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Aligarh News: दीवारों पर उकेरने दें लकीरें..इसी से तो खुलेंगे बालमन के राज
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दीवार पर पेंसिल से दो साल के बच्चे द्वारा उकेरी गईं आकृतियां।
- फोटो : samvad
यदि आपके बच्चे भी दीवारों पर लकीरें खींचते हैं तो उन्हें डांटे नहीं बल्कि शाबाशी दें, उन्हें अपने मन की कल्पनाशीलता को उड़ान भरने दें। डांटने से बच्चे सहम जाते हैं और स्वतंत्र रूप से अपने मन की करना और सोचना छोड़ देते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के ललित कला विभाग द्वारा 120 बच्चों पर किए गए अध्ययन में इसका खुलासा हुआ है।
विभाग के डॉ. आबिद हादी के निर्देशन में लवली वार्ष्णेय ने पांच साल तक बाल कला के विभिन्न चरणों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि बचपन से किशोरावस्था तक कला के स्वरूप में होने वाला बदलाव सीधे तौर पर उनके संज्ञानात्मक विकास से जुड़ा होता है। जब बच्चे दीवार या अन्य जगह कोई लकीर खींचते हैं और उन्हें डांट पड़ती है तो वह डर जाते हैं व रचनात्मकता के भाव से मुंह मोड़ने लगते हैं।
अध्ययन में स्क्रिब्लिंग (लकीरें बनाना), ड्राइंग, पेंटिंग और मूर्तिकला जैसी कलात्मक अभिव्यक्तियों में समय के साथ होने वाले बदलावों को भी देखा गया। इसमें पाया गया कि बच्चों की रचनात्मकता पर मस्तिष्क विकास, सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का गहरा प्रभाव पड़ता है।
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अध्ययन में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के स्कूलों व घरों में प्रतिभागियों को अपनी पसंद के विषयों पर चित्र बनाने के लिए कहा गया। चित्रों का विश्लेषण प्रसिद्ध कला शिक्षाविद विक्टर लोवेनफेल्ड द्वारा बताए गए कलात्मक विकास के छह चरणों स्क्रिब्लिंग यानी घसीटना या आड़ी-तिरछी लकीरें खींचना, पूर्व नियोजित ( प्री-स्कीमैटिक), योजनाबद्ध (स्कीमैटिक), यथार्थवादी, जैविक (ऑर्गेनिक) और किशोरावस्था के आधार पर किया गया। इन चरणों की तुलना बच्चों के मानसिक विकास स्तर से कर उनकी संज्ञानात्मक आयु का आकलन किया गया।
उम्र के साथ बदलती है कला की शैली
1–3 वर्ष: अनियंत्रित लकीरों से हाथ-आंख, समन्वय और मोटर स्किल विकसित होती हैं।
3–5 वर्ष: चित्रों में प्रतीक और सरल आकृतियां दिखने लगती हैं।
5–8 वर्ष: चित्र अधिक व्यवस्थित और पहचान योग्य बनते हैं।
8–12 वर्ष: चित्रों में यथार्थ, अनुपात और गहराई दिखाई देती है।
12 वर्ष के बाद: कला व्यक्तिगत भावनाओं और अनुभवों की अभिव्यक्ति बन जाती है।
अगर माता-पिता और शिक्षक बच्चों की कला के विकास चरणों को समझें, तो वह सही मार्गदर्शन देकर बच्चों के मानसिक और रचनात्मक विकास को बेहतर बना सकते हैं। कला शिक्षा बच्चों को सरल समझ से परिपक्व कलात्मक सोच तक पहुंचाती है।
-डॉ. आबिद हादी, अध्यक्ष, फाइन आर्ट्स, एएमयू
सौन्दर्यात्मक तरीके से किया गया कार्य ही कला
विश्व कला दिवस बुधवार को मनाया जा रहा है। चित्रकार शिवाशीष शर्मा बताते हैं कि कला मतलब सौन्दर्यात्मक तरीके से किया गया कार्य है। ललित कलाओं की संख्या पांच बताई गई है। इनमें चित्रकला, मूर्तिकला, नृत्य, गायन और वादन शामिल है, लेकिन कला शब्द सुनते ही मस्तिष्क में केवल चित्रकला की छवि उत्पन्न हो जाती है। करतारपुर कॉरिडोर तक अपनी चित्रकारी दर्शाने वाले शिवाशीष को वर्ष 2008 में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम से सर्वश्रेष्ठ चित्रकार का पुरस्कार मिला चुका है। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से शिवाशीष को शिक्षार्थी बाल चित्रकला सम्मान मिल चुका है।
