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हिंदी दिलाती है पहचान, पहले खुद तो करो सम्मान : केडी सिंह
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हिंदी, हम हिंदी भाषियों के लिए एक भाषा मात्र नहीं है, और न ही यह केवल सम्प्रेषण की सुविधा के लिए एक बोली मात्र है। हिंदी हमारे व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है। हम हिंदी में ही सोचते हैं, हिंदी में ही बोलते हैं और हिंदी में ही लिखते हैं।
इसलिए हिंदी से हमारा एक आत्मिक संबंध है। हम खुद को हिंदी में ही अभिव्यक्त करते हैं। हिंदी भाषा के प्रति यह सोच बदलनी होगी कि इसे बोलने या लिखने वाले को सम्मान नहीं मिलता है। हिंदी देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी सम्मान दिलाती है। बस जरूरत है, इसके सम्मान की शुरूआत खुद से शुरू करने की। अमर उजाला फाउंडेशन के अभियान ‘हिंदी हैं हम’ के तहत बातचीत में पीसीएस अधिकारी केडी सिंह ने ये बाते कहीं।
अलीगढ़ मंडल के आरटीओ प्रशासन केडी सिंह गौर लोकसेवक होने के साथ ही कवि और व्यंगकार हैं। उन्होंने शेष अगले पृष्ठ पर, हाशिये पर, लिखना न था कुछ, होते करते, एतद्दवारा, जब जिंदगी मुस्कुरा दी... जैसी किताबें लिखी हैं। उन्हें उप्र हिंदी संस्थान से शरद जोशी सर्जना सम्मान, बालकृष्ण शर्मा नवीन, नामित पुरस्कार मिल चुका है। मूलरूप से बांदा जिले के रहने वाले केडी सिंह बताते हैं कि उन्हें पिता रामगोपाल सिंह की प्रेरणा से हिंदी साहित्य से लगाव हुआ। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा में हिंदी में प्रथम श्रेणी के अंक प्राप्त किए।
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हिंदी के प्रति इसी अभिरुचि के चलते, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में भी मुख्य परीक्षा के लिए हिंदी साहित्य और दर्शन शास्त्र को चुना। 1998 में पीसीएस परीक्षा में 12वां स्थान हासिल किया। 2019 में इंडोनेशिया के बाली में हिंदी दिवस के अवसर पर वहां की सरकार ने आमंत्रित किया। हिंदी को लेकर भारत-इंडोनेशिया की संस्कृति और साहित्य पर व्याख्यान दिया। वह बताते हैं कि विदेशों में हिंदी को बहुत ही सम्मान की निगाह से देखा जाता है। विदेशी हिंदी सीखने को बहुत उत्साहित रहते हैं।
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इसलिए हिंदी से हमारा एक आत्मिक संबंध है। हम खुद को हिंदी में ही अभिव्यक्त करते हैं। हिंदी भाषा के प्रति यह सोच बदलनी होगी कि इसे बोलने या लिखने वाले को सम्मान नहीं मिलता है। हिंदी देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी सम्मान दिलाती है। बस जरूरत है, इसके सम्मान की शुरूआत खुद से शुरू करने की। अमर उजाला फाउंडेशन के अभियान ‘हिंदी हैं हम’ के तहत बातचीत में पीसीएस अधिकारी केडी सिंह ने ये बाते कहीं।
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अलीगढ़ मंडल के आरटीओ प्रशासन केडी सिंह गौर लोकसेवक होने के साथ ही कवि और व्यंगकार हैं। उन्होंने शेष अगले पृष्ठ पर, हाशिये पर, लिखना न था कुछ, होते करते, एतद्दवारा, जब जिंदगी मुस्कुरा दी... जैसी किताबें लिखी हैं। उन्हें उप्र हिंदी संस्थान से शरद जोशी सर्जना सम्मान, बालकृष्ण शर्मा नवीन, नामित पुरस्कार मिल चुका है। मूलरूप से बांदा जिले के रहने वाले केडी सिंह बताते हैं कि उन्हें पिता रामगोपाल सिंह की प्रेरणा से हिंदी साहित्य से लगाव हुआ। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा में हिंदी में प्रथम श्रेणी के अंक प्राप्त किए।
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हिंदी के प्रति इसी अभिरुचि के चलते, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में भी मुख्य परीक्षा के लिए हिंदी साहित्य और दर्शन शास्त्र को चुना। 1998 में पीसीएस परीक्षा में 12वां स्थान हासिल किया। 2019 में इंडोनेशिया के बाली में हिंदी दिवस के अवसर पर वहां की सरकार ने आमंत्रित किया। हिंदी को लेकर भारत-इंडोनेशिया की संस्कृति और साहित्य पर व्याख्यान दिया। वह बताते हैं कि विदेशों में हिंदी को बहुत ही सम्मान की निगाह से देखा जाता है। विदेशी हिंदी सीखने को बहुत उत्साहित रहते हैं।