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जो आज शत्रु संपत्तियां..वो थीं कभी नवाबों-जमींदारों की कोठियां

Mon, 27 Jun 2022 12:48 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Mon, 27 Jun 2022 12:48 AM IST
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Those enemy properties today..they were once the bungalow of nawabs-zamindars
दीवानी कचहरी के पीछे अनौना हाउस का मुख्य द्वार। - फोटो : CITY OFFICE
अभिषेक शर्मा
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कानूनी कार्यवाहियों, दावों-प्रतिदावों के बीच शत्रु संपत्तियों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। एक दौर वह था, जब शहर की सबसे बड़ी और आलीशान कोठियों में अनौना हाउस, धर्मपुर हाउस व पहासू हाउस शुमार थीं। इन कोठियों में एएमयू स्थापना के शुरुआती दौर की बैठकें हुआ करती थीं। इनमें से आज अनौना हाउस व धर्मपुर शत्रु संपत्ति घोषित हैं। बुलंदशहर जनपद के नवाब परिवारों ने ये आलीशान कोठियां बनवाईं। इनमें से अनौना हाउस कोठी अनौना नवाब की बेटी को अपने पिता से विरासत में मिली थी।
ये है अनौना हाउस वाली कोठी का इतिहास
अनौना नवाब की बेटी रफीकुनिशा के परपोते अब्दुल हफीज आज भी इसी कोठी में रहते हैं। वह बताते हैं कि उनकी पूर्वज रफीकुनिशा को यह कोठी अपने पिता अनौना नवाब से मिली थी। उन्होंने इस संपत्ति को 1928 में अलऔलाद वक्फ घोषित करते हुए अपने शौहर को मुतवल्ली बनाया। उनके देहांत के बाद उन्होंने अपने बेटे को मुतवल्ली बनाया। 1947 में बंटवारे के समय उनके बेटे पाकिस्तान चले गए। मगर वह नहीं गईं और बेटे के जाने पर उन्होंने अपने पोते यानि मेरे पिता मुजीबअली खान पिता को इसका मुतवल्ली बनाया। 1955 में उनका देहांत हो गया। बंटवारे के बाद इस संपत्ति को शत्रु संपत्ति घोषित किया गया। इसके खिलाफ हमारे पिता व दादी ने मुंबई स्थित कस्टोडियन कोर्ट की शरण ली। जहां हमारी दलील को स्वीकारा गया और इसे शत्रु संपत्ति नहीं करने का आदेश दिया। इसके बाद से हम लगातार यहां रह रहे हैं। इसमें 91 परिवार किराये पर हैं। पूर्व में भी कई बार जांच हो चुकी है। हां, यह सही है कि परिवार के कुछ लोग पाकिस्तान गए थे। उनके हिस्से की मेहरोत्रा कोठी शत्रु संपत्ति है, जिसे नीलामी में मेहरोत्रा परिवार ने खरीदा था।
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हरदुआगंज में है नवाब छतारी परिवार के फर्म मैनेजर की शत्रु संपत्ति
तहसील के अभिलेखों में हरदुआगंज कस्बे में थाने के बगल में करीब साढ़े छह बीघा जमीन आज भी नवाब छतारी परिवार के फर्म मैनेजर के नाम दर्ज है। इसे शत्रु संपत्ति घोषित किया गया है। जानकार बताते हैं कि नवाब रसीद अली खां की इस जमीन की देखरेख उनके फर्म मैनेजर मो.सईद खां किया करते थे। जो हरदुआगंज के ही रहने वाले थे। जब जमींदारी विनाश अधिनियम लागू हुआ तो नवाब परिवार की यह जमीन उनके फर्म मैनेजर मो.सईद खां के नाम तहसील अभिलेखों में दर्ज हो गई। बंटवारे के समय 1974 में मो.सईद खां परिवार के साथ पाकिस्तान के लाहौर के बहजोई में जाकर बस गए। तहसील अभिलेख में आज भी उनका नाम व उनका लाहौर का पता दर्ज है। हालांकि इस शत्रु संपत्ति में से कुछ जमीन पर बिजलीघर बन गया है।
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जलाली के पांच जमींदारों के घर की नीलामी, कृषि भूमि बेनामी
इतिहास के अनुसार मोहम्मद बिन तुगलक के बाद भारत भ्रमण पर आए मोरक्को के यात्री इब्न-ए-बतूता ने जिस जलाली कस्बे को भारत का सबसे बेहतर सांप्रदायिक सौहार्द वाला कस्बा बताया। उसी में कई जमींदार परिवार बंटवारे के समय पाकिस्तान गए। तहसील के अभिलेख आज भी इस बात की गवाही देते हैं। मगर सिस्टम की अनदेखी का परिणाम है कि कुछ जमींदारों की कोठियां और घर तो शत्रु संपत्ति घोषित होने के बाद नीलाम कर दिए गए। जिनमें अब दूसरे परिवार रहते हैं। मगर उनकी कृषि भूमि आज भी बेनामी पड़ी हैं। कस्बे के पुराने जमींदार आले हसन, इजलाल हसन, हफीजुल हसन, इनाम हसन, जमाल हसन वे लोग थे, जो बंटवारे के समय पाकिस्तान गए और उनकी कोठियां कृषि भूमि घोषित हुई। इन जमींदारों की बेशकीमती जमीनें यूं ही रह गईं। जिला प्रशासन के कस्टोडियन बनने के बाद उनके मकानों को जरूर नीलाम कर दिया गया। मगर इन परिवारों से जुड़ी करीब 500 बीघा से ज्यादा कृषि भूमि यूं ही बेनामी पड़ी है।

शत्रु संपत्तियों की जांच का काम जारी है। अनौना हाउस सहित कुछ जगहों पर आपत्तियां भी मिल रही हैं। उनके दस्तावेज भी देखे जा रहे हैं। जांच व सत्यापन के बाद ही उनके विषय में निर्णय लिया जाएगा। सभी जगहों पर तहसील टीम से भी सत्यापन कराया जाएगा।-प्रदीप वर्मा, सिटी मजिस्ट्रेट
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