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अलीगढ़ की नुमाइश को नज्म में बयां किया है शकील बदायूंनी ने

Sat, 06 Feb 2021 07:24 PM IST
राजेश सिंह न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़। Published by: राजेश सिंह Updated Sat, 06 Feb 2021 07:24 PM IST
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Shakeel Badauni has described Aligarh's exhibition in Najm
मशहूर शायर शकील बदायूंनी। - फोटो : ब्यूूराे
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के पूर्व छात्र व मशहूर शायर शकील बदायूंनी ने राजकीय औद्योगिक एवं कृषि प्रदर्शनी (नुमाइश) पर एक नज्म लिखी थी, नुमाइश के मंजर को समेटती हुई यह नज्म भले ही आज अतीत के पन्नों में छिपी हो, लेकिन इसकी ताजगी अभी वैसी की वैसी ही है।
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एएमयू की उर्दू एकेडमी के पूर्व निदेशक डॉ. राहत अबरार कहते हैं कि शकील बदायूंनी सन 1936 में विश्वविद्यालय में पढ़ने आए थे। उन्होंने यहां से बीए किया। यहीं पर रहते हुए वह अपने समय के मशहूर लेखकों और साहित्यकारों के संपर्क में आए। उस समय अलीगढ़ की नुमाइश बड़ा आकर्षण हुआ करती थी।
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एएमयू में पढ़ने वाले विद्यार्थी शेरवानी पहन कर नुमाइश जाया करते थे, जो उनकी पहचान हुआ करती थी। नुमाइश का वह मंजर शकील ने अपनी नज्म नुमाइश ए अलीगढ़ में बयां किया है। यह नज्म शकील के काव्य संग्रह कुल्लियात शकील में भी शामिल है।
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नज्म का उनवान (शीर्षक) है नुमाइश ए अलीगढ़

शफ़क़ नज्अ' में ले रही थी सँभाला 

अँधेरे का ग़म खा रहा था उजाला 

सितारों के रुख़ से नक़ाब उठ रही थी 

फ़जाओं से मौज-ए-शबाब उठ रही थी 

मय-ए-जिंदगी जाम-ए-मय-नोश में थी 

वो कैफ़-ए-मसर्रत, वो लम्हात-ए-रंगीं 

वो अहसास-ए-मस्ती वो जज्बात-ए-रंगीं 

वो पुर-कैफ़ आलम वो दिलकश नजारे 

वो जल्वों के बहते हुए ख़ुश्क धारे 

वो नमकीन आग़ाज-ए-शब अल्लाह अल्लाह 

नुमाइश की वो ताब-ओ-तब अल्लाह अल्लाह 

वो बाब-ए-मुजम्मिल पे जश्न-ए-चराग़ाँ 

फ़लक पर हों जैसे सितारे दरख़्शाँ 

फ़जाओं में गूँजे हुए वो तराने 

वो जाँ-बख़्श नग़्मे वो पुर-लुत्फ़ गाने 

वो हर सम्त हुस्न-ओ-लताफ़त की जानें 

वो आरास्ता साफ़ सुथरी दुकानें 

कहीं पर है नज्जारा कारीगरी का 

कहीं गर्म होटल है पेशावरी का 

ब-क़द्र-ए-सुकूँ वो दिलों का बहलना 

अमीरों ग़रीबों का यकजा टहलना 

नुमायाँ नुमायाँ वो यारान-ए-कॉलेज 

वो इशरत-ब-दामाँ जवानान-ए-कॉलेज 

कोई तेज-दस्ती ओ चुस्ती पे नाजाँ 

कोई सेह्हत ओ तंदुरुस्ती पे नाजाँ 

कोई हुस्न की जल्वा-रेजी पे माइल 

कोई शोख़ नजरों की तेजी पे माइल 

इधर चश्म-ए-हैराँ की नज्जारा-साजी 

उधर हुस्न वालो की जल्वा-तराजी 

ख़िरामाँ ख़िरामाँ वो हम-जोलियों में 

निकलती हुई मुख़्तलिफ़ टोलियों में 

नक़ाबों में वो बे-नक़ाबी का आलम 

जो लाता है दिल पर ख़राबी का आलम 

किसी का वो चेहरे से आँचल उठाना 

किसी का किसी से निगाहें चुराना 

कभी यक-ब-यक चलते चलते ठहरना 

निगाहों से जल्वों की इस्लाह करना 

कभी इक तवज्जोह दुकानों की जानिब 

कभी इक नजर नौजवानों की जानिब 

तमाशा ग़रज कामयाब आ रहा था 

नुमाइश पे गोया शबाब आ रहा था 

इधर हम भी बज्म-ए-तख़य्युल सजा कर 

खड़े हो गए एक दुक्काँ पे आ कर 

नजर मिल गई दफ़अतन इक नजर से 

धड़कने लगा दिल मोहब्बत के डर से 

इधर तो नजर से जबीं-साइयाँ थीं 

उधर से भी कुछ हिम्मत-अफ़्जाइयाँ थीं 

ख़लिश दिल की दोनों को तड़पा गई थी 

मोहब्बत की मंजिल क़रीब आ गई थी 

ख़यालात में इस तरफ़ इक तलातुम 

लबों पर उधर हल्का हल्का तबस्सुम 

निगाहों से अहद-ए-वफ़ा हो रहा था 

इशारों से मतलब अदा हो रहा था 

इधर इश्क़ के बाम-ओ-दर सज रहे थे 

घड़ी में जो देखा तो नौ बज रहे थे 

यकायक जवाँ कुछ मिरे पास आए 

जो थे आस्तीनों पे बिल्ले लगाए 

कहा इतनी तकलीफ़ फ़रमाइएगा 

नुमाइश से तशरीफ़ ले जाइएगा 

ग़रज चल दिए घर को मजबूर हो कर 

मोहब्बत के जल्वों से मामूर हो कर 

हुइ जारी रही थी अजब हालत-ए-दिल 

कोई छीन ले जैसे पढ़ते में नॉवेल 

हम इस तरह बाब-ए-मुजम्मिल से निकले 

लहू जैसे टूटे हुए दिल से निकले 

बहर-ए-हाल अब भी वही है नुमाइश 

नवेद-ए-तरब दे रही है नुमाइश 

वही जश्न है और वही जिंदगी है 

मगर जैसे हर शय में कोई कमी है 

अरे ओ निगाहों पे छा जाने वाली 

मिरे दिल को रह रह के याद आने वाली 

तिरी तरह जल्वा-नुमा है नुमाइश 

तिरे हुस्न का आइना है नुमाइश 

नुमाइश में तेरी लताफ़त है पिन्हाँ 

नुमाइश में तेरी नजाकत है पिन्हाँ 

निगाहों को नाहक़ तिरी जुस्तुजू है 

यक़ीनन नुमाइश के पर्दे में तू है
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