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पीएफ घोटाले के आरोपियों को बचाने पर कार्ट नाराज
Updated Mon, 31 Jul 2017 08:38 PM IST
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पीएफ घोटाले के आरोपियों को बचाने पर कोर्ट नाराज
मुख्य सचिव से जवाब तलब, क्यों न सीबीआई से कराई जाए जांच: कोर्ट
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
बलिया में हुए करोड़ों रुपये के पीएफ घोटाले के आरोपियों पर कार्रवाई नहीं करने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि तीन करोड़ 53 लाख रुपये के गबन में अफसर दोषियों को बचाने के लिए हथकंडे अपना रहे हैं। आडिट रिपोर्ट और जांच में सब कुछ साफ होने के बाद बावजूद कार्रवाई करने के बजाए हाईपावर कमेटी गठित की गई है। कोर्ट ने मुख्य सचिव से कहा है कि इस मामले में कार्रवाई कर आठ अगस्त तक हलफनामा दाखिल करें।
यदि सरकार कार्रवाई नहीं करती है तो मामले की जांच सीबीआई को सौंपने पर विचार किया जाएगा। क्योंकि दोषियों का पता होने के बावजूद उन पर कार्रवाई नहीं की जा रही है, ताकि घोटाले में शामिल अफसर आराम से सेवानिवृत्त हो जाएं। 1994-95 में हुए जीपीएफ घोटाले में तत्कालीन डीआईओएस, लेखाधिकारी और सिटी मजिस्ट्रेट आरोप के दायरे में हैं। विजलेंस जांच में इनको दोषी बताया गया है मगर अब तक इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। भीम सिंह ने जनहित याचिका दाखिल कर इस मामले को चुनौती दी है। याचिका पर न्यायमूर्ति अरुण टंडन और न्यायमूर्ति ऋतुराज अवस्थी की पीठ सुनवाई कर रही है।
बिना स्वीकृति पदों पर की गई भर्ती
बलिया जिले में 1994-95 में बड़े पैमाने में इंटर कालेजों में बिना स्वीकृत पदों पर अध्यापकों की नियुक्ति की गई। स्थानीय अधिकारियों ने बजट बचाने के लिए तीन करोड़ 53 लाख रुपये की राशि जीपीएफ खाते में जमा करा दी। बाद में इसमें से एक करोड़ आठ लाख रुपये निकाल कर फर्जी नियुक्त अध्यापकों को वेतन दे दिया गया। शिकायत पर इस मामले मेें प्राथमिकी दर्ज हुई और विजलेंस ने जांच की।
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कोर्ट के आदेश पर भी कार्रवाई नहीं
विजलेंस ने अपनी रिपोर्ट मार्च 2016 में दी। रिपोर्ट में करीब 12 करोड़ रुपये की घपले की बात सामने आई। हाईकोर्ट ने इस मामले में दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई और रकम वसूलने का आदेश दिया था। जब कोर्ट ने कार्रवाई रिपोर्ट मांगी तो बताया गया कि इस मामले में हाईपावर कमेटी गठित कर दी गई है। इस पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि स्पष्ट है कि सरकार दोषियों को बचाना चाहती है। महाधिवक्ता ने एक और अवसर देने की मांग की। इसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने एक सप्ताह में रिपोर्ट देने के लिए कहा है।
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मुख्य सचिव से जवाब तलब, क्यों न सीबीआई से कराई जाए जांच: कोर्ट
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
बलिया में हुए करोड़ों रुपये के पीएफ घोटाले के आरोपियों पर कार्रवाई नहीं करने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि तीन करोड़ 53 लाख रुपये के गबन में अफसर दोषियों को बचाने के लिए हथकंडे अपना रहे हैं। आडिट रिपोर्ट और जांच में सब कुछ साफ होने के बाद बावजूद कार्रवाई करने के बजाए हाईपावर कमेटी गठित की गई है। कोर्ट ने मुख्य सचिव से कहा है कि इस मामले में कार्रवाई कर आठ अगस्त तक हलफनामा दाखिल करें।
यदि सरकार कार्रवाई नहीं करती है तो मामले की जांच सीबीआई को सौंपने पर विचार किया जाएगा। क्योंकि दोषियों का पता होने के बावजूद उन पर कार्रवाई नहीं की जा रही है, ताकि घोटाले में शामिल अफसर आराम से सेवानिवृत्त हो जाएं। 1994-95 में हुए जीपीएफ घोटाले में तत्कालीन डीआईओएस, लेखाधिकारी और सिटी मजिस्ट्रेट आरोप के दायरे में हैं। विजलेंस जांच में इनको दोषी बताया गया है मगर अब तक इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। भीम सिंह ने जनहित याचिका दाखिल कर इस मामले को चुनौती दी है। याचिका पर न्यायमूर्ति अरुण टंडन और न्यायमूर्ति ऋतुराज अवस्थी की पीठ सुनवाई कर रही है।
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बिना स्वीकृति पदों पर की गई भर्ती
बलिया जिले में 1994-95 में बड़े पैमाने में इंटर कालेजों में बिना स्वीकृत पदों पर अध्यापकों की नियुक्ति की गई। स्थानीय अधिकारियों ने बजट बचाने के लिए तीन करोड़ 53 लाख रुपये की राशि जीपीएफ खाते में जमा करा दी। बाद में इसमें से एक करोड़ आठ लाख रुपये निकाल कर फर्जी नियुक्त अध्यापकों को वेतन दे दिया गया। शिकायत पर इस मामले मेें प्राथमिकी दर्ज हुई और विजलेंस ने जांच की।
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कोर्ट के आदेश पर भी कार्रवाई नहीं
विजलेंस ने अपनी रिपोर्ट मार्च 2016 में दी। रिपोर्ट में करीब 12 करोड़ रुपये की घपले की बात सामने आई। हाईकोर्ट ने इस मामले में दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई और रकम वसूलने का आदेश दिया था। जब कोर्ट ने कार्रवाई रिपोर्ट मांगी तो बताया गया कि इस मामले में हाईपावर कमेटी गठित कर दी गई है। इस पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि स्पष्ट है कि सरकार दोषियों को बचाना चाहती है। महाधिवक्ता ने एक और अवसर देने की मांग की। इसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने एक सप्ताह में रिपोर्ट देने के लिए कहा है।