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ईदगाह और मस्जिदों पर सन्नाटा घर पर ही मना ईद का जश्न

Tue, 26 May 2020 01:06 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 26 May 2020 01:06 AM IST
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Silence on Idgah and mosques celebrates Eid at home
घर में परिवार के साथ ईद की नमाज अदा करते अकीकदमंद। - फोटो : CITY OFFICE
सोमवार 25 मई 2020 इतिहास में दर्ज हो गया है, जब पहली बार ईद की नमाज ईदगाह में नहीं हुई। शाहजमाल ईदगाह, जमालपुर ईदगाह, जामा मस्जिद ऊपरकोट, जामा मस्जिद एएमयू, बू अली शाह मस्जिद, शीशे वाली मस्जिद सहित सभी मस्जिदों में सन्नाटा पसरा रहा। केवल इमाम और मुतवल्लियों ने ही मस्जिदों में नमाज-ए-चाश्त अदाकर ईद की रस्म अदायगी की। रोजेदारों ने परिवार सहित सुबह जल्दी उठकर ईद की तैयारी की। नये कपड़े पहने, इत्र लगाया और नमाज-ए-चाश्त पढ़ी। कुछ लोगों ने इंटरनेट के माध्यम से इस रस्म को पूरा किया। इसके बाद लोगों ने फोन पर ही अपने रिश्तेदारों, दोस्तों को ईद की बधाई दी। रविवार को चांद रात से ही ये सिलसिला चल रहा था। इस बार गली मोहल्लों में भी मुसाफा यानी गले मिलना नहीं हुआ। लोगों ने कोरोना संक्रमण की बढ़ती दर को देखते हुए एहतियात बरती। हां, किशोरवय और युवाओं में त्योहार का उत्साह था, कुछ बाइक से घूमे तो कुछ दोस्तों संग बाहर भी निकले।
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शहर में लॉकडाउन 4.0 लागू होने के कारण सुबह सात से ग्यारह बजे तक फल, सब्जी, किराना, दूध की दुकानों में सैकड़ों लोग पहुंचे और जरूरी खरीददारी की। इसके बाद ज्यादातर वापस घरों को रवाना हो गए। सेंटर प्वाइंट, अमीरनिशां, दोदपुर, केलानगर, मेडिकल रोड, जमालपुर, रामघाट रोड, दुबे का पड़ाव, आगरा रोड में खरीददारी की भीड़ में कुछ त्योहारी रौनक दिखी। लेकिन सासनीगेट, देहलीगेट, ऊपरकोट, मामूभांजा, रेलवे रोड, मानिक चौक में लोग मायूस रहे। यहां सौ फीसदी लॉकडाउन के कारण घरों से निकलना नहीं हो पाया। राजनेताओं के आवास पर होने वाले ईद मिलन भी नहीं हुए।
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सुबह सात बजे : शाहजमाल ईदगाह पर सन्नाटा
यह पहली बार था कि ईद की नमाज के लिए खचाखच भरे रहने वाले शाहजमाल ईदगाह पर सन्नाटा था। यहां आरएएफ और पुलिस की मौजूदगी में व्रज वाहन ईदगाह के गेट के बाहर खड़ा था। महिला आरएएफ की टुकड़ी भी तैनात थी। केवल इक्का-दुक्का लोग पास में मौजूद शम्सुल आरफीन कब्रिस्तान की ओर जा रहे थे। जहां उन्हें फातिहा पढ़ना था। यहां से अंदर जाने वाले रास्तों पर आ रहे युवाओं को पुलिस बार-बार उनके मोहल्लों में वापस भेज रही थी। सवा आठ बजे तक यही सिलसिला चलता रहा।
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सुबह 7.45 बजे : बुजुर्गों की कब्र तक कम ही लोग पहुंच पाए
शाहजमाल के शम्सुल आरफीन कब्रिस्तान पर इक्का-दुक्का लोग पहुंचे। जहां उन्होंने अपने बुजुर्गों की कब्र पर फूल चढ़ाए, अगरबत्ती जलाकर खूशबू की और फातिहा पढ़ा। शहर के कुछ दूसरे कब्रिस्तान पर भी लोग पहुंचे। कई लोग सौ फीसदी लॉकडाउन के कारण कब्रिस्तान नहीं पहुंच सके। फातिहा में अल्लाह का कलाम पढ़ कर उन मरहूम बुजुर्गों को बख्शने की दुआ की जाती है। उनको इस दुआ का शबाब मिलता है। इस्लामिक मान्यता है कि जिनके परिवार वाले ईद या बकरीद की नमाज के बाद कब्रिस्तान पर फातिहा पढ़ने नहीं जाते हैं उनके घर खानदान के मरहूम बुजुर्ग पास की कब्र में दफन दूसरे मरहूम बुजुर्ग से इसकी शिकायत करते हैं। वह शिकायत में कहते हैं कि मैं बदनसीब हूं.. मेरे परिवार से कोई नहीं आया। आप खुशनसीब है कि आपके बच्चे आपको याद कर रहे हैं। ईद से ठीक पहले तक मरने वालों की भी ये पहली ईद मानी जाती है। ऐसे घरों में कब्रिस्तान तक नहीं पहुंचने का बड़ा अफसोस रहा।
सुबह आठ बजे : ऊपरकोट जामा मस्जिद खाली