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विभाग के डॉ. आबिद हादी के निर्देशन में लवली वार्ष्णेय ने पांच साल तक बाल कला के विभिन्न चरणों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि बचपन से किशोरावस्था तक कला के स्वरूप में होने वाला बदलाव सीधे तौर पर उनके संज्ञानात्मक विकास से जुड़ा होता है। जब बच्चे दीवार या अन्य जगह कोई लकीर खींचते हैं और उन्हें डांट पड़ती है तो वह डर जाते हैं व रचनात्मकता के भाव से मुंह मोड़ने लगते हैं।
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अध्ययन में स्क्रिब्लिंग (लकीरें बनाना), ड्राइंग, पेंटिंग और मूर्तिकला जैसी कलात्मक अभिव्यक्तियों में समय के साथ होने वाले बदलावों को भी देखा गया। इसमें पाया गया कि बच्चों की रचनात्मकता पर मस्तिष्क विकास, सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का गहरा प्रभाव पड़ता है।
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अध्ययन में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के स्कूलों व घरों में प्रतिभागियों को अपनी पसंद के विषयों पर चित्र बनाने के लिए कहा गया। चित्रों का विश्लेषण प्रसिद्ध कला शिक्षाविद विक्टर लोवेनफेल्ड द्वारा बताए गए कलात्मक विकास के छह चरणों स्क्रिब्लिंग यानी घसीटना या आड़ी-तिरछी लकीरें खींचना, पूर्व नियोजित ( प्री-स्कीमैटिक), योजनाबद्ध (स्कीमैटिक), यथार्थवादी, जैविक (ऑर्गेनिक) और किशोरावस्था के आधार पर किया गया। इन चरणों की तुलना बच्चों के मानसिक विकास स्तर से कर उनकी संज्ञानात्मक आयु का आकलन किया गया।
उम्र के साथ बदलती है कला की शैली
1–3 वर्ष: अनियंत्रित लकीरों से हाथ-आंख, समन्वय और मोटर स्किल विकसित होती हैं।
3–5 वर्ष: चित्रों में प्रतीक और सरल आकृतियां दिखने लगती हैं।
5–8 वर्ष: चित्र अधिक व्यवस्थित और पहचान योग्य बनते हैं।
8–12 वर्ष: चित्रों में यथार्थ, अनुपात और गहराई दिखाई देती है।
12 वर्ष के बाद: कला व्यक्तिगत भावनाओं और अनुभवों की अभिव्यक्ति बन जाती है।
अगर माता-पिता और शिक्षक बच्चों की कला के विकास चरणों को समझें, तो वह सही मार्गदर्शन देकर बच्चों के मानसिक और रचनात्मक विकास को बेहतर बना सकते हैं। कला शिक्षा बच्चों को सरल समझ से परिपक्व कलात्मक सोच तक पहुंचाती है।
-डॉ. आबिद हादी, अध्यक्ष, फाइन आर्ट्स, एएमयू
सौन्दर्यात्मक तरीके से किया गया कार्य ही कला
विश्व कला दिवस बुधवार को मनाया जा रहा है। चित्रकार शिवाशीष शर्मा बताते हैं कि कला मतलब सौन्दर्यात्मक तरीके से किया गया कार्य है। ललित कलाओं की संख्या पांच बताई गई है। इनमें चित्रकला, मूर्तिकला, नृत्य, गायन और वादन शामिल है, लेकिन कला शब्द सुनते ही मस्तिष्क में केवल चित्रकला की छवि उत्पन्न हो जाती है। करतारपुर कॉरिडोर तक अपनी चित्रकारी दर्शाने वाले शिवाशीष को वर्ष 2008 में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम से सर्वश्रेष्ठ चित्रकार का पुरस्कार मिला चुका है। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से शिवाशीष को शिक्षार्थी बाल चित्रकला सम्मान मिल चुका है।

दीवार पर पेंसिल से दो साल के बच्चे द्वारा उकेरी गईं आकृतियां।- फोटो : samvad