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100 साल पुरानी निशात कोठी विवाद: 29 वर्ष बाद एएमयू के पक्ष में आया फैसला, कब्जेदारों को खाली करने का आदेश

Tue, 08 Sep 2026 11:18 AM IST
Chaman Kumar Sharma अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़
अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़ Published by: Chaman Kumar Sharma Updated Tue, 08 Sep 2026 11:18 AM IST
सार

अदालत ने एएमयू के पक्ष में डिक्री करते हुए आदेश दिया है कि प्रतिवादी एक महीने के भीतर विवादित संपत्ति से अपना कब्जा हटाकर वास्तविक कब्जा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को सौंप दें। वाद दायर करने से लेकर कब्जा मिलने की तारीख तक 200 रुपये प्रति माह की दर से हर्जाना अदा करें।

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100-year-old Nishat Kothi dispute
100 साल पुरानी निशात कोठी विवाद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अलीगढ़ की लाल डिग्गी स्थित 100 साल पुरानी निशात कोठी के विवाद में अपर सिविल जज कनिष्ठ प्रभाग कोर्ट संख्या-3 की न्यायाधीश महिमा सिंह ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के पक्ष में फैसला सुनाया है। 29 साल तक चले इस केस में अदालत ने पूर्व कर्मचारी सखावत हुसैन के विधिक वारिसों के दावे को खारिज करते हुए संपत्ति पर से अपना कब्जा हटाने और हर्जाना अदा करने का आदेश दिया है। इस परिसर में पांच परिवार रहते हैं और करीब एक हजार वर्ग गज जमीन को लेकर विवाद चल रहा था।

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यह वाद एएमयू के रजिस्ट्रार और फाइनेंस ऑफिसर के माध्यम से दायर किया गया था। वाद के अनुसार, लाल डिग्गी रोड स्थित निशात कोठी (मकान और भूमि सहित) की मूल स्वामिनी स्वर्गीय बीबी फातिमा बेगम थीं। उन्होंने 14 जुलाई 1926 को एक पंजीकृत बैनामा के जरिये इस संपत्ति को एएमयू को वक्फ (दान) कर दिया था, जिसके बाद एएमयू इस वक्फ संपत्ति का मुतवल्ली (प्रबंधक) बन गया। यह संपत्ति उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, लखनऊ में भी पंजीकृत है।
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यह संपत्ति यूनिवर्सिटी के तत्कालीन कर्मचारी स्वर्गीय सखावत हुसैन को उनके कार्यकाल के दौरान केयरटेकर के रूप में रहने के लिए दी गई थी। वर्ष 1992 में सखावत हुसैन को यूनिवर्सिटी ने बर्खास्त कर दिया था, जिसके बाद वे केयरटेकर भी नहीं रहे। यूनिवर्सिटी ने 29 दिसंबर 1997 को कानूनी नोटिस भेजकर उनका लाइसेंस समाप्त करते हुए 30 दिन के भीतर कब्जा हटाने के लिए कहा था लेकिन संपत्ति खाली नहीं की गई। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने बेदखली और हर्जा इस्तेमाली की वसूली के लिए वाद दायर किया था।

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प्रतिवादियों ने दिए थे ये तर्क
प्रतिवादी पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया था कि स्वर्गीय सखावत हुसैन 1980 से एएमयू में कार्यरत थे और यूनिवर्सिटी उनकी तनख्वाह से हाउस रेंट अलाउंस (एचआरए) काटती थी, इसलिए वे बतौर किरायेदार वहां आबाद हैं। उन पर रेंट कंट्रोल एक्ट लागू होता है। हालांकि, अदालत ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों और दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि डीड के अनुसार एएमयू इस संपत्ति का वैध मुतवल्ली है। प्रतिवादी यह साबित करने में असफल रहे कि वे संपत्ति के किरायेदार थे, बल्कि साक्ष्यों से स्पष्ट हुआ कि वे केवल केयरटेकर के रूप में वहां रहे थे।

अदालत का आदेश
अदालत ने एएमयू के पक्ष में डिक्री करते हुए आदेश दिया है कि प्रतिवादी एक महीने के भीतर विवादित संपत्ति से अपना कब्जा हटाकर वास्तविक कब्जा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को सौंप दें। वाद दायर करने से लेकर कब्जा मिलने की तारीख तक 200 रुपये प्रति माह की दर से हर्जाना अदा करें। आदेश का पालन नहीं करने पर यूनिवर्सिटी न्यायालय के माध्यम से कब्जा और हर्जाने की राशि वसूलने के लिए स्वतंत्र होगी।

हम यहां 40 साल से रह रहे हैं। मेरे पिता एएमयू के कर्मचारी रहे। एएमयू ने 21 साल से किराया नहीं लिया। जो भी फैसला आया है उसको हम ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।-मुनिस खान, सखावत हुसैन पक्ष
अदालत के फैसले के बाद अब एएमयू अपनी जमीन पर कब्जा लेगा। एएमयू की जमीन को सुरक्षित किया जाएगा।-प्रो. मोहम्मद नवेद, प्रॉक्टर, एएमयू

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