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अलीगढ़ : जॉनी अपनी समझदारी से बने परिंदों की जान
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इकराम वारिस
अलीगढ़। समझदारी और पहल से ‘बया’ परिंदों की बस्ती उजड़ने से बच गई। अब पेड