ऊपरकोट की ऐतिहासिक जामा मस्जिद भी पूरी तरह से सन्नाटे में डूबी थी। यहां पहुंचे सिटी मजिस्ट्रेट विनीत कुमार को लोगों ने पेयजल आपूर्ति नहीं होने की समस्या बताई। इस पर उन्होंने नगर निगम के अधिकारियों से बात कर समस्या दूर करने को कहा। लोगों ने उनको ईद की बधाई भी दी। इस पूरे इलाके में बच्चे छतों से बाहर का नजारा लेते, मोबाइल चलाते हुए दिखे। ईद की जानी पहचानी रौनक, गले मिलने, खाने-पीने के साथ मस्ती करने के नजारे गायब थे।
सुबह 8 बजे : सदका ए फितर देने को ढूंढते रहे गरीब
रोजे रखें या न रखें। हर किसी को ढाई किलो गेहूं के दाम के बराबर पैसे गरीबों को देने होते हैं। मसलन, अगर घर में पांच लोग हैं तो साढ़े बारह किलो गेहूं की कीमत के अनुसार गरीबों को पैसे देने होते हैं। इस बार शाहजमाल में तो गरीब लोग लाइन में इंतजार करते दिखे, जिनको सदका एक फितर दिया गया लेकिन सिविल लाइंस, मेडिकल रोड, लाल डिग्गी, अमीरनिशां आदि कई इलाकों में गरीब लोग नहीं मिले। जिससे सदका ए फितर देने वालों को मायूसी हुई। लोगों ने इसकी शिकायत भी दर्ज कराई। रमजान के दौरान रोजे रखने पर किसी तरह की गलती या भूल होने की दशा में सदका ए फितर देने से अल्लाह रोजों को पाक साफ कर देता है। तीस रोजे के साथ इसको भी जरूरी माना गया है। अगर ईद की नमाज से ठीक पहले किसी बच्चे का जन्म हो तो उसका भी सदका ए फितर दिया जाएगा।
सुबह 8.15 बजे : मुस्लिम इलाकों में लॉकडाउन रही ईद
लॉकडाउन 4.0 लागू होने के कारण शहर की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले तीन थाना क्षेत्रों में ईद की रौनक नहीं दिखी। लाखों लोग अपने घरों, मोहल्लों और गलियों में कैद होकर रह गए। बैरिकेडिंग के कारण युवा और किशोर सड़कों तक नहीं आए। पुलिस भी बार बार इनको समझाबुझा कर बाहर निकलने से रोकती रही। सुबह सात से ग्यारह बजे तक बाजार खुलने के समय में भी इन तीनों थाना क्षेत्रों में लॉकडाउन की सख्ती रही। हां, बहुत जरूरतमंद लोगों को काम के लिए निकलने दिया गया।
सुबह 7 बजे : दूध की लंबी लाइन, सेवईं और मेवे की किल्लत रही
लॉकडाउन के कारण कई मोहल्लों में दूध, सेवईं, मेवा की किल्लत रही। आलम ये था कि निजरंनपुरी में दूध की दुकान पर इतनी लंबी लाइन लगी कि रामघाट रोड तक लोग बर्तन लेकर खड़े रहे। ईद पर दूध की खपत बढ़ने से पराग सहित दूसरे पैक्ड दूध भी सुबह जल्द ही खत्म हो गए। सासनीगेट, देहलीगेट और ऊपरकोट में सौ फीसदी लॉकडाउन के चलते पैक्ड दूध का ही सहारा रहा। अधिकांश लोगों को उम्मीद थी कि चांद रात में बाजार में कुछ ढील मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिसके चलते मेवे, सेवईं, फल, सब्जी, किराना की भी किल्लत रही।
लॉकडाउन में गरीबों में खूब बटी जकात
इस्लामिक मान्यता के अनुसार 100 रुपये की कमाई पर ढाई रुपये जकात देना लाजिमी है। इस बार लॉकडाउन में अधिकांश लोगों ने गरीबों और जरूरतमंद की मदद के लिए दिल खोल कर जकात निकाली। जिसको गरीबों में बांटा गया। इस काम में नेताओं ने भी बढ़ चढ़ कर काम किया। दरअसल, हर वो आदमी जिसके पास साढ़े सात तौले सोना या 52 तोले चांदी है या इतनी ही रकम मौजूद है, उसको हर हाल में जकात देनी है। जकात देने से उसका कमाया हुआ पैसा पाक साफ हो जाता है। जैसे कि ब्याज से जो रकम बढ़ी है, उसे जकात निकाल कर पाक साफ किया जा सकता है। जो लोग ये मानते हैं कि जकात देने से पैसा घटता है, वो गलत समझते हैं।
वालिदानों ने रिश्तेदारों की ईदी चुकाई
इस बार की ईद में बच्चों का भी नुकसान हुआ। उनको घर परिवार, खानदान, रिश्तेदारों से मिलने वाली ईदी नहीं मिली। इस पर बच्चों ने वालिदान से ही इसका हिसाब चुकता कर लिया। बाहर जाने की जिद करने वाले बच्चों ने अपने ही अम्मी अब्बू से बाकी रिश्तेदारों से मिलने वाली ईदी वसूली की।

पहली ईद पर संवर नहीं पाईं नई दुल्हनें
रमजान और ईद से ठीक पहले जिन ब्याहताओं ने ससुराल या मायके में कदम रखा था और लॉकडाउन में वापस नहीं जा सकीं उनकी ईद भी संजने संवरने के लिहाज से फीकी रही। बाहर जाकर ब्यूटी पार्लर में तैयार होने, हथेली और पांव में मेहंदी लगवाने का सपना अधूरा ही रह गया। जिन घरों में ही हाल ही में नई बहुएं आईं थी। वहां भी इसका उलहना देखा गया।

शाहजमाल ईदगाह पर पसरा सन्नाटा।

शाहजमाल ईदगाह पर पसरा सन्नाटा। - फोटो : CITY OFFICE

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