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दादा दादी और नाना नानी से पहचान कराता एक जीवन

Mon, 09 May 2016 01:19 AM IST
कौशल कुमार ओझा
कौशल कुमार ओझा Updated Mon, 09 May 2016 01:19 AM IST
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Grandparents and maternal grandparents identifies a life of
म्यूजियम - फोटो : महीपाल ‌सिंह
भारत की गौरवशाली विरासत को बचाने के लिए पद्मश्री हकीम प्रो. जिल्लुर्रहमान ने अपनी जिंदगी और उम्रभर की कमाई झोंक दी है।
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इनके द्वारा निर्मित दोदपुर कीइब्ने सिना एकेडमी के झरोखे से आप अलीगढ़ ही नहीं, अद्भुत भारत के इतिहास एवं संस्कृति का दर्शन कर सकते है। ये एकेडमी अपने म्यूजियम और लाइब्रेरी से आपको अपने पूर्वजों के करीब लाती है।
देश की गुलामी के समय कुछ विदेशी इतिहासकारों ने भारतीयों में इतिहास बोध का अभाव होने का आरोप लगता रहा था। एएमयू के एके तिब्बिया कॉलेज से सेवानिवृत्त हकीम प्रो. जिल्लुर्रहमान भी अपने यूरोप एवं अन्य देशों के भ्रमण काल में ऐसे सवालों से दोचार हो चुके हैं। भारत में विरासत एवं तहजीब को संरक्षित रखने के लिए संग्रहालय का अभाव है। यूरोप में 50 हजार की आबादी वाले शहरों में भी म्यूजियम हैं। बड़े शहरों में तो म्यूजियम की संख्या 10 तक पहुंचा दी है।
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प्रो. जिल्लुर्रहमान का मानना है कि किसी भी देश या समाज को सभ्य बनने में करीब डेढ़ सौ साल यानी छह पीढ़ी खप जाती है। यानी सुसंस्कृति होने से पहले शिक्षा, पैसा एवं संस्कृति के बदलाव के दौरे से गुजरना पड़ता है। भारत 1947 में आजाद हुआ। अभी पहली या दूसरे चरण की पीढ़ी है। देश में तालीम नई-नई है। देश में दादा-दादी, नाना-नानी द्वारा इस्तेमाल बर्तन, कपड़े हमारी विरासत हैं। वह हमें उनके समय, उनके रहन-सहन एवं जीवन स्तर का अहसास कराती है।
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दुखद तस्वीर है कि आज के फ्लैट कल्चर एवं गांव से शहरों की ओर हो रहे पलायन से हमारी विरासत जमींदोज हो रही है। इसे नहीं बचाया जाएगा तो इन चीजों के साथ हमारी विरासत भी खो जाएगी। इसीलिए मैंने म्यूजियम में लोगों से दादा-दादी एवं नाना-नानी द्वारा इस्तेमाल किए गए सामानों को देने के लिए हाथ फैलाया है ताकि उसके माध्यम से उनके समय को पकड़ा जा सके। डेढ़ सौ साल बाद नई पीढ़ी देखेगी कि यह हमारी विरासत है और हमारी जड़े कहां तक है।
जिंदा कौमें अपनी विरासत को बचाने की कोशिश करती हैं। वह इसकी हिफाजत करती है। कुतुब मीनार, लाल किला और ताज महल ही हमारी विरासत नहीं। दादा-दादी, नाना-नानी द्वारा इस्तेमाल सामान भी विरासत हैं। शहर में विकसित हो रहे फ्लैट कल्चर से बड़ा नुकसान हो रहा है।

अभी नहीं संभाला गया तो ये विरासत नष्ट हो जाएगी। आजादी के बाद से हमाी संस्कृति में तेजी से बदलाव आया है। 80 साल बाद (आजादी के बाद करीब 70 साल गुजर गए है) जब शिक्षा एवं पैसा हासिल हो जाएगा, तो लोग अपनी विरासत की खोज करेंगे। उनके लिए यह म्यूजियम बनाया है। जिंदगी भर की कमाई एकेडमी को सौंप दी है। केयर टेकर के रूप में इसको देख रहा हूं। मेरी बीबी एवं बच्चों ने भी इसके लिए बड़ी कुर्बानी दी है। - प्रो. जिल्लुर्रहमान, संस्थापक इब्न सिना एकेडमी

 
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