Aligarh: 23 साल बाद आया फैसला, सामूहिक दुष्कर्म में दो रिटायर कोतवाल सहित सात को 20-20 साल की सजा
घटना 30 अक्तूबर 2002 की तड़के पांच बजे की। इसका मुकदमा खैर थाने में 16 नवंबर को 13-14 वर्षीय अनुसूचित किशोरी के पिता ने दर्ज कराया। इसमें आरोप लगाया कि उनकी बेटी सुबह खेत में गई थी। इस दौरान रामेश्वर, प्रकाश व साहब सिंह हत्या के इरादे से अगवा कर ले गए।
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अलीगढ़ के खैर क्षेत्र की अनुसूचित किशोरी के अपहरण व सामूहिक दुष्कर्म के 23 वर्ष पुराने बहुचर्चित मुकदमे में दो सेवानिवृत्त कोतवालों सहित सात दोषियों को अदालत ने 20-20 साल की सजा सुनाई है। सजा पाने वालों में मुकदमे का प्रथम विवेचक तत्कालीन खैर एसएचओ भी शामिल है। यह निर्णय सीबीसीआईडी जांच की चार्जशीट व किशोरी के बयानों के आधार पर एडीजे फास्ट ट्रैक प्रथम अंजू राजपूत की अदालत ने सुनाया है। साथ में अर्थदंड भी नियत किया है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार ये घटना 30 अक्तूबर 2002 की तड़के पांच बजे की। इसका मुकदमा खैर थाने में 16 नवंबर को 13-14 वर्षीय अनुसूचित किशोरी के पिता ने दर्ज कराया। इसमें आरोप लगाया कि उनकी बेटी सुबह खेत में गई थी। इस दौरान रामेश्वर, प्रकाश व साहब सिंह हत्या के इरादे से अगवा कर ले गए। पुलिस ने 26 दिसंबर को टप्पल के हामिदपुर के पास से किशोरी के गांव के ही बोना व पप्पू उर्फ बिजेंद्र से कब्जा मुक्त कराया।
दोनों आरोपियों को जेल भेजा गया। बाद में इन्हीं दोनों के खिलाफ चार्जशीट दायर कर दी। पिता द्वारा नामजद किए गए लोगों के नाम चार्जशीट से हटा दिए। बाद में मुकदमे की विवेचना हाईकोर्ट के निर्देश पर सीबीसीआईडी ने करते हुए तीन बार में चार्जशीट दायर की। इसमें गांव के रामेश्वर, प्रकाश, खेमचंद्र के अलावा खैर के पूर्व चेयरमैन पति व बसपा से विधानसभा चुनाव लड़ चुके राकेश मौर्या, किशोरी के गांव के साहब सिंह, इगलास के गांव अनुपिया के जयप्रकाश, गांव के ही रहने वाले वर्तमान में सहारनपुर में रह रहे सेवानिवृत्त एसएचओ रामलाल वर्मा, उसका बेटा बॉबी व अब सेवानिवृत्त प्रथम मुकदमा विवेचक तत्कालीन खैर एसएचओ लखनऊ सरोजनी नगर एलडीए कॉलोनी सेक्टर-वन-64 निवासी पुत्तूलाल प्रभाकर को आरोपी बनाया गया।
न्यायालय में इन सभी के खिलाफ सत्र परीक्षण हुआ। सत्र परीक्षण के बीच में साहब सिंह की मृत्यु हो गई, जबकि बसपा नेता राकेश मौर्या का नाम शासन की मुकदमा वापसी की सिफारिश के चलते न्यायालय के निर्देश पर मुकदमे से उन्मोचित कर दिया गया। अब साक्ष्यों व गवाही के आधार पर न्यायालय ने उन दोनों बोना व पप्पू उर्फ बिजेंद्र को बरी कर दिया, जिनसे किशोरी को प्रथम चार्जशीट में कब्जा मुक्त किया गया था।
अदालत ने सात आरोपियों रामेश्वर, प्रकाश, खेमचंद्र, जयप्रकाश, सेवानिवृत्त एसएचओ रामलाल वर्मा, बॉबी व तत्कालीन खैर एसएचओ पुत्तूलाल प्रभाकर को सामूहिक दुष्कर्म का दोषी करार देकर 20-20 वर्ष सजा से दंडित किया है। साथ में रामेश्वर, प्रकाश व रामलाल पर 60-60 हजार व बाकी चार पर 50-50 हजार रुपये अर्थदंड नियत किया है। अर्थदंड में से 75 फीसदी राशि पीडि़त को देने के आदेश दिए हैं।
किशोरी के बयानों में पलटी खैर पुलिस की कहानी
उस समय सुर्खियों में रहे अपहरण प्रकरण में खैर पुलिस की कहानी को किशोरी ने न्यायालय में दर्ज कराए बयानों में पलट कर रख दिया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार पुलिस के प्रथम विवेचक ने मुकदमे में 12 जनवरी 2003 को चार्जशीट दायर कर दी लेकिन, न्यायालय में किशोरी के बयान नहीं कराए। नामजद आरोपियों के नाम भी हटा दिए।
