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10 साल में धूमिल हुई 127 साल की पहचान
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 14 Jul 2015 01:32 AM IST
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इलाहाबाद। देश के चौथे सबसे पुराने इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा, भारत रत्न मदन मोहन मालवीय, पं.गोविंद बल्लभ पंत, उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरूप पाठक, प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, सुप्रीम कोर्ट के कई मुख्य न्यायाधीश, महान शिक्षविद् तथा देश को संवारने वाले हजारों ब्यूरोक्रेट्स दिए हैं। इन महानविभूतियों ने जो मानक तय किए आज उस पर पूरा देश चल रहा है लेकिन 1887 में स्थापित 127 वर्ष पुराने विश्वविद्यालय का यह इतिहास है। इस विश्वविद्यालय का वर्तमान उतना ही निराशजनक और दुख पहुंचाने वाला है। लंबी लड़ाई के बाद 14 जुलाई 2005 को विश्वविद्यालय को केंद्रीय दर्जा मिला था। इसके बाद उम्मीद की गई थी कि विश्वविद्यालय का पुराना गौरव एक बार फिर स्थापित होगा लेकिन इस 10 साल में परिसर लगातार रसातल में चलता गया। नित्य कलंकित करने वाली घटनाओं से इसकी साख लगातार गिरती गई और आज यहां अराजकता का नया अध्ययाय लिखा जा रहा है।
अराजकता पर्याय बन गया है विवि
0 कभी पूरब के ऑक्सफोर्ड के नाम से मशहूर इलाहाबाद विश्वविद्यालय अराजकता का पर्याय बन गया है। शिक्षक पर तो लगातार हमले हुए, कुलपति और उनका स्टाफ भी अछूता नहीं रहा। पिटाई के विरोध में शिक्षकाें ने सड़क पर मार्च किया लेकिन परिसर में अराजकता और शिक्षकों के बीच उठापटक किस कदर हावी है इसका अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि कुलपति पर हमला बोलने वाले तथा शिक्षकों को दौड़ाकर पीटने वालों को बरी कर दिया गया। उनके खिलाफ बोलने के लिए ही कोई आगे नहीं आया। परिसर में इस अराजकता की शुरुआत केंद्रीय दर्जा मिलने के पांच महीने बाद ही छात्रसंघ चुनाव में एक छात्र नेता की हत्या के बाद हो गया था जो आज तक बदस्तूर जारी है। परिसर में भय इस कदर व्याप्त है कि शिक्षक जिम्मेदारी वाला पद लेने के लिए ही तैयार नहीं हैं।
डिग्री बांटने की फैक्ट्री बना विवि
0 आचार्य नरेंद्र देव, पं.मदन मोहन मालवीय जैसे महानविभूतियों की तपोभूमि रहा यह परिसर अब सिर्फ डिग्री प्राप्प्त करने का माध्यम मात्र रह गया है। पिछले 10 साल में एक भी ऐसा रिसर्च नहीं हुआ जिसे विश्व में दूर भारत में ही चर्चा मिली हो। एक-दो शिक्षकों के खाते में कुछ व्यक्तिगत उपलब्धियों जरूर आईं हैं लेकिन वे भी आगे की रिसर्च के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन की सुस्त कार्यशैली के आगे लाचार हैं। विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 500 से अधिक पद खाली हैं। जबकि ओबीसी आरक्षण के बाद छात्र-छात्राओं की संख्या दोगुनी हो गई है। ऐसे में नियमित कक्षाएं तो दूर पढ़ाई की सिर्फ खानापूर्ति की जाती है वह भी शोधछात्रों के दम पर। यही कारण है कि विद्यार्थियों का रूझान इसके प्रति कम हुआ है और हर साल सीटें खाली रह जा रही हैं।
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एक साल से स्थाई कुलपति नहीं
0 इस विश्वविद्यालय की साख किस कदर गिर गई है इसका अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय की नजर में भी यहां की समस्याएं प्राथमिकता में नहीं है। स्थिति यह है कि छह विश्वविद्यालयों को कुलपति को देने वाले इस यूनिवर्सिटी को एक साल में स्थाई वाइस चासंलर नहीं मिल पाया। जबकि, पड़ोसी जिले के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में नए कुलपति की नियुक्ति पुराने का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही हो गई। यहां प्रोफेसेर एके सिंह ने पिछले साल 28 जुलाई को इस्तीफा दिया था लेकिन उनकी जगह आज तक नई तैनाती नहीं हो सकी है। इतना ही नहीं अन्य प्रमुख पद भी कार्यवाहकों के भरोसे हैं। विश्वविद्यालय के ऐक्ट में कुलपति, प्रति कुलपति, डीन, रजिस्ट्रार और वित्त अधिकारी के पद ही परिभाषित हैं लेकिन इनमें सिर्फ डीन्स की स्थाई नियुक्ति है।
पीएम से मिली निराशा
