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अलीगढ़ : कल्याण सिंह के निधन पर शोक में डूबा कर्मक्षेत्र अतरौली

Sun, 22 Aug 2021 01:39 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 22 Aug 2021 01:39 AM IST
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Aligarh: Karmakshetra Atrauli immersed in mourning on the death of Kalyan Singh
अतरौली में भाजपा के नेता बृजेश शर्मा से कुछ इस अंदाज में बात करते कल्याण सिंह - फोटो : CITY OFFICE
विदेशों तक अपनी कर्मभूमि को पहचान दिलाने वाले कल्याण सिंह के निधन की खबर से शनिवार देर रात अतरौली क्षेत्र शोक में डूब गया। खबर सुनते ही लोग और उनके चाहने वाले एक ही बात कह रहे थे कि आज भले ही उनका शीर्ष नेता चला गया हो मगर जब भी अतरौली का जिक्र आएगा कल्याण सिंह का नाम जरूर लिया जाएगा। आने वाली कई पीढ़ियों तक इतना बड़ा नाम कमाने वाला नेता मिलना बेहद कठिन है।
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कल्याण सिंह का जन्म अतरौली नगर पालिका की सीमांतर्गत गांव मढ़ौली में हुआ था। उनके पिता तेजपाल सिंह एक किसान थे। कल्याण सिंह की प्रारंभिक शिक्षा अतरौली में हुई थी। केएमवी इंटर कॉलेज से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट करने के बाद उन्होंने डीएस कॉलेज अलीगढ़ से स्नातक किया। कल्याण सिंह ने शिक्षक के रूप में अतरौली के नगर पालिका इंटर कॉलेज और रायपुर स्टेशन के आर्यन कल्चर इंटर कॉलेज में सेवा दी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों से प्रभावित होकर आरएसएस में शामिल हो गए। वे गांव गांव आरएसएस की शाखाएं लगाते और लोग उनसे जुड़ते चले गए।
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1962 में लड़ा पहला चुनाव
कल्याण सिंह ने जब आरएसएस की शाखाएं लगाने के लिए गांव गांव लोगों को जोड़ना शुरू किया और उनके हर दुख दर्द में शामिल होने लगे। उन्होंने वर्ष 1962 में अतरौली विधानसभा से चुनाव लड़ा और हार गए। इसके बाद 1967 में फिर से चुनाव मैदान में उतरे और जीत हासिल की।
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इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1980 तक लगातार चुनाव जीतते रहे। 1980 में इंदिरा लहर में कांग्रेस के डॉ. अनवार खां से उन्हें हार मिली। इसके बाद 1984 में कल्याण सिंह फिर न सिर्फ चुनाव जीते बल्कि जनता पार्टी की सरकार की कैबिनेट में स्वास्थ्य महकमा संभाला। राम मंदिर आंदोलन के दौरान पहली बार 1991 प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी हिंदुत्व का प्रखर चेहरा बन चुके ओबीसी समुदाय से आने वाले कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने।
पिछड़ी जातियों के बड़े नेता के रूप में उभरे। कल्याण सिंह 1997 में दूसरी बार भाजपा की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री बने। इस कार्यकाल में नकल विरोधी अध्यादेश उनके प्रमुख कार्यों में था। गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं के सुुधार के लिए उन्होंने ग्रामीण अंचलों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का निर्माण कराया। अतरौली क्षेत्र में भी कई स्वास्थ्य केंद्र, कॉलेज उनकी ही देन हैं।
वर्ष 2004 में भाजपा में वापसी कर बने सांसद
वर्ष 2004 के आम चुनाव से पहले उनकी भाजपा में वापसी हो गई। बुलंदशहर लोकसभा सीट से वह पहली बार सांसद चुने गए। फिर से भाजपा में कुछ बात को लेकर नाराजगी हुई तो पार्टी छोड़कर वर्ष 2008 में जनक्रांति पार्टी बनाई। 2009 के चुनाव में जनक्रांति पार्टी छोड़ पिछड़ी जातियों के दूसरे बड़े नेता मुलायम सिंह यादव से हाथ मिलाया।
सपा के समर्थन से एटा लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत हासिल की। 2014 में नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हुए भाजपा में एक बार फिर वापसी की। बेटे राजवीर सिंह राजू भैया को भाजपा के टिकट पर एटा से सांसद बनवाया और नाती संदीप सिंह को अतरौली से विधायक बनवाकर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री का ओहदा दिलाया। वर्ष 2004 में कल्याण सिंह सांसद बन गए तो अतरौली सीट के विधायक पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद हुए उपचुनाव में उनकी पुत्रवधू प्रेमलता वर्मा विधायक बनीं। वर्ष 2007 में भी हुए विधानसभा चुनाव में प्रेमलता वर्मा ने दूसरी बार जीत हासिल की।
चाहे कहीं भी हों, होली मिलन में जरूर आते थे
कल्याण सिंह वर्ष 2015 में राजस्थान के राज्यपाल बने। राजस्थान में पूरे पांच वर्ष का कार्यकाल पूरे करने वाले वह पहले राज्यपाल थे। गांव के किसी भी व्यक्ति की जब कल्याण सिंह से बातचीत होती तो सबसे पहले उस व्यक्ति से उसके बच्चों घर परिवार और गांव के हाल चाल लेते थे। लखनऊ या दिल्ली मिलने पहुंचने वाले व्यक्ति को अपने वाहन से स्टेशन तक छुड़वाते थे। खासियत यह थी कि नाम से गांव के हर व्यक्ति को पहचानते थे। अतरौली नगर के मोहल्ला विशंभर गंज में होली मिलन समारोह होता है। तब कल्याण सिंह इस समारोह में अवश्य पहुंचते थे। ताकि अपने लोगों से मिल सकें। होली मिलन में वह खूब गुलाल लगाकर लोगों से गले मिलते।
दोस्ती भी बखूबी निभाते थे
कल्याण सिंह के वैसे तो बहुत मित्र थे। लेकिन पिलखुनी के नवल सिंह वर्मा और नौअरी के राम सिंह उनके बेहद खास मित्र थे। तीनों ने कक्षा 7 वीं से लेकर स्नातक की पढ़ाई की। राम सिंह कल्याण सिंह के साथ ही शिक्षक बने और चमेली देवी इंटर कॉलेज जरगवां में प्रधानाचार्य रहे।
राम सिंह बताते हैं कि कल्याण सिंह को राजनीति में बहुत दिलचस्पी थी। कल्याण सिंह को विधानसभा का चुनाव लड़ाने के लिए वह बेहद मेहनत करते और चंदा भी एकत्रित करते थे। जबकि राम सिंह को राजनीति में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं थी। वह दोस्त की खातिर वोट मांगने के लिए गांवों में जाते थे। वर्ष 1968 में लोगों ने राम सिंह से अतरौली ब्लॉक से प्रमुख का चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा तो ठुकरा दिया।
इसके बाद कल्याण सिंह उनके पास गांव नौअरी पहुंचे और मित्र को न सिर्फ चुनाव लड़ने के लिए राजी किया बल्कि ब्लॉक प्रमुख बनवाया। वर्ष 2011 में जब नवल सिंह वर्मा बेहद बीमार पड़े तो सूचना कल्याण सिंह तक पहुंच गई। उस वक्त वह सांसद थे और दिल्ली में थे। दोस्त की बीमारी की सूचना पर कल्याण सिंह पिलखुनी पहुंचे और नवल सिंह वर्मा से मिलकर बहुत रोए। इसके कुछ दिन बाद ही नवल सिंह वर्मा का निधन हो गया।
नाली में खुद लेट गए थे तब बंद हुआ पानी का बहाव
भाजपा के युवा नेता होमेंद्र राजपूत कल्याण सिंह से जुड़ा बेहद ही रोचक किस्सा बताते हैं। उन्होंने बताया कि गांव खेड़ा के सरकारी नलकूप संख्या 6 एबी से कल्याण सिंह के बाग व खेतों की सिंचाई होती थी। तब कल्याण सिंह दूसरी बार के विधायक थे और उनके खेत में सिंचाई के लिए पानी जा रहा था।

अचानक सिंचाई की नाली टूट गई। पानी में बहाव अधिक होने के कारण कल्याण सिंह के साथ काम रहे होमेंद्र के दादा मोहन सिंह वर्मा पूर्व प्रधान नलकूप बंद करने जा रहे थे। इस पर कल्याण सिंह ने उन्हें रोका और कहा कि मैं नाली में लेटकर पानी का बहाव रोकता हूं और तुम मिट्टी डालकर नाली को दुरुस्त करो। कल्याण सिंह नाली में लेट गए और मोहन सिंह वर्मा ने नलकूप बंद किए बिना ही मिट्टी डालकर नाली ठीक की।
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