इसके खिलाफ किशोरी के पिता ने एक वाद न्यायालय में नामजदों के खिलाफ दर्ज किया। साथ में हाईकोर्ट में किशोरी के बयान कराने की अर्जी दायर की। हाईकोर्ट के निर्देश पर 17 फरवरी 2003 को किशोरी के बयान हुए। इसमें किशोरी ने बताया कि तीन नामजद रामेश्वर, प्रकाश व साहब सिंह उसे खेत से मुंह में कपड़ा ठूंसकर उठाकर ले गए। कुछ आगे गाड़ी में डाल दिया। उस गाड़ी को राकेश मौर्या चला रहे थे, जबकि रामलाल उसमें सवार थे। उसे एक गोदाम पर ले जाया गया। जहां कई दिन तक वह बेहोश रही व बंधक रखा गया। वहां उसके साथ क्रमवार सभी नामजद व अन्य ने दुष्कर्म किया। इसके बाद उसे जयप्रकाश के गांव एक कमरे में बंधक रखा गया। यहां भी उसे बेहोश रखा जाता था। वहां भी नामजदों व अन्य द्वारा क्रमवार दुष्कर्म किया गया। इसके बाद उसे गाड़ी में नामजद कई दिन तक लेकर हरियाणा में घूमे। फिर उसे हामिदपुर पर छोड़ गए। जहां उसे गांव के बोना व पप्पू मिल गए। उन्होंने उसकी मदद की। वहीं से पुलिस व उसके पापा आए। साथ थाने लेकर गए। उसने पापा को पूरी बात बताई। पुलिस ने कोई बात नहीं की।
बयान के आधार पर सीबीसीआईडी जांच के निर्देश
किशोरी के इसी बयान के आधार पर पिता ने हाईकोर्ट में दूसरी अपील की कि किशोरी के बयानों के आधार पर जिस घटना में खुद थाना प्रभारी आरोपी हो। वहां से न्याय की आस नहीं। इसलिए किसी अन्य एजेंसी से विवेचना कराई जाए। इसी आधार पर हाईकोर्ट के निर्देश पर मुकदमे की विवेचना सीबीसीआईडी को मिली।
हाईकोर्ट ने आदेश पलटे तो पिता गया सुप्रीम कोर्ट
जब किशोरी के बयान के आधार पर आरोपी बने लोगों को खुद के खिलाफ जानकारी मिली तो वे हाईकोर्ट तक गए। जहां उन्होंने यह अपील दायर की कि किशोरी के पिता ने अदालत को गुमराह कर दोनों आदेश अपने पक्ष में करा लिए हैं। इस पर हाईकोर्ट ने अपने दोनों आदेशों पर रोक भी लगा दी थी।
इसके बाद किशोरी का पिता 2004 में सुप्रीम कोर्ट गया। तब तक महिला अपराध के मामलों में महिला के बयान न्यायालय में कराना जरूरी कर दिया गया था। इसी के चलते सुप्रीम कोर्ट में किशोरी के बयान को आधार बनाकर उसे मुकदमे में लागू कराने का अनुरोध किया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले में विधिक आधार पर कार्रवाई के निर्देश जिले की अदालत को दिए। इसके बाद न्यायालय में सभी आरोपियों पर सत्र परीक्षण शुरू हुआ। अभियोजन की ओर से एडीजीसी हर्षवर्धन सिंह के साथ साथ सीबीसीआईडी से अधिवक्ता हैदर अली व आरक्षी पवन कुमार भी पैरवी में शामिल रहे। साथ में कुल छह गवाह वादी, पीडि़त, चिकित्सक व सीबीसीआईडी के तीन विवेचकों के बयान हुए।
कंधे पर अदालत में पेश किया दुष्कर्म का दोषी बुजुर्ग
इस मुकदमे में दोषियों में से एक रामलाल वर्मा सबसे बुजुर्ग 87 वर्ष का है, जबकि प्रकाश की उम्र 78 वर्ष है। इसी तरह 70 वर्षीय खेमचंद्र दिव्यांग है। सेवानिवृत्त विवेचक पुत्तू लाल भी 71 वर्ष का है। मंगलवार को सभी को दोषी करार देकर जेल भेज दिया गया था। बुधवार को जब पेशी हुई तो पांव से न चल पाने के कारण खेमचंद्र को कंधे पर दीवानी हवालात से कोर्ट तक लाया गया। बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने सभी की बुजुर्गी, प्रथम अपराध व दो के सरकारी सेवक होने का हवाला देकर कम से कम सजा का अनुरोध किया। मगर अभियोजन की ओर से सभी अधिवक्ताओं ने अधिकतम सजा का अनुरोध किया।
प्रकरण में जो आरोप अन्य पर थे। वही आरोप बसपा नेता राकेश मौर्या पर थे लेकिन राकेश का नाम मुकदमे से हट गया। अब न्यायालय के निर्णय के आधार पर राकेश के खिलाफ उनके स्तर से नाम वापस शामिल कराने के संबंध में अपील के लिए लिखा पढ़ी की जाएगी।-हर्षवर्धन सिंह, एडीजीसी
हमारी ओर से तर्क रखा गया कि पुलिस कहानी सही है। वादी पक्ष ने गांव की पट्टे की भूमि की पेशबंदी में नामजदों को व उनका सहयोग करने वालों या बात न मानने वालों को आरोपी बनाया है। इस संबंध में साक्ष्य भी पेश किए गए। मगर न्यायालय ने हमारे तथ्य बिना सुने निर्णय सुनाया है। हम आगे अपील करेंगे। - चंद्रशेखर दीक्षित, अधिवक्ता बचाव पक्ष