0 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनावी भाषण पूरी तरह से इलाहाबाद विश्वविद्यालय पर केंद्रित रहा। युवाओं से भरे परेड मैदान में मोदी की लाइन के बाद उम्मीदों की ताली बजी। उम्मीद जगी थी कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद स्थितियां संवरेंगी। पढ़ाई का माहौल फिर से स्थापित होने के साथ विश्वविद्यालय की इंजीनियरिंग और मेडिकल फैकेल्टी मांग पूरी होगी लेकिन सरकार की अनदेखी ने विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ शहरियों को भी निराश किया है।
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अराजकता पर्याय बन गया है विवि
0 कभी पूरब के ऑक्सफोर्ड के नाम से मशहूर इलाहाबाद विश्वविद्यालय अराजकता का पर्याय बन गया है। शिक्षक पर तो लगातार हमले हुए, कुलपति और उनका स्टाफ भी अछूता नहीं रहा। पिटाई के विरोध में शिक्षकाें ने सड़क पर मार्च किया लेकिन परिसर में अराजकता और शिक्षकों के बीच उठापटक किस कदर हावी है इसका अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि कुलपति पर हमला बोलने वाले तथा शिक्षकों को दौड़ाकर पीटने वालों को बरी कर दिया गया। उनके खिलाफ बोलने के लिए ही कोई आगे नहीं आया। परिसर में इस अराजकता की शुरुआत केंद्रीय दर्जा मिलने के पांच महीने बाद ही छात्रसंघ चुनाव में एक छात्र नेता की हत्या के बाद हो गया था जो आज तक बदस्तूर जारी है। परिसर में भय इस कदर व्याप्त है कि शिक्षक जिम्मेदारी वाला पद लेने के लिए ही तैयार नहीं हैं।
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डिग्री बांटने की फैक्ट्री बना विवि
0 आचार्य नरेंद्र देव, पं.मदन मोहन मालवीय जैसे महानविभूतियों की तपोभूमि रहा यह परिसर अब सिर्फ डिग्री प्राप्प्त करने का माध्यम मात्र रह गया है। पिछले 10 साल में एक भी ऐसा रिसर्च नहीं हुआ जिसे विश्व में दूर भारत में ही चर्चा मिली हो। एक-दो शिक्षकों के खाते में कुछ व्यक्तिगत उपलब्धियों जरूर आईं हैं लेकिन वे भी आगे की रिसर्च के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन की सुस्त कार्यशैली के आगे लाचार हैं। विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 500 से अधिक पद खाली हैं। जबकि ओबीसी आरक्षण के बाद छात्र-छात्राओं की संख्या दोगुनी हो गई है। ऐसे में नियमित कक्षाएं तो दूर पढ़ाई की सिर्फ खानापूर्ति की जाती है वह भी शोधछात्रों के दम पर। यही कारण है कि विद्यार्थियों का रूझान इसके प्रति कम हुआ है और हर साल सीटें खाली रह जा रही हैं।
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एक साल से स्थाई कुलपति नहीं
0 इस विश्वविद्यालय की साख किस कदर गिर गई है इसका अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय की नजर में भी यहां की समस्याएं प्राथमिकता में नहीं है। स्थिति यह है कि छह विश्वविद्यालयों को कुलपति को देने वाले इस यूनिवर्सिटी को एक साल में स्थाई वाइस चासंलर नहीं मिल पाया। जबकि, पड़ोसी जिले के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में नए कुलपति की नियुक्ति पुराने का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही हो गई। यहां प्रोफेसेर एके सिंह ने पिछले साल 28 जुलाई को इस्तीफा दिया था लेकिन उनकी जगह आज तक नई तैनाती नहीं हो सकी है। इतना ही नहीं अन्य प्रमुख पद भी कार्यवाहकों के भरोसे हैं। विश्वविद्यालय के ऐक्ट में कुलपति, प्रति कुलपति, डीन, रजिस्ट्रार और वित्त अधिकारी के पद ही परिभाषित हैं लेकिन इनमें सिर्फ डीन्स की स्थाई नियुक्ति है।
पीएम से मिली निराशा
0 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनावी भाषण पूरी तरह से इलाहाबाद विश्वविद्यालय पर केंद्रित रहा। युवाओं से भरे परेड मैदान में मोदी की लाइन के बाद उम्मीदों की ताली बजी। उम्मीद जगी थी कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद स्थितियां संवरेंगी। पढ़ाई का माहौल फिर से स्थापित होने के साथ विश्वविद्यालय की इंजीनियरिंग और मेडिकल फैकेल्टी मांग पूरी होगी लेकिन सरकार की अनदेखी ने विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ शहरियों को भी निराश किया है।