{"_id":"5bf97f83bdec224177353f0c","slug":"161543077763-allahabad-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"हत्या के जुर्म में एक की सजा बरकार एक बरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हत्या के जुर्म में एक की सजा बरकार एक बरी
Updated Sat, 24 Nov 2018 10:12 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बरेली के ध्यानार्थ
00000000000000000
हत्या के जुर्म में एक की सजा बरकरार, एक बरी
0 37 साल बाद हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला
प्रयागराज। हाईकोर्ट ने हत्या के 37 साल पुराने मामले में जिला अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। हालांकि, कोर्ट ने इसी मामले के एक अभियुक्त को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है। अभियुक्त वीरेंद्र सिंह और महिपाल की सजा के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति ओमप्रकाश सप्तम की पीठ ने दिया।
घटना वर्ष 1981 की बरेली की है। अभियुक्त वीरेंद्र सिंह और महिपाल के खिलाफ मृतक धरमपाल के भाई निहाल सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि 27 अगस्त 1981 को सुबह करीब चार बजे वीरेंद्र सिंह ने तमंचे से गोली मारकर धरमपाल की हत्या कर दी। उस वक्त धरमपाल चारपाई पर सोया था। बगल में ही उसका एक और भाई रामपाल तथा पड़ोस में रहने वाले निहाल सिंह भी सोए थे। दोनों ने टार्च की रोशनी में वीरेंद्र सिंह, महिपाल और एक अन्य को भागते हुए देखा था।
सेशन कोर्ट बरेली ने 25 मई 1983 को वीरेंद्र और महिपाल को हत्या का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। दोनों ने सजा के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने वीरेंद्र पर लगे आरोपों का सही पाया मगर महिपाल की हत्या में भूमिका को संदिग्ध माना। उसके विरुद्ध प्रस्तुत साक्ष्य घटना में उसकी संलिप्तता को संदेह से परे साबित नहीं कर सके। लिहाजा वीरेंद्र की उम्रकैद बरकरार रखते हुए महिपाल को दोषमुक्त कर दिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन
00000000000000000
हत्या के जुर्म में एक की सजा बरकरार, एक बरी
0 37 साल बाद हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला
प्रयागराज। हाईकोर्ट ने हत्या के 37 साल पुराने मामले में जिला अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। हालांकि, कोर्ट ने इसी मामले के एक अभियुक्त को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है। अभियुक्त वीरेंद्र सिंह और महिपाल की सजा के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति ओमप्रकाश सप्तम की पीठ ने दिया।
घटना वर्ष 1981 की बरेली की है। अभियुक्त वीरेंद्र सिंह और महिपाल के खिलाफ मृतक धरमपाल के भाई निहाल सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि 27 अगस्त 1981 को सुबह करीब चार बजे वीरेंद्र सिंह ने तमंचे से गोली मारकर धरमपाल की हत्या कर दी। उस वक्त धरमपाल चारपाई पर सोया था। बगल में ही उसका एक और भाई रामपाल तथा पड़ोस में रहने वाले निहाल सिंह भी सोए थे। दोनों ने टार्च की रोशनी में वीरेंद्र सिंह, महिपाल और एक अन्य को भागते हुए देखा था।
विज्ञापन
सेशन कोर्ट बरेली ने 25 मई 1983 को वीरेंद्र और महिपाल को हत्या का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। दोनों ने सजा के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने वीरेंद्र पर लगे आरोपों का सही पाया मगर महिपाल की हत्या में भूमिका को संदिग्ध माना। उसके विरुद्ध प्रस्तुत साक्ष्य घटना में उसकी संलिप्तता को संदेह से परे साबित नहीं कर सके। लिहाजा वीरेंद्र की उम्रकैद बरकरार रखते हुए महिपाल को दोषमुक्त कर दिया है।
विज्ञापन