हिंदी पत्रकारिता दिवस: अलीगढ़ के पांच पत्रकार जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को दी चुनौती, यातनाएं झेलकर दी शहादत
पहले हिंदी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड की स्मृति में हर वर्ष हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर पढ़िए देशसेवा और जनजागरण को समर्पित अलीगढ़ के पांच पत्रकारों की विरासत को सामने लाती चमन शर्मा की यह विशेष रिपोर्ट...
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विस्तार
जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाना भी जोखिम भरा था, तब अलीगढ़ के कुछ पत्रकारों ने कलम के दम पर सत्ता को चुनौती देने का साहस दिखाया। किसी ने जेल की यातनाएं झेलीं, किसी ने राजद्रोह के मुकदमे सहे तो किसी ने अपनी लेखनी से स्वतंत्रता आंदोलन को नई धार दी। 30 मई 1826 को कलकत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित पहले हिंदी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड की स्मृति में हर वर्ष हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर पढ़िए देशसेवा और जनजागरण को समर्पित अलीगढ़ के पांच पत्रकारों की विरासत को सामने लाती चमन शर्मा की यह विशेष रिपोर्ट...
इन्हें मिली काला पानी की सजा: होती लाल वर्मा
आजादी का अमृत महोत्सव के जिला समन्वयक सुरेंद्र शर्मा के अनुसार, 1887 में जन्मे होतीलाल वर्मा अलीगढ़ के शुरुआती राष्ट्रवादी पत्रकारों में थे। 1908 में सरकार विरोधी टिप्पणी वाले टेलीग्राम के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया। राजद्रोह के मुकदमे में उन्हें छह वर्ष के काला पानी की सजा सुनाई गई। वे अलीगढ़ के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी पत्रकारों में गिने जाते हैं।
- इनके बारे में
वरिष्ठ पत्रकार होतीलाल वर्मा का जन्म सन् 1887 में हुआ था। वह कोलकाता से प्रकाशित समाचारपत्र वन्दे मातरम में अलीगढ़ के संवाददाता थे। बचपन में माता-पिता के निधन के बाद उन्हें आगरा के बोर्डिंग हाउस में भर्ती कराया गया। उन्होंने कुछ समय तक साप्ताहिक समाचार पत्र "जाट समाचार" का संपादन भी किया। होतीलाल ने ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, कोरिया और हांगकांग का दौरा किया था। हाउस ऑफ कॉमन्स में उनके कई मित्र थे। सन् 1908 में उन्होंने मुजफ्फरपुर कांड के दोषियों को फांसी दिए जाने पर वन्दे मातरम को एक टेलीग्राम भेजा। इस टेलीग्राम में सरकार के बारे में टिप्पणी की गई थी। मई 1908 में उन्हें जाट बोर्डिंग हाउस से गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आईपीसी की धारा 124 ए के तहत राजद्रोह का मुकदमा चला। होतीलाल को छह वर्ष की काले पानी की सजा सुनाई गई।
यातनाएं झेलकर दी शहादत: रमेश चंद्र आर्य
1942 के अलीगढ़ स्टेशन बम कांड के बाद विजयगढ़ निवासी रमेश चंद्र आर्य को गिरफ्तार किया गया। क्रांतिकारियों के नाम बताने से इनकार करने पर जेल में यातनाएं दी गईं, जिसके चलते 18 जून 1943 को उनका निधन हो गया।
- इनके बारे में
अमर शहीद रमेश चंद्र आर्य का जन्म 3 मार्च 1910 को विजयगढ़ में हुआ था। वह "वीर अर्जुन" समाचारपत्र के सह संपादक थे। अलीगढ़ में 24 सितंबर 1942 को हुए स्टेशन बम कांड में उन्हें गिरफ्तार किया गया। तत्कालीन प्रशासन चाहता था कि वह क्रांतिकारी आसिफ अली का नाम भी लें। उनके मना करने पर 18 जून 1943 को अलीगढ़ जेल के कुएं में उन्हें उल्टा लटकाकर यातनाएं दी गईं। इन यातनाओं के कारण वह शहीद हो गए।
पत्रकारिता और आंदोलन साथ-साथ: मदनलाल हितैषी
1918 में जन्मे मदनलाल हितैषी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे। उन्होंने अलीगढ़ से एक अखबार का प्रकाशन शुरू किया और पत्रकारिता को जनजागरण का माध्यम बनाया। उनके परिवार द्वारा आज भी इस समाचार पत्र का प्रकाशन किया जा रहा है।
- इनके बारे में
क्रांतिकारी मदनलाल हितैषी स्टेशन बम कांड से चर्चा में आए थे। देशभक्ति उन्हें बचपन से ही मिली थी। महज 10 वर्ष की उम्र में उन्होंने गवर्नमेंट हाईस्कूल से यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहरा दिया था। क्रोधित अंग्रेज अफसर ने उन्हें स्कूल की छत से फेंक दिया था। उनका जन्म 1918 में वैश्य परिवार में हुआ था। गांधी के साथ आंदोलन को गति देने के लिए मोर्चा निकालना उनका रोज का कार्य था। उन्होंने अलीगढ़ से "दैनिक प्रकाश" समाचारपत्र निकाला। उनके परिजनों द्वारा आज भी इसका संचालन अनवरत रूप से किया जा रहा है। 10 जनवरी 1970 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
लेखनी से जगाई राष्ट्रीय चेतना: अक्षय कुमार जैन
30 दिसंबर 1915 को विजयगढ़ में जन्मे अक्षय कुमार जैन स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे। उन्होंने ब्रज क्षेत्र के आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और बाद में एक राष्ट्रीय अंग्रेजी अखबार में संपादकीय जिम्मेदारियां संभालीं। उनकी लेखनी ने राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने में योगदान दिया।
- इनके बारे में
अक्षय कुमार जैन का जन्म 30 दिसंबर 1915 को विजयगढ़, अलीगढ़ में हुआ था। उन पर अलीगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम का काफी असर पड़ा था। वह जेल यात्री तो नहीं रहे, लेकिन उन्होंने विजयगढ़ क्षेत्र के कई आंदोलनों का संचालन किया। आगरा के क्रांतिकारी सेठ अचल सिंह और "सैनिक" समाचारपत्र के संपादक कृष्ण दत्त पालीवाल उनके अच्छे मित्रों में से थे। संपादकों की यह तिकड़ी ब्रज क्षेत्र के आंदोलनों के संचालन में अग्रणी रही। अक्षय कुमार जैन टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के संपादकीय प्रभारी भी रहे। उन्होंने अपनी लेखनी और संगठन क्षमता से स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से विजयगढ़ और ब्रज क्षेत्र रहा।
साइमन कमीशन के सामने दिखाया साहस: भगवान दास गौतम
खैर निवासी भगवान दास गौतम साप्ताहिक अखबार के संपादक रहे। 1928 में साइमन कमीशन के आगरा आगमन पर उन्होंने काला झंडा दिखाकर विरोध किया। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर राजद्रोह के आरोप में लाहौर जेल भेज दिया गया।
- इनके बारे में
क्रांतिकारी भगवान दास गौतम का जन्म 1904 में अलीगढ़ के कस्बा खैर में कल्याण दास के घर हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा खैर के बाद डीएवी इंटर कॉलेज अलीगढ़ और प्रेम महाविद्यालय वृंदावन में हुई। प्रेम महाविद्यालय वृंदावन को देशभक्तों की जन्मस्थली भी कहा जाता है। मेधावी भगवान दास गौतम का झुकाव शुरू से ही लेखन की ओर था। उन्हें आगरा से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक "सुदर्शन चक्र" के संपादन का दायित्व मिला। 1928 में साइमन कमीशन के आगरा में आने की घोषणा हुई। तब आगरा के क्रांतिकारी और "सैनिक" समाचार पत्र के संपादक कृष्णदत्त पालीवाल ने उन्हें बुलाया। उन्होंने गौतम से कहा कि देश को उनके बलिदान की आवश्यकता है। उन्हें साइमन कमीशन का विरोध अपने तरीके से करना था।
तत्कालीन जिलाधिकारी के समक्ष उन्होंने प्रार्थना पत्र दिया। इसमें उन्होंने साइमन कमीशन का स्वागत करने वालों की टोली में शामिल होने की इच्छा जताई। खुशकिस्मती यह रही कि गौतम का नाम उस टोली में शामिल कर लिया गया। उन्हें पुलिस प्रशासन की ओर से स्वागत ट्रेनिंग भी दी गई। उनके व्यवहार को देखकर उन्हें स्वागतकर्ताओं की अग्रिम पंक्ति में शामिल किया गया। 28 नवंबर 1928 को आगरा कैंट स्टेशन पर जैसे ही साइमन नीचे उतरे, गौतम ने अपनी जेब से काला झंडा निकाला। उन्होंने "गो बैक साइमन" के नारे लगाए। पुलिस प्रशासन हतप्रभ रह गया। गौतम को गिरफ्तार कर जबरदस्त पिटाई की गई। सुदर्शन चक्र अखबार के दफ्तर को खुर्द-बुर्द कर दिया गया। हिसार टाइम्स के संपादक के पद पर कार्यरत गौतम ने 10 मई 1930 को "गदर डे" का आह्वान किया। यह बंद पूरी तरह से सफल रहा। पुलिस ने गौतम को राजद्रोह के मामले में सेंट्रल जेल लाहौर भेज दिया। वहां राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह भी निरुद्ध थे।
पत्रकारिता जो आंदोलन बन गई
इन पांचों पत्रकारों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने पत्रकारिता को केवल समाचारों तक सीमित नहीं रखा। उनकी कलम स्वतंत्रता, जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बनी। हिंदी पत्रकारिता दिवस पर अलीगढ़ के इन पत्रकारों का योगदान याद दिलाता है कि पत्रकारिता का इतिहास केवल खबरों का नहीं, बल्कि संघर्ष और सामाजिक बदलाव का भी इतिहास है।