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अलीगढ़ः बीकेडी से शुरू हुआ रालोद का सफर...दो दशक तक रही बादशाहत में अब आड़े आए कई ब्रेकर
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अभिषेक शर्मा
प्रदेश में इन दिनों सियासी पारा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। चुनावी बिसात बिछने लगी है। इसी बीच आज हम चर्चा कर रहे हैं किसानों की पार्टी कहलाने वाले राष्ट्रीय लोकदल के इतिहास की। इस पार्टी के अतीत पर गौर करें तो देश के प्रधानमंत्री रहे चौ. चरण सिंह द्वारा कांग्रेस से अलग होकर खड़े किए गए भारतीय क्रांति दल का नया रूप राष्ट्रीय लोकदल है। कहा जाए तो उनकी सियासी विरासत इस दल के जरिये संभाली जा रही है। बात अगर अपने जिले में इस दल के प्रभुत्व की करें तो चौ. चरण सिंह और उनकी अगुवाई वाले दल का यहां गहरा प्रभाव रहा। दो दशक तक जिले की इगलास सीट सूबे का बड़ा सियासी केंद्र रही। उस दौर में इसे मिनी छपरौली (चौ.चरण सिंह की अपना विधानसभा क्षेत्र) भी कहा गया। क्योंकि कांग्रेस से अलग होकर चौ. चरण सिंह ने जाटलैंड को अपनी सियासत का केंद्र बनाया। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष रहे राष्ट्रीय नेता मोहनलाल गौतम के सामने अपनी पत्नी गायत्री देवी को चुनाव लड़ाकर उन्हें पटखनी देकर कांग्रेस को अपनी ताकत का अहसास कराया।
ऐसे शुरू हुआ बीकेडी की सियासत का प्रभुत्व
आजादी के बाद चौ. चरण सिंह कांग्रेस के साथ ही थे। धीरे-धीरे पार्टी में यूपी के तीन गुट बने। जिनमें एक गुट अलीगढ़ के ही सीबी गुप्ता का, दूसरा पूर्वांचल के कमलापति त्रिपाठी का और तीसरा पश्चिम के चरण सिंह का बना। इनमें से कमलापति त्रिपाठी गुट में अलीगढ़ से मोहनलाल गौतम थे, जबकि चरण सिंह गुट में अलीगढ़ से ही चौ. शिवदान सिंह थे। इसी गुटबाजी का परिणाम रहा कि कांग्रेस ने इगलास से शिवदान सिंह का टिकट काटकर मोहनलाल गौतम को 1967 के चुनाव में लड़ाया। इससे चरण सिंह बेहद नाराज हुए। इन्हीं तमाम बातों को लेकर उन्होंने अलग संगठन बीकेडी बनाया, जिसमें सोशलिस्ट, जनसंघ आदि दल शामिल रहे। इस दल ने मिलकर 1967 में ही सरकार बनाई और खुद चरण सिंह मुख्यमंत्री बने। दो साल बाद उन्होंने विधानसभा भंग कर 1969 में फिर चुनाव कराया और इगलास से अपनी पत्नी गायत्री देवी को बीकेडी के बैनर से चुनाव लड़ाया। अलीगढ़ से इस दल ने कुल चार सीटें जीतीं। यूपी में 125 सीटें इस दल ने जीतीं। इगलास इस दल का सियासी केंद्र रहा और शिवदान सिंह उनके प्रतिनिधि रहे। यहीं से प्रदेश की सियासत चलने लगी।
लोकदल को नहीं मिली मान्यता, बीकेडी रहा बैनर
1974 के चुनाव में चरण सिंह ने लोकदल के नाम से पार्टी की मान्यता के लिए आवेदन किया। मगर मान्यता न मिलने के कारण बीकेडी के बैनर से ही चुनाव लड़ा गया। साथ में लोकदल का भी नया बैनर चुनाव में लहराया। देश के कई दिग्गज कर्पूरी ठाकुर, बीजू पटनायक आदि इस दल में साथ रहे। इस चुनाव में इगलास व गंगीरी सीट बीकेडी ने जीती। इमरजेंसी के बाद सातों सीटों पर कब्जे का इतिहास भी 1977 में चरण सिंह के नेतृत्व में रचा गया। उन्हीं के नेतृत्व में कांग्रेस विरोधी सभी दलों ने जनता पार्टी के नाम से चुनाव लड़ा। अलीगढ़ में उनके करीबी राजेंद्र सिंह, बाबू सिंह, मोहज्जिज अली बेग चुनाव जीते। वहीं जनसंघ के कल्याण सिंह व किशनलाल दिलेर जीते। इसके अलावा संग्राम सिंह व प्यारेलाल जीते थे। 1980 के चुनाव में जनता पार्टी सोशलिस्ट के नाम से चुनाव लड़ा गया। इस चुनाव में उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में राजेंद्र सिंह की घोषणा कर दी। राजेंद्र सिंह को नेता विरोधी दल बनाया गया। इस बार भी जिले से तीन सीटों पर जीत दर्ज की गई।
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लोकदल का हुआ उदय, मुलायम सिंह भी साथ आए
1985 के चुनाव में लोकदल का उदय हो गया। लोकदल के बैनर पर इगलास व खैर सीट पर जीत दर्ज हुई। इसी चुनाव में मुलायम सिंह की पार्टी में एंट्री हुई। उन्हें नेता विरोधी इसलिए बनाया गया कि चरण सिंह पर जातिवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा। इसी आरोप से बचने के लिए मुलायम सिंह को विरोधी दल के नेता का जिम्मा और राजेंद्र सिंह को प्रदेशाध्यक्ष का जिम्मा मिला। 1989 के चुनाव में पिता के देहांत के बाद अजित सिंह के हाथ पार्टी की कमान आई। यह चुनाव जनता दल के बैनर तले लड़ा गया, मगर पार्टी जिले में हारी। सिर्फ एक खैर सीट जीत सकी। खुद राजेंद्र सिंह इगलास से चुनाव हार गए।
चरण सिंह की बेटी को चुनाव जिताया, पर होने लगा अलगाव
1989 में ही अजित सिंह ने राजेंद्र सिंह को संसदीय बोर्ड का चेयरमैन बना दिया। बाद में विधानसभा चुनाव हारने के कारण उन्हें एमएलसी का चुनाव जिताया गया। इसके बाद 1991 के चुनाव में चरण सिंह की बेटी डॉ. ज्ञानवती को जनता दल से इगलास से चुनाव जिताया। इस बार बरौली से दलवीर सिंह भी चुनाव जीते। मगर 1989 के चुनाव के बाद प्रदेश में मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनाने संबंधी अजित सिंह के समर्थन ने राजेंद्र सिंह को गहरा धक्का दिया। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को राजनीति से दूर रखना और अजित सिंह के परिवार से दूरी बनाना शुरू कर दिया।
लोकदल पर हुआ टकराव, जनता दल सक्रिय
1991 में राजेंद्र सिंह के एमएलसी बनने के बाद दोनों परिवारों में अलगाव के चलते लोकदल की विरासत को लेकर टकराव हुआ तो अजित सिंह ने जनता दल के बैनरतले चुनाव प्रदेश में लड़ा और अलीगढ़ जिले की खैर सीट पर जगवीर सिंह को जिताया। 1996 के चुनाव में मतभेद इस कदर दिखाई दिए कि जिले की एक भी सीट अजित सिंह न जीत सके। इस चुनाव के बाद राजेंद्र सिंह सियासत से पूरी तरह दूर हो गए। 2002 में रालोद के बैनरतले चुनाव लड़ा गया। मगर हार का सामना देखा। 2007 में खैर व इगलास में जीत कर वापसी हुई। 2012 में खैर, इगलास के साथ बरौली भी जीती। मगर 2017 में फिर हार गए।
लोकदल आज भी राजेंद्र सिंह के परिवार के पास
दोनों परिवारों में मतभेद का परिणाम यह रहा कि अदालत के जरिये राजेंद्र सिंह के पुत्र सुनील सिंह ने लोकदल का वारिसान हक मिल गया। इसी के चलते अजित सिंह को राष्ट्रीय लोकदल के नाम से नई पार्टी का गठन करना पड़ा।
- ये रहा चरण सिंह/अजित सिंह के नेतृत्व वाले दलों का इतिहास -
-1951, 1957,1962, 1967 के परिणाम:- चरण सिंह कांग्रेस के साथ थे।
-1969 के परिणाम:-इगलास से गायत्री देवी, कोल से पूरनचंद्र, खैर से महेंद्र सिंह, चंडौस से महावीर सिंह बीकेडी से चुनाव जीते।
-1974 के परिणाम:-इगलास से राजेंद्र सिंह, गंगीरी से बाबू सिंह बीकेडी से चुनाव जीते।
-1977 के परिणाम:-गंगीरी से बाबू सिंह, अतरौली से कल्याण सिंह, शहर से मोहज्जिज अली बेग, कोल से किशनलाल दिलेर, इगलास से राजेंद्र सिंह, बरौली से संग्राम सिंह, खैर से प्यारेलाल जनता पार्टी से जीते।
-1980 के परिणाम:-गंगीरी से बाबू सिंह, अलीगढ़ से ख्वाजा हलीम, इगलास से राजेंद्र सिंह जनता पार्टी सेक्यूलर से जीते।
-1985 के परिणाम:-इगलास से राजेंद्र सिंह, खैर से जगवीर सिंह लोकदल से जीते।
-1989 के परिणाम:-गंगीरी से बाबू सिंह, खैर से जगवीर सिंह जनता दल से जीते।
-1991 के परिणाम:-इगलास से डॉ. ज्ञानवती सिंह, बरौली से दलवीर सिंह जनता दल से जीते।
-1993 के परिणाम:-खैर से जगवीर सिंह जनता दल से जीते।
-1996, 2002 के परिणाम:-किसी सीट पर जीत नहीं।
-2007 के परिणाम:-इगलास से विमलेश सिंह, खैर से सत्यपाल सिंह रालोद से जीते।
-2012 के परिणाम:-इगलास से त्रिलोकीराम दिवाकर, बरौली से दलवीर सिंह, खैर से भगवती प्रसाद रालोद से जीते।
-2017 के परिणाम:-सभी सीट हारे।
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प्रदेश में इन दिनों सियासी पारा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। चुनावी बिसात बिछने लगी है। इसी बीच आज हम चर्चा कर रहे हैं किसानों की पार्टी कहलाने वाले राष्ट्रीय लोकदल के इतिहास की। इस पार्टी के अतीत पर गौर करें तो देश के प्रधानमंत्री रहे चौ. चरण सिंह द्वारा कांग्रेस से अलग होकर खड़े किए गए भारतीय क्रांति दल का नया रूप राष्ट्रीय लोकदल है। कहा जाए तो उनकी सियासी विरासत इस दल के जरिये संभाली जा रही है। बात अगर अपने जिले में इस दल के प्रभुत्व की करें तो चौ. चरण सिंह और उनकी अगुवाई वाले दल का यहां गहरा प्रभाव रहा। दो दशक तक जिले की इगलास सीट सूबे का बड़ा सियासी केंद्र रही। उस दौर में इसे मिनी छपरौली (चौ.चरण सिंह की अपना विधानसभा क्षेत्र) भी कहा गया। क्योंकि कांग्रेस से अलग होकर चौ. चरण सिंह ने जाटलैंड को अपनी सियासत का केंद्र बनाया। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष रहे राष्ट्रीय नेता मोहनलाल गौतम के सामने अपनी पत्नी गायत्री देवी को चुनाव लड़ाकर उन्हें पटखनी देकर कांग्रेस को अपनी ताकत का अहसास कराया।
ऐसे शुरू हुआ बीकेडी की सियासत का प्रभुत्व
आजादी के बाद चौ. चरण सिंह कांग्रेस के साथ ही थे। धीरे-धीरे पार्टी में यूपी के तीन गुट बने। जिनमें एक गुट अलीगढ़ के ही सीबी गुप्ता का, दूसरा पूर्वांचल के कमलापति त्रिपाठी का और तीसरा पश्चिम के चरण सिंह का बना। इनमें से कमलापति त्रिपाठी गुट में अलीगढ़ से मोहनलाल गौतम थे, जबकि चरण सिंह गुट में अलीगढ़ से ही चौ. शिवदान सिंह थे। इसी गुटबाजी का परिणाम रहा कि कांग्रेस ने इगलास से शिवदान सिंह का टिकट काटकर मोहनलाल गौतम को 1967 के चुनाव में लड़ाया। इससे चरण सिंह बेहद नाराज हुए। इन्हीं तमाम बातों को लेकर उन्होंने अलग संगठन बीकेडी बनाया, जिसमें सोशलिस्ट, जनसंघ आदि दल शामिल रहे। इस दल ने मिलकर 1967 में ही सरकार बनाई और खुद चरण सिंह मुख्यमंत्री बने। दो साल बाद उन्होंने विधानसभा भंग कर 1969 में फिर चुनाव कराया और इगलास से अपनी पत्नी गायत्री देवी को बीकेडी के बैनर से चुनाव लड़ाया। अलीगढ़ से इस दल ने कुल चार सीटें जीतीं। यूपी में 125 सीटें इस दल ने जीतीं। इगलास इस दल का सियासी केंद्र रहा और शिवदान सिंह उनके प्रतिनिधि रहे। यहीं से प्रदेश की सियासत चलने लगी।
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लोकदल को नहीं मिली मान्यता, बीकेडी रहा बैनर
1974 के चुनाव में चरण सिंह ने लोकदल के नाम से पार्टी की मान्यता के लिए आवेदन किया। मगर मान्यता न मिलने के कारण बीकेडी के बैनर से ही चुनाव लड़ा गया। साथ में लोकदल का भी नया बैनर चुनाव में लहराया। देश के कई दिग्गज कर्पूरी ठाकुर, बीजू पटनायक आदि इस दल में साथ रहे। इस चुनाव में इगलास व गंगीरी सीट बीकेडी ने जीती। इमरजेंसी के बाद सातों सीटों पर कब्जे का इतिहास भी 1977 में चरण सिंह के नेतृत्व में रचा गया। उन्हीं के नेतृत्व में कांग्रेस विरोधी सभी दलों ने जनता पार्टी के नाम से चुनाव लड़ा। अलीगढ़ में उनके करीबी राजेंद्र सिंह, बाबू सिंह, मोहज्जिज अली बेग चुनाव जीते। वहीं जनसंघ के कल्याण सिंह व किशनलाल दिलेर जीते। इसके अलावा संग्राम सिंह व प्यारेलाल जीते थे। 1980 के चुनाव में जनता पार्टी सोशलिस्ट के नाम से चुनाव लड़ा गया। इस चुनाव में उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में राजेंद्र सिंह की घोषणा कर दी। राजेंद्र सिंह को नेता विरोधी दल बनाया गया। इस बार भी जिले से तीन सीटों पर जीत दर्ज की गई।
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लोकदल का हुआ उदय, मुलायम सिंह भी साथ आए
1985 के चुनाव में लोकदल का उदय हो गया। लोकदल के बैनर पर इगलास व खैर सीट पर जीत दर्ज हुई। इसी चुनाव में मुलायम सिंह की पार्टी में एंट्री हुई। उन्हें नेता विरोधी इसलिए बनाया गया कि चरण सिंह पर जातिवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा। इसी आरोप से बचने के लिए मुलायम सिंह को विरोधी दल के नेता का जिम्मा और राजेंद्र सिंह को प्रदेशाध्यक्ष का जिम्मा मिला। 1989 के चुनाव में पिता के देहांत के बाद अजित सिंह के हाथ पार्टी की कमान आई। यह चुनाव जनता दल के बैनर तले लड़ा गया, मगर पार्टी जिले में हारी। सिर्फ एक खैर सीट जीत सकी। खुद राजेंद्र सिंह इगलास से चुनाव हार गए।
चरण सिंह की बेटी को चुनाव जिताया, पर होने लगा अलगाव
1989 में ही अजित सिंह ने राजेंद्र सिंह को संसदीय बोर्ड का चेयरमैन बना दिया। बाद में विधानसभा चुनाव हारने के कारण उन्हें एमएलसी का चुनाव जिताया गया। इसके बाद 1991 के चुनाव में चरण सिंह की बेटी डॉ. ज्ञानवती को जनता दल से इगलास से चुनाव जिताया। इस बार बरौली से दलवीर सिंह भी चुनाव जीते। मगर 1989 के चुनाव के बाद प्रदेश में मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनाने संबंधी अजित सिंह के समर्थन ने राजेंद्र सिंह को गहरा धक्का दिया। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को राजनीति से दूर रखना और अजित सिंह के परिवार से दूरी बनाना शुरू कर दिया।
लोकदल पर हुआ टकराव, जनता दल सक्रिय
1991 में राजेंद्र सिंह के एमएलसी बनने के बाद दोनों परिवारों में अलगाव के चलते लोकदल की विरासत को लेकर टकराव हुआ तो अजित सिंह ने जनता दल के बैनरतले चुनाव प्रदेश में लड़ा और अलीगढ़ जिले की खैर सीट पर जगवीर सिंह को जिताया। 1996 के चुनाव में मतभेद इस कदर दिखाई दिए कि जिले की एक भी सीट अजित सिंह न जीत सके। इस चुनाव के बाद राजेंद्र सिंह सियासत से पूरी तरह दूर हो गए। 2002 में रालोद के बैनरतले चुनाव लड़ा गया। मगर हार का सामना देखा। 2007 में खैर व इगलास में जीत कर वापसी हुई। 2012 में खैर, इगलास के साथ बरौली भी जीती। मगर 2017 में फिर हार गए।
लोकदल आज भी राजेंद्र सिंह के परिवार के पास
दोनों परिवारों में मतभेद का परिणाम यह रहा कि अदालत के जरिये राजेंद्र सिंह के पुत्र सुनील सिंह ने लोकदल का वारिसान हक मिल गया। इसी के चलते अजित सिंह को राष्ट्रीय लोकदल के नाम से नई पार्टी का गठन करना पड़ा।
- ये रहा चरण सिंह/अजित सिंह के नेतृत्व वाले दलों का इतिहास -
-1951, 1957,1962, 1967 के परिणाम:- चरण सिंह कांग्रेस के साथ थे।
-1969 के परिणाम:-इगलास से गायत्री देवी, कोल से पूरनचंद्र, खैर से महेंद्र सिंह, चंडौस से महावीर सिंह बीकेडी से चुनाव जीते।
-1974 के परिणाम:-इगलास से राजेंद्र सिंह, गंगीरी से बाबू सिंह बीकेडी से चुनाव जीते।
-1977 के परिणाम:-गंगीरी से बाबू सिंह, अतरौली से कल्याण सिंह, शहर से मोहज्जिज अली बेग, कोल से किशनलाल दिलेर, इगलास से राजेंद्र सिंह, बरौली से संग्राम सिंह, खैर से प्यारेलाल जनता पार्टी से जीते।
-1980 के परिणाम:-गंगीरी से बाबू सिंह, अलीगढ़ से ख्वाजा हलीम, इगलास से राजेंद्र सिंह जनता पार्टी सेक्यूलर से जीते।
-1985 के परिणाम:-इगलास से राजेंद्र सिंह, खैर से जगवीर सिंह लोकदल से जीते।
-1989 के परिणाम:-गंगीरी से बाबू सिंह, खैर से जगवीर सिंह जनता दल से जीते।
-1991 के परिणाम:-इगलास से डॉ. ज्ञानवती सिंह, बरौली से दलवीर सिंह जनता दल से जीते।
-1993 के परिणाम:-खैर से जगवीर सिंह जनता दल से जीते।
-1996, 2002 के परिणाम:-किसी सीट पर जीत नहीं।
-2007 के परिणाम:-इगलास से विमलेश सिंह, खैर से सत्यपाल सिंह रालोद से जीते।
-2012 के परिणाम:-इगलास से त्रिलोकीराम दिवाकर, बरौली से दलवीर सिंह, खैर से भगवती प्रसाद रालोद से जीते।
-2017 के परिणाम:-सभी सीट हारे।