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धर्म शब्द का गलत प्रयोग ही देश की एकता व सहिष्णुता के लिए घातक: शिक्षाविद् डॉ. रक्षपाल सिंह
Sun, 12 Apr 2020 05:15 PM IST
Vikas Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़
Published by: Vikas Kumar
Updated Sun, 12 Apr 2020 05:15 PM IST
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डॉ. रक्षपाल सिंह
- फोटो : amar ujala
लॉकडाउन के बीच शिक्षाविद् डॉ. रक्षपाल सिंह इन दिनों सभी धर्मों के धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन कर रहे हैं। पुस्तकों के अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि धर्म शब्द का गलत प्रयोग ही देश की एकता व सहिष्णुता के लिए घातक है।
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डॉ. सिंह ने कहा कि किसी भी भाषा के साहित्य में कुछ ऐसे अति महत्वपूर्ण शब्द होते हैं, जिनका मनमाना प्रयोग पूरे समाज के लिए मुसीबतें पैदा करता है। भारतीय साहित्य में भी एक शब्द है, जिसमें पूरी मानवता को प्रभावित करने की शक्ति है और वह महत्वपूर्ण शब्द है ' धर्म '।
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धर्म की व्याख्या मनुस्मृति में " धृति क्षमा दमों अस्तेयं शौचं इंद्रिय विनिग्रह: धीर विद्या सत्यम क्रोधो दशकम धर्म लक्षणम " से लेकर समय समय पर " आत्मवत सर्वभूतेषु ", वसुधैव कुटुम्बकम ", आत्मन: प्रतिकूलानि परेशां न समाचरेत " सूत्रों के माध्यम से की गई है । इन सभी का भावार्थ ' मानवीय सदाचरण ' की ओर स्पष्ट संकेत देता है। कालांतर में धर्म की व्याख्या में ' ईश्वरीय शक्ति' का समावेश कर दिए जाने से इसको सनातन धर्म, वैदिक धर्म कहा जाने लगा। इसका परिणाम यह हुआ की धर्म का असली मर्म आचरण में उतारने की जगह लोग पूजा पाठ को ही धर्म मानने लगे।
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कालांतर में सदाचरण तो गौण हो गया और हकीकत यह बन गई की विश्व में विभिन्न सम्प्रदायों के लोगों का असली धर्म अर्थात सदाचरण को अपनाना तो दूर हो गया है और पूजा पाठ, इबादत अपने तथाकथित धर्मों के मान्य ईश्वरों के नाम जप का उच्चारण करना ही जरूरी हो गया। सदाचरण के मार्ग पर चलना भी लोगों के लिए कठिन होता है और पूजा, इबादत करना आसान, परिणामतः सामाजिक सहिष्णुता, एकता, सौहार्द, सद्द्भाव कुप्रभावित होती है।