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संस्कृत और वैदिक शिक्षा से होगा राष्ट्र का उत्थान : रामभद्राचार्य
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गांव लधौआ स्थित चीनी मिल परिसर में चल रही श्रीराम कथा के चौथे दिन कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी श्रीरामभद्राचार्य ने संस्कृत और वैदिक शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बताया। उन्होंने कहा कि जब-जब धर्म का प्रचार-प्रसार कम होता है, तब-तब आसुरी शक्तियां समाज पर प्रभावी होने लगती हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति जागरूक रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि वेदों, उपनिषदों और भारतीय संस्कृति की मूल धारा है। किशोर-किशोरियों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को संस्कृत सीखने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि अनेक हिंदू बच्चे अपने धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं से अनभिज्ञ हैं, जबकि अन्य धर्मों के बच्चे अपने धार्मिक साहित्य का ज्ञान रखते हैं। हिंदू समाज के उत्थान के लिए वैदिक शिक्षा का व्यापक प्रसार आवश्यक है। उन्होंने देशभर में वैदिक शिक्षा के विस्तार की योजना बनाने की बात कही, जिससे नई पीढ़ी वेद, दर्शन, ज्योतिष और भारतीय संस्कृति का ज्ञान प्राप्त कर सके। उन्होंने प्रभु श्रीराम की बाल लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन करते हुए बताया कि बालक राम अपने भाइयों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के साथ खेलते-कूदते हुए सभी का मन मोह लेते थे।
‘राम’ राष्ट्र की महिमा और संस्कृति के प्रतीक
जगद्गुरु ने कहा कि ‘राम’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा हैं। उन्होंने कहा कि ‘र’ का अर्थ राष्ट्र और ‘म’ का अर्थ महिमा है। इसलिए राम का स्मरण राष्ट्र की महिमा और गौरव का स्मरण है। उन्होंने श्रीराम के आदर्शों को अपनाने का आह्वान किया।
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आज होगा सीता स्वयंवर प्रसंग का वर्णन
कथा में श्री रामभद्राचार्य ने माता सीता के प्राकट्य प्रसंग का भी वर्णन किया। उन्होंने बताया कि राजा जनक ने जानकी जी के प्राकट्य पर दान और पुण्य के अनेक कार्य किए थे। कथा के अंत में उन्होंने बताया कि बृहस्पतिवार को श्रीराम-जानकी स्वयंवर प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया जाएगा। कथा स्थल ‘जय श्रीराम’ और ‘जय सीताराम’ के जयघोष से गूंजता रहा।
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उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि वेदों, उपनिषदों और भारतीय संस्कृति की मूल धारा है। किशोर-किशोरियों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को संस्कृत सीखने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि अनेक हिंदू बच्चे अपने धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं से अनभिज्ञ हैं, जबकि अन्य धर्मों के बच्चे अपने धार्मिक साहित्य का ज्ञान रखते हैं। हिंदू समाज के उत्थान के लिए वैदिक शिक्षा का व्यापक प्रसार आवश्यक है। उन्होंने देशभर में वैदिक शिक्षा के विस्तार की योजना बनाने की बात कही, जिससे नई पीढ़ी वेद, दर्शन, ज्योतिष और भारतीय संस्कृति का ज्ञान प्राप्त कर सके। उन्होंने प्रभु श्रीराम की बाल लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन करते हुए बताया कि बालक राम अपने भाइयों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के साथ खेलते-कूदते हुए सभी का मन मोह लेते थे।
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‘राम’ राष्ट्र की महिमा और संस्कृति के प्रतीक
जगद्गुरु ने कहा कि ‘राम’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा हैं। उन्होंने कहा कि ‘र’ का अर्थ राष्ट्र और ‘म’ का अर्थ महिमा है। इसलिए राम का स्मरण राष्ट्र की महिमा और गौरव का स्मरण है। उन्होंने श्रीराम के आदर्शों को अपनाने का आह्वान किया।
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आज होगा सीता स्वयंवर प्रसंग का वर्णन
कथा में श्री रामभद्राचार्य ने माता सीता के प्राकट्य प्रसंग का भी वर्णन किया। उन्होंने बताया कि राजा जनक ने जानकी जी के प्राकट्य पर दान और पुण्य के अनेक कार्य किए थे। कथा के अंत में उन्होंने बताया कि बृहस्पतिवार को श्रीराम-जानकी स्वयंवर प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया जाएगा। कथा स्थल ‘जय श्रीराम’ और ‘जय सीताराम’ के जयघोष से गूंजता रहा।