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पहले आबकारी विभाग पर जमाई धाक...फिर बेचने लगे मौत
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अभिषेक शर्मा
जहरीली शराब से मौत कांड के बाद सुर्खियों में आए रालोद नेता अनिल चौधरी और भाजपा नेता ऋषि शर्मा यूं ही जिले में देशी शराब तस्करी के सरगना नहीं बन गए। इसके लिए उन्होंने पूरे एक दशक तक आबकारी सिस्टम में सेंध लगाई और सियासी पकड़ बनाई। तब जाकर वे जिले में जहरीली देशी शराब के जरिये मौत बेचने वाले कारोबारी बने। आज आलम ये था कि न तो उनके द्वारा सप्लाई पहुंचाए जाने वाले ठेकों पर कोई चेकिंग होती थी और न स्टाक रजिस्टर मेनटेन होता था। इससे साफ जाहिर है कि आबकारी की मदद से वे मौत का सामान बेचने का यह गोरखधंधा कर रहे थे। अगर सियासत और सिस्टम ने उन्हें ये मदद न दी होती तो शायद आज जिले में मौतों का यह तांडव न मचा होता।
ये साक्ष्य दे रहे सियासत-सिस्टम की मदद की गवाही
जिले में जहरीली शराब से मौतों को लेकर लोधा के गांव करसुआ का खेत में बना ठेका सबसे बड़ा और सबसे पहला कारण बना है। शुक्रवार को सामने आए घटनाक्रम के बाद जब पुलिस व प्रशासनिक टीमों ने ठेके में खोजबीन की तो पाया कि पिछले 22 दिन से ठेके का स्टाक रजिस्टर ही मेनटेन नहीं हुआ है, जबकि नियम यह है कि सुबह दुकान खोलते समय और शाम को दुकान बंद करते समय स्टाक रजिस्टर मेनटेन करना होता है। ताकि आबकारी या किसी मजिस्ट्रेट की औचक चेकिंग के समय लाइसेंसी या सेल्समैन साक्ष्य के साथ बता सके कि उसके यहां किस ब्रांड और किस बैच का कितना माल आया है और कितना बिका है। इससे यह भी साफ होता है कि 22 दिन से इस दुकान पर कोई चेकिंग शायद ही हुई हो, जबकि नियम है कि समय-समय पर चेकिंग होती रहनी चाहिए। इसी तरह ठेके के आसपास शुक्रवार सुबह ही डीएम-एसएसपी को मिलावटी शराब के पौवा मिले, जिनके बार कोड स्कैन नहीं हो रहे थे। यानी कि उन्हें इसी ठेके से बेचा जा रहा था। यह माल स्टाक में कैसे शामिल किया गया होगा। चूंकि इस सबके पीछे रालोद नेता अनिल चौधरी, भाजपा नेता ऋषि शर्मा हैं। इसलिए यह गोरखधंधा इतनी आसानी से चल रहा था।
रिश्वतकांड से ऐसे आबकारी में जमाई धाक
पुराने रिकार्ड पर गौर करें तो रालोद नेता अनिल चौधरी अपने भाई सुधीर के साथ करीब वर्ष 2000 से इस धंधे में आया। हालांकि सब कुछ सामान्य चल रहा था। मगर 2004 में बसपा शासन काल में सुधीर ने एक मीडियाकर्मी की मदद से तत्कालीन आबकारी डीओ एसएस यादव को रिश्वत देते हुए स्टिंग किया और उस स्टिंग के जरिये डीआई, दो आबकारी इंस्पेक्टर व अन्य कर्मचारियों पर रिश्वत कांड में कार्रवाई हुई। इसके बाद इन दोनों भाइयों की आबकारी में धाक जम गई और कारोबार चल पड़ा। इसी बीच तत्कालीन सरकार में मंत्री ठा. जयवीर सिंह से दूरी के चलते इसी कारोबार में आगे बढ़ रहे ऋषि शर्मा व उनके भाई मुनीष शर्मा की अनिल सुधीर से दोस्ती हो गई और दोनों भाइयों की जोड़ी ने साथ काम करना शुरू कर दिया। वर्ष 2012 में ऋषि व मुनीष पर अवैध शराब बनाने का आरोप लगा। मगर सियासी व आबकारी मदद से वह आरोप में बच गए। बाद में जयवीर सिंह से उनकी नजदीकी हो गई और पत्नी को ब्लाक प्रमुख बनाने के बाद जयवीर सिंह के भाजपा में जाने पर यह भी भाजपाई हो गए। फिर क्या था, इनके गोरखधंधों का जाल जिले भर में फैलने लगा।
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एक साथ काम, मगर बांट रखे हैं इलाके
वैसे तो दोनों भाइयों की जोड़ी एक साथ काम करती थी। मगर इन्होंने अपने अपने इलाके बांट रखे थे। अनिल सुधीर की जोड़ी ने मथुरा रोड, गोंडा रोड, खैर रोड और देहली गेट इलाके में अपना पूरा नेटवर्क खड़ा कर रखा है। इन रोडों पर जिला मुख्यालय से लेकर बॉर्डर तक के सभी देशी शराब के ठेकों पर इनकी ही सप्लाई बिकेगी। इसी तरह ऋषि मुनीष ने अनूपशहर रोड, रामघाट रोड, बरौली रोड पर सभी देशी शराब ठेकों पर अपना नेटवर्क बना रखा था।
काली कमाई से अन्य कारोबार भी जमाए
जहरीली शराब बेचकर इन लोगों ने पैदा की काली कमाई से अन्य कारोबार जमाना भी शुरू कर दिया। अनिल ने गोंडा रोड पर कोल्ड स्टोर बनाया, जबकि ऋषि प्रॉपर्टी कारोबार में हाथ आजमाने लगा।
मुकदमे भी हैं इन पर
अनिल व सुधीर पर इगलास में नकली शराब बनाने के मुकदमे दर्ज हुए। मगर उन मुकदमों में उन्होंने तत्कालीन एसएसपी से बदलने के बाद पुलिस से साठगांठ कर खुद को बचाया और अपने सेल्समैन को फंसाया। इसी तरह ऋषि पर 6 व मुनीश पर 4 मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें शराब से जुड़े मुकदमे भी हैं।
ये 5 प्रमुख सवाल
1-आबकारी टीमें गांव देहात में क्यों नहीं कर रही थीं ठेकों की जांच
2-जांच हो रही होती तो ठेकों से इस तरह जहरीली शराब कैसे बिकी
3-करसुआ शराब ठेके का स्टाक रजिस्टर एक माह से क्यों पड़ा खाली
4-रफ कॉपी पर ही स्टाक रजिस्टर क्यों किया जा रहा था हर रोज मेनटेन
5-नियत समय के बाद बिकती शराब पर पुलिस की क्यों नहीं थी नजर
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जहरीली शराब से मौत कांड के बाद सुर्खियों में आए रालोद नेता अनिल चौधरी और भाजपा नेता ऋषि शर्मा यूं ही जिले में देशी शराब तस्करी के सरगना नहीं बन गए। इसके लिए उन्होंने पूरे एक दशक तक आबकारी सिस्टम में सेंध लगाई और सियासी पकड़ बनाई। तब जाकर वे जिले में जहरीली देशी शराब के जरिये मौत बेचने वाले कारोबारी बने। आज आलम ये था कि न तो उनके द्वारा सप्लाई पहुंचाए जाने वाले ठेकों पर कोई चेकिंग होती थी और न स्टाक रजिस्टर मेनटेन होता था। इससे साफ जाहिर है कि आबकारी की मदद से वे मौत का सामान बेचने का यह गोरखधंधा कर रहे थे। अगर सियासत और सिस्टम ने उन्हें ये मदद न दी होती तो शायद आज जिले में मौतों का यह तांडव न मचा होता।
ये साक्ष्य दे रहे सियासत-सिस्टम की मदद की गवाही
जिले में जहरीली शराब से मौतों को लेकर लोधा के गांव करसुआ का खेत में बना ठेका सबसे बड़ा और सबसे पहला कारण बना है। शुक्रवार को सामने आए घटनाक्रम के बाद जब पुलिस व प्रशासनिक टीमों ने ठेके में खोजबीन की तो पाया कि पिछले 22 दिन से ठेके का स्टाक रजिस्टर ही मेनटेन नहीं हुआ है, जबकि नियम यह है कि सुबह दुकान खोलते समय और शाम को दुकान बंद करते समय स्टाक रजिस्टर मेनटेन करना होता है। ताकि आबकारी या किसी मजिस्ट्रेट की औचक चेकिंग के समय लाइसेंसी या सेल्समैन साक्ष्य के साथ बता सके कि उसके यहां किस ब्रांड और किस बैच का कितना माल आया है और कितना बिका है। इससे यह भी साफ होता है कि 22 दिन से इस दुकान पर कोई चेकिंग शायद ही हुई हो, जबकि नियम है कि समय-समय पर चेकिंग होती रहनी चाहिए। इसी तरह ठेके के आसपास शुक्रवार सुबह ही डीएम-एसएसपी को मिलावटी शराब के पौवा मिले, जिनके बार कोड स्कैन नहीं हो रहे थे। यानी कि उन्हें इसी ठेके से बेचा जा रहा था। यह माल स्टाक में कैसे शामिल किया गया होगा। चूंकि इस सबके पीछे रालोद नेता अनिल चौधरी, भाजपा नेता ऋषि शर्मा हैं। इसलिए यह गोरखधंधा इतनी आसानी से चल रहा था।
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रिश्वतकांड से ऐसे आबकारी में जमाई धाक
पुराने रिकार्ड पर गौर करें तो रालोद नेता अनिल चौधरी अपने भाई सुधीर के साथ करीब वर्ष 2000 से इस धंधे में आया। हालांकि सब कुछ सामान्य चल रहा था। मगर 2004 में बसपा शासन काल में सुधीर ने एक मीडियाकर्मी की मदद से तत्कालीन आबकारी डीओ एसएस यादव को रिश्वत देते हुए स्टिंग किया और उस स्टिंग के जरिये डीआई, दो आबकारी इंस्पेक्टर व अन्य कर्मचारियों पर रिश्वत कांड में कार्रवाई हुई। इसके बाद इन दोनों भाइयों की आबकारी में धाक जम गई और कारोबार चल पड़ा। इसी बीच तत्कालीन सरकार में मंत्री ठा. जयवीर सिंह से दूरी के चलते इसी कारोबार में आगे बढ़ रहे ऋषि शर्मा व उनके भाई मुनीष शर्मा की अनिल सुधीर से दोस्ती हो गई और दोनों भाइयों की जोड़ी ने साथ काम करना शुरू कर दिया। वर्ष 2012 में ऋषि व मुनीष पर अवैध शराब बनाने का आरोप लगा। मगर सियासी व आबकारी मदद से वह आरोप में बच गए। बाद में जयवीर सिंह से उनकी नजदीकी हो गई और पत्नी को ब्लाक प्रमुख बनाने के बाद जयवीर सिंह के भाजपा में जाने पर यह भी भाजपाई हो गए। फिर क्या था, इनके गोरखधंधों का जाल जिले भर में फैलने लगा।
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एक साथ काम, मगर बांट रखे हैं इलाके
वैसे तो दोनों भाइयों की जोड़ी एक साथ काम करती थी। मगर इन्होंने अपने अपने इलाके बांट रखे थे। अनिल सुधीर की जोड़ी ने मथुरा रोड, गोंडा रोड, खैर रोड और देहली गेट इलाके में अपना पूरा नेटवर्क खड़ा कर रखा है। इन रोडों पर जिला मुख्यालय से लेकर बॉर्डर तक के सभी देशी शराब के ठेकों पर इनकी ही सप्लाई बिकेगी। इसी तरह ऋषि मुनीष ने अनूपशहर रोड, रामघाट रोड, बरौली रोड पर सभी देशी शराब ठेकों पर अपना नेटवर्क बना रखा था।
काली कमाई से अन्य कारोबार भी जमाए
जहरीली शराब बेचकर इन लोगों ने पैदा की काली कमाई से अन्य कारोबार जमाना भी शुरू कर दिया। अनिल ने गोंडा रोड पर कोल्ड स्टोर बनाया, जबकि ऋषि प्रॉपर्टी कारोबार में हाथ आजमाने लगा।
मुकदमे भी हैं इन पर
अनिल व सुधीर पर इगलास में नकली शराब बनाने के मुकदमे दर्ज हुए। मगर उन मुकदमों में उन्होंने तत्कालीन एसएसपी से बदलने के बाद पुलिस से साठगांठ कर खुद को बचाया और अपने सेल्समैन को फंसाया। इसी तरह ऋषि पर 6 व मुनीश पर 4 मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें शराब से जुड़े मुकदमे भी हैं।
ये 5 प्रमुख सवाल
1-आबकारी टीमें गांव देहात में क्यों नहीं कर रही थीं ठेकों की जांच
2-जांच हो रही होती तो ठेकों से इस तरह जहरीली शराब कैसे बिकी
3-करसुआ शराब ठेके का स्टाक रजिस्टर एक माह से क्यों पड़ा खाली
4-रफ कॉपी पर ही स्टाक रजिस्टर क्यों किया जा रहा था हर रोज मेनटेन
5-नियत समय के बाद बिकती शराब पर पुलिस की क्यों नहीं थी नजर