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मुकदमे की जानकारी छिपाने के आधार पर बर्खासतगी अनुचित

Thu, 28 Sep 2017 08:47 PM IST
Updated Thu, 28 Sep 2017 08:47 PM IST
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मुकदमे की जानकारी  छिपाने के आधार पर बर्खासतगी अनुचित
मुकदमा दर्ज होने की सूचना छिपाने पर बर्खास्तगी का आदेश रद्द
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0 हाईकोर्ट ने कहा हर मामले की परिस्थिति को देखकर लेना चाहिए निर्णय
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी ने अपने विरुद्ध दर्ज मुकदमे की जानकारी छिपाई है तो नियोक्ता को उसकी बर्खास्तगी पर निर्णय लेने से पूर्व मामले की परिस्थितियों की पूरी तरह से जांच कर लेनी चाहिए। जानकारी किन परिस्थितियों में छिपाई गई। मुकदमे की गंभीरता कितनी है और वह किस स्थिति में है आदि बातों पर विचार कर निर्णय लेना चाहिए। रेलवे सुरक्षा बल के कांस्टेबल विकास कुहर और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति शबीबुल हसनैन ने यह आदेश दिया।

याची के अधिवक्ता विजय गौतम के मुताबिक लगभग पचास लोगों ने अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर आरपीएफ के निर्णय को चुनौती दी थी। इलाहाबाद निवासी याची आरपीएफ में कांस्टेबल के पद पर नियुक्त हुआ था। चार जून 2015 को उसे यह कहते हुए सेवा से बर्खास्त कर दिया गया कि उसने अपने विरुद्ध दर्ज मुकदमे की जानकारी नियुक्ति के समय विभाग को नहीं दी, जबकि ऐसा किया जाना आवश्यक था। याची का कहना था कि उसे आवेदन करते समय अपने खिलाफ दर्ज मुकदमे की जानकारी नहीं थी। आरोपपत्र में नाम आने के बाद पता चला। मुकदमे में वह बरी भी हो चुका है। अधिवक्ता ने सुप्रीमकोर्ट के अवतार सिंह केस सहित कई नजीरों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि विभाग को ऐसे मामलों में लचीला नजरिया अपनाना चाहिए, जहां सूचना अज्ञानतावश छिपाई गई है। मुकदमा किन कारणों से किन धाराओं में दर्ज हुआ है इस पर भी विचार करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि तय गाइड लाइन के अनुसार यदि केस गंभीर नहीं है और बेहद मामूली है तो उसे नजरअंदाज किया जा सकता है। विभाग को निर्णय लेने से पूर्व हर केस के तथ्य और परिस्थिति पर विचार करना चाहिए। कोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश रद्द करते हुए नए सिरे से निर्णय लेने को कहा है।
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