ग और स्टेनली रोड की मरम्मत हुई तो निगम ने उसी वर्ष अक्तूबर में लाखों रुपये खर्च कर मशीन को मेंटेन कराया और फिर सिविल लाइंस और स्टेनली रोड पर सफाई के लिए लगाया लेकिन इस बार भी मशीन माह भर भी नहीं चली। उसके बाद मशीन जो वर्कशॉप में गई तो आज तक नहीं निकली।
मशीन के हिसाब से नहीं शहर की सड़क
शहर की सड़कों की जो स्थिति है, उस पर स्वीपिंग मशीन से सफाई संभव नहीं है। दरअसल इस तरह की मशीन से सफाई एयरपोर्ट या फिर आरसीसी से बनी सड़कों पर होती है, जहां सड़कें ऊंची-नीची और दोनों तरफ ढाल न हो। मशीन में लगे ब्रश चिकनी और बिना ढाल वाली सड़क पर ही बेहतर तरीके से काम करते हैं।
इलाहाबाद शहर के किसी भी हिस्से में ऐसी सड़क नहीं है। यहां सड़कें ऊंची-नीची, जगह-जगह ढाल के साथ बीच-बीच में सीवर चैंबर भी हैं। दूसरे पटरी पार पुराने शहर में तो यह मशीन कभी गई ही नहीं। वहां के लोगों को तो स्वीपिंग के मशीन के बारे में बता भी नहीं है।
तो हर वार्ड को मिलते 20-20 सफाई कर्मी
इलाहाबाद। नगर निगम ने चार वर्ष पहले जिस जल्दबादी में 55 लाख की स्वीपिंग मशीन खरीदने और मेंटेनेस के लिए 35 लाख रुपये खर्च करने के मामले में सवाल खड़े होना लाजमी है।
निगम ने जितनी रकम खर्च कर मशीन खरीदी और उसके मेंटेनेंस के लिए करार किया, उतनी रकम से उस दौरान शहर के 80 वार्डों में करीब 20-20 सफाई मजदूर मिल जाते। तत्कालीन पार्षद आनंद घिल्डियाल का कहना है कि लाखों रुपये खर्च कर मशीन को कबाड़ बना दिया गया, इतनी रकम से सफाई मजदूरों को रखा जाता तो शहर की स्थिति बदल जाती।
‘स्वीपिंग मशीन को खरीदने का निर्णय ही गलत था क्योंकि यहां की सड़कें ऐसी हैं ही नहीं कि उस मशीन से सफाई की जा सके। दूसरे उसे चलाने में डीजल की खपत भी काफी अधिक होती है। मशीन को बेचने के अलावा को कोई विकल्प नहीं है।’आरपी सिंह, नगर आयुक्त
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इतनी मंहगी मशीन खरीदने और उसके मेंटेनेंस पर मोटी रकम खर्च करने का मामला 2010 में तत्कालीन पार्षद आनंद घिल्डियाल ने निगम सदन में भी उठाया था। तत्कालीन महापौर चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह ने सीएफओ से इसकी जांच कराने और शासन को रिपोर्ट भेजने का आदेश दिया लेकिन यह आदेश ठंडे बस्ते में चला गया।
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नगर निगम ने चार वर्ष जिस कंपनी से मशीन खरीदी, उसी से इसके मेंटेेनेंस के लिए सालाना 35 रुपये का करार भी किया। मशीन आने के बाद करीब छह माह तक तो यूं ही वर्कशॉप में खड़ी रही। फिर उससे पत्थर गिरजाघर से हनुमान मंदिर तक सड़क की सफाई शुरू हुई।
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स्वीपिंग मशीन में दोनों तरफ लगे ब्रश से सड़क को साफ किया जाता था। बाद में मशीन को कमला नेहरू रोड, स्टेनली रोड की सफाई में भी लगाया गया लेकिन 15-20 दिन बाद ही फिर से वर्कशॉप में खड़ा करा दिया गया। वर्ष 2011 में सिविल लाइंस, स्टेनली रोड पर सीवर लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ तो निगम भी स्वीपिंग मशीन को वर्कशॉप से निकालना भूल गया।
करीब साल भर तक मशीन वहीं खड़ी रही। कुंभ मेला के मद्देनजर वर्ष 2013 की शुरूआत में एमजी मार्ग और स्टेनली रोड की मरम्मत हुई तो निगम ने उसी वर्ष अक्तूबर में लाखों रुपये खर्च कर मशीन को मेंटेन कराया और फिर सिविल लाइंस और स्टेनली रोड पर सफाई के लिए लगाया लेकिन इस बार भी मशीन माह भर भी नहीं चली। उसके बाद मशीन जो वर्कशॉप में गई तो आज तक नहीं निकली।
मशीन के हिसाब से नहीं शहर की सड़क
शहर की सड़कों की जो स्थिति है, उस पर स्वीपिंग मशीन से सफाई संभव नहीं है। दरअसल इस तरह की मशीन से सफाई एयरपोर्ट या फिर आरसीसी से बनी सड़कों पर होती है, जहां सड़कें ऊंची-नीची और दोनों तरफ ढाल न हो। मशीन में लगे ब्रश चिकनी और बिना ढाल वाली सड़क पर ही बेहतर तरीके से काम करते हैं।
इलाहाबाद शहर के किसी भी हिस्से में ऐसी सड़क नहीं है। यहां सड़कें ऊंची-नीची, जगह-जगह ढाल के साथ बीच-बीच में सीवर चैंबर भी हैं। दूसरे पटरी पार पुराने शहर में तो यह मशीन कभी गई ही नहीं। वहां के लोगों को तो स्वीपिंग के मशीन के बारे में बता भी नहीं है।
तो हर वार्ड को मिलते 20-20 सफाई कर्मी
इलाहाबाद। नगर निगम ने चार वर्ष पहले जिस जल्दबादी में 55 लाख की स्वीपिंग मशीन खरीदने और मेंटेनेस के लिए 35 लाख रुपये खर्च करने के मामले में सवाल खड़े होना लाजमी है।
निगम ने जितनी रकम खर्च कर मशीन खरीदी और उसके मेंटेनेंस के लिए करार किया, उतनी रकम से उस दौरान शहर के 80 वार्डों में करीब 20-20 सफाई मजदूर मिल जाते। तत्कालीन पार्षद आनंद घिल्डियाल का कहना है कि लाखों रुपये खर्च कर मशीन को कबाड़ बना दिया गया, इतनी रकम से सफाई मजदूरों को रखा जाता तो शहर की स्थिति बदल जाती।
‘स्वीपिंग मशीन को खरीदने का निर्णय ही गलत था क्योंकि यहां की सड़कें ऐसी हैं ही नहीं कि उस मशीन से सफाई की जा सके। दूसरे उसे चलाने में डीजल की खपत भी काफी अधिक होती है। मशीन को बेचने के अलावा को कोई विकल्प नहीं है।’आरपी सिंह, नगर आयुक्त