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डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश की खातिर दिया था बलिदान
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डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के चित्र पर माल्यार्पण करते भाजपा नेता।
- फोटो : CITY OFFICE
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भारतीय जनता पार्टी द्वारा राष्ट्रीय विचारक, राजनीतिक एवं भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिवस मनाया गया।
भाजपा महानगर के कार्यकर्ताओं एवं मंडल के पदाधिकारियों ने बलिदान दिवस अपने निवास स्थान पर मनाया। महानगर अध्यक्ष डॉ. विवेक सारस्वत ने वीडियो कांफ्रेंस के जरिए महानगर के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जनसंघ के संस्थापक थे। वह मानवता के उपासक और राष्ट्रवादी नेता थे । अनुच्छेद 370 और 35 ए का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि देश में एक देश एक विधान होना चाहिए। एक देश में दो निशान व दो प्रधान नही चलेंगे और यह किसी भी हालत में मंजूर नही। ऐसे महान देश भक्त का 23 जून 1953 में श्रीनगर में हत्या कर दी गई। वह देश की खातिर बलिदान हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके बलिदान को याद रख कर जम्मू कश्मीर से 370 व 35 ए को समाप्त कर उनके बलिदान को व्यर्थ नही जाने दिया।
भाजपा जिलाध्यक्ष चौधरी ऋषिपाल सिंह ने अतरौली स्थित कार्यालय में डॉ. मुखर्जी के चित्र पर माल्यार्पण कर याद किया। पूर्व जिलाध्यक्ष एवं गभाना मंडल के प्रभारी चौधरी देवराज सिंह ने वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से कार्यकर्ताओं को संबोधित किया और महान चिंतक को याद किया। पूर्व ब्लाक प्रमुख टप्पल शशि सिंह एवं भाजपा किसान मोर्चा ब्रज क्षेत्र के मंत्री सतेंद्र पाल सिंह ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत की एकता और अखंडता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। डॉक्टर मुखर्जी अनुच्छेद 370 के मुखर विरोधी थे और चाहते थे कि कश्मीर पूरी तरह से भारत का हिस्सा बने और वहां अन्य राज्यों की तरह समान क़ानून लागू हो।
एटा चुंगी स्थित सिंह सेवा सदन कार्यालय पर छर्रा विधान सभा क्षेत्र के विधायक ठाकुर रवेंद्र पाल सिंह ने जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के चित्र पर माल्यार्पंण किया। देवेन्द्र सक्सेना, अमित चौधरी, ठा. विकास सिंह, अजयराज सिंह, अनिल तौमर, देव आर्य, भूरा ठाकुर आदि मौजूद रहे। महिला आयोग की सदस्य रामसखी कठेरिया, पूर्व ब्लाक प्रमुख अकराबाद पदमा कठेरिया, अंबिका सिंह आदि ने विचारक एवं जनसंघ के संस्थापक के प्रति श्रद्धासुमन अर्पित किया। भाजपा नेता भूपेंद्र वार्ष्णेय ने जनसंघ संस्थापक के प्रति श्रद्धासुमन अर्पित किया।
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एनसीआरटी के आधुनिक इतिहास में पढ़ाया जाए डा. मुखर्जी का बलिदान
भाजपा के पूर्व जिला मीडिया प्रभारी डा. निशित शर्मा ने मानव संस्थान एवं विकास मंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशांक को पत्र लिख जनसंघ के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बालिदान एवं अंदोलनों के बारे में एनसीआरटी के आधुनिक इतिहास विषय के पाठ्यक्त्रस्म में शामिल करने की मांग की है।
डा. निशित ने बताया कि धारा 370 एवं अनुच्छेद 35ए का समाप्त होना जम्मू कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्त्रिस्या को सशक्त कर देने वाला निर्णय था। यह एक ऐसा विषय था, जिसकी कल्पना महान राष्ट्रवादी व भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 67 वर्ष पूर्व भी कर ली थी। स्वतंत्र भारत के सबसे पहले आंदोलनों में से एक प्रज्ञा परिषद आंदोलन जिसका नेतृत्व कश्मीर में प्रेमनाथ डोगरा व शेष भारत में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कर रहे थे। इसी आंदोलन का हिस्सा बनने आए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 11 मई 1953 में जम्मू कश्मीर के अंदर प्रवेश करने पर गिरफ्तार कर लिया गया और 30 जून 1953 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का रहस्यमय परिस्थितियों में देहांत हो गया।
ऐसे आंदोलनों की गूंज दशकों तक रही। इस आंदोलन को तैयार करने वाले डॉ. मुखर्जी जैसे क्रांतिकारियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया। उनके विषय में एनसीईआरटी की आधुनिक इतिहास पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए। सरकार को इसे पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। इससे युवाओं को उनसे परिचित होने का अवसर मिलेगा।
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भाजपा महानगर के कार्यकर्ताओं एवं मंडल के पदाधिकारियों ने बलिदान दिवस अपने निवास स्थान पर मनाया। महानगर अध्यक्ष डॉ. विवेक सारस्वत ने वीडियो कांफ्रेंस के जरिए महानगर के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जनसंघ के संस्थापक थे। वह मानवता के उपासक और राष्ट्रवादी नेता थे । अनुच्छेद 370 और 35 ए का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि देश में एक देश एक विधान होना चाहिए। एक देश में दो निशान व दो प्रधान नही चलेंगे और यह किसी भी हालत में मंजूर नही। ऐसे महान देश भक्त का 23 जून 1953 में श्रीनगर में हत्या कर दी गई। वह देश की खातिर बलिदान हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके बलिदान को याद रख कर जम्मू कश्मीर से 370 व 35 ए को समाप्त कर उनके बलिदान को व्यर्थ नही जाने दिया।
भाजपा जिलाध्यक्ष चौधरी ऋषिपाल सिंह ने अतरौली स्थित कार्यालय में डॉ. मुखर्जी के चित्र पर माल्यार्पण कर याद किया। पूर्व जिलाध्यक्ष एवं गभाना मंडल के प्रभारी चौधरी देवराज सिंह ने वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से कार्यकर्ताओं को संबोधित किया और महान चिंतक को याद किया। पूर्व ब्लाक प्रमुख टप्पल शशि सिंह एवं भाजपा किसान मोर्चा ब्रज क्षेत्र के मंत्री सतेंद्र पाल सिंह ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत की एकता और अखंडता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। डॉक्टर मुखर्जी अनुच्छेद 370 के मुखर विरोधी थे और चाहते थे कि कश्मीर पूरी तरह से भारत का हिस्सा बने और वहां अन्य राज्यों की तरह समान क़ानून लागू हो।
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एटा चुंगी स्थित सिंह सेवा सदन कार्यालय पर छर्रा विधान सभा क्षेत्र के विधायक ठाकुर रवेंद्र पाल सिंह ने जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के चित्र पर माल्यार्पंण किया। देवेन्द्र सक्सेना, अमित चौधरी, ठा. विकास सिंह, अजयराज सिंह, अनिल तौमर, देव आर्य, भूरा ठाकुर आदि मौजूद रहे। महिला आयोग की सदस्य रामसखी कठेरिया, पूर्व ब्लाक प्रमुख अकराबाद पदमा कठेरिया, अंबिका सिंह आदि ने विचारक एवं जनसंघ के संस्थापक के प्रति श्रद्धासुमन अर्पित किया। भाजपा नेता भूपेंद्र वार्ष्णेय ने जनसंघ संस्थापक के प्रति श्रद्धासुमन अर्पित किया।
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एनसीआरटी के आधुनिक इतिहास में पढ़ाया जाए डा. मुखर्जी का बलिदान
भाजपा के पूर्व जिला मीडिया प्रभारी डा. निशित शर्मा ने मानव संस्थान एवं विकास मंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशांक को पत्र लिख जनसंघ के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बालिदान एवं अंदोलनों के बारे में एनसीआरटी के आधुनिक इतिहास विषय के पाठ्यक्त्रस्म में शामिल करने की मांग की है।
डा. निशित ने बताया कि धारा 370 एवं अनुच्छेद 35ए का समाप्त होना जम्मू कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्त्रिस्या को सशक्त कर देने वाला निर्णय था। यह एक ऐसा विषय था, जिसकी कल्पना महान राष्ट्रवादी व भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 67 वर्ष पूर्व भी कर ली थी। स्वतंत्र भारत के सबसे पहले आंदोलनों में से एक प्रज्ञा परिषद आंदोलन जिसका नेतृत्व कश्मीर में प्रेमनाथ डोगरा व शेष भारत में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कर रहे थे। इसी आंदोलन का हिस्सा बनने आए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 11 मई 1953 में जम्मू कश्मीर के अंदर प्रवेश करने पर गिरफ्तार कर लिया गया और 30 जून 1953 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का रहस्यमय परिस्थितियों में देहांत हो गया।
ऐसे आंदोलनों की गूंज दशकों तक रही। इस आंदोलन को तैयार करने वाले डॉ. मुखर्जी जैसे क्रांतिकारियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया। उनके विषय में एनसीईआरटी की आधुनिक इतिहास पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए। सरकार को इसे पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। इससे युवाओं को उनसे परिचित होने का अवसर मिलेगा।