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आरक्षण को लेकर एएमयू की नीयत साफ नहीं: कठेरिया
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
Updated Wed, 04 Jul 2018 01:26 AM IST
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आरक्षण को लेकर एएमयू की नीयत साफ नहीं: कठेरिया
- फोटो : Dig Vishal
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राष्ट्रीय अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग के अध्यक्ष राम शंकर कठेरिया ने पत्रकारों से कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने के मामले पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) की नीयत साफ नहीं है। यदि एएमयू ने आरक्षण नहीं लागू किया तो वे यूजीसी से मिलने वाले अनुदान पर विचार करने की सिफारिश करेंगे। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामले में भी उनका आयोग पार्टी बनेगा। उन्होंने मुलाकात के दौरान एएमयू के सह कुलपति से इसके अल्पसंख्यक संस्थान होने के प्रमाण भी एक माह के अंदर उपलब्ध कराने को कहा।
कठेरिया मंगलवार को सर्किट हाउस में एएमयू के सह कुलपति प्रो. तबस्सुम शहाब एवं अन्य अधिकारियों के साथ अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने पर बातचीत की। उन्होंने एएमयू के अधिकारियों से पूछा कि किस आधार पर इन वर्गों का आरक्षण रोक रखा है, स्पष्ट करें। यदि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान है तो उसका साक्ष्य दिखाएं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक विश्वविद्यालय में छात्रों को आरक्षण देें। उन्होंने अल्पसंख्यक स्वरूप से संबंधित दस्तावेज दिखाने के लिए एएमयू को एक महीने का समय दिया है। बाद में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि वंचितों को आरक्षण दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट मेें चल रहे मामले में आयोग पार्टी बनेगा। आरक्षण नहीं दिया गया तो वह यूजीसी से एएमयू को मिलने वाले अनुदान पर विचार करने को कहेंगे।
उन्होंने कहा कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है। यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। भारत के संविधान के अधीन पारित सभी आदेश-निर्देश एएमयू में भी लागू है। एससी, एसटी एवं ओबीसी को यहां भी आरक्षण मिलना चाहिए लेकिन एएमयू में यह लागू नहीं किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने 1968 में अजीज बाशा केस में सर्वसम्मति से निर्णय दिया है कि एएमयू एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, अल्पसंख्यक संस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि 1981 में एएमयू एक्ट की धारा 2 (1) में संशोधन एवं धारा 5 (2) (सी) के जोड़ने को इलाहाबाद उच्च न्यायालय 2005 एवं 2006 में दो बार निरस्त कर चुका है।
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उच्च न्यायालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट के 1968 के अजीज बाशा केस के फैसले को सही माना गया। 1968, 2005 एवं 2006 के न्यायालय के फैसले के आलोक में एएमयू को एससी, एसटी एवं ओबीसी के छात्रों एवं कर्मचारियों को आरक्षण देना चाहिए। भारत सरकार ने 2016 में सर्वोच्च न्यायालय में आवेदन देकर 1968 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को मानने का हलफनामा दिया है। कठेरिया ने कहा कि एएमयू 1981 के एक्ट से अल्पसंख्यक संस्थान का दावा करता है। लेकिन सवाल उठता है कि 1981 के पहले एएमयू ने एससी, एसटी एवं ओबीसी को आरक्षण क्यों नहीं दिया जबकि 1968 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका था। उनका कहना है कि एएमयू के अधिकारियों के पास इसका कोई जवाब नहीं है।
मायावती पर भी साधा निशाना
राम शंकर कठेरिया ने बसपा सुप्रीमो मायावती पर भी निशाना साधा और कहा कि यदि वह सचमुच दलितों की हितैषी है तो एएमयू में दलितों की आरक्षण की मांग केंद्र सरकार से करें। वह उनके साथ सड़कों पर उतरेंगे। उनके साथ भाजपा जिलाध्यक्ष ठाकुर गोपाल सिंह, महानगर के कार्यवाहक अध्यक्ष वीएस पॉल, डॉ. राजीव अग्रवाल आदि मौजूद थे।
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कठेरिया मंगलवार को सर्किट हाउस में एएमयू के सह कुलपति प्रो. तबस्सुम शहाब एवं अन्य अधिकारियों के साथ अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने पर बातचीत की। उन्होंने एएमयू के अधिकारियों से पूछा कि किस आधार पर इन वर्गों का आरक्षण रोक रखा है, स्पष्ट करें। यदि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान है तो उसका साक्ष्य दिखाएं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक विश्वविद्यालय में छात्रों को आरक्षण देें। उन्होंने अल्पसंख्यक स्वरूप से संबंधित दस्तावेज दिखाने के लिए एएमयू को एक महीने का समय दिया है। बाद में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि वंचितों को आरक्षण दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट मेें चल रहे मामले में आयोग पार्टी बनेगा। आरक्षण नहीं दिया गया तो वह यूजीसी से एएमयू को मिलने वाले अनुदान पर विचार करने को कहेंगे।
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उन्होंने कहा कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है। यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। भारत के संविधान के अधीन पारित सभी आदेश-निर्देश एएमयू में भी लागू है। एससी, एसटी एवं ओबीसी को यहां भी आरक्षण मिलना चाहिए लेकिन एएमयू में यह लागू नहीं किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने 1968 में अजीज बाशा केस में सर्वसम्मति से निर्णय दिया है कि एएमयू एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, अल्पसंख्यक संस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि 1981 में एएमयू एक्ट की धारा 2 (1) में संशोधन एवं धारा 5 (2) (सी) के जोड़ने को इलाहाबाद उच्च न्यायालय 2005 एवं 2006 में दो बार निरस्त कर चुका है।
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उच्च न्यायालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट के 1968 के अजीज बाशा केस के फैसले को सही माना गया। 1968, 2005 एवं 2006 के न्यायालय के फैसले के आलोक में एएमयू को एससी, एसटी एवं ओबीसी के छात्रों एवं कर्मचारियों को आरक्षण देना चाहिए। भारत सरकार ने 2016 में सर्वोच्च न्यायालय में आवेदन देकर 1968 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को मानने का हलफनामा दिया है। कठेरिया ने कहा कि एएमयू 1981 के एक्ट से अल्पसंख्यक संस्थान का दावा करता है। लेकिन सवाल उठता है कि 1981 के पहले एएमयू ने एससी, एसटी एवं ओबीसी को आरक्षण क्यों नहीं दिया जबकि 1968 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका था। उनका कहना है कि एएमयू के अधिकारियों के पास इसका कोई जवाब नहीं है।
मायावती पर भी साधा निशाना
राम शंकर कठेरिया ने बसपा सुप्रीमो मायावती पर भी निशाना साधा और कहा कि यदि वह सचमुच दलितों की हितैषी है तो एएमयू में दलितों की आरक्षण की मांग केंद्र सरकार से करें। वह उनके साथ सड़कों पर उतरेंगे। उनके साथ भाजपा जिलाध्यक्ष ठाकुर गोपाल सिंह, महानगर के कार्यवाहक अध्यक्ष वीएस पॉल, डॉ. राजीव अग्रवाल आदि मौजूद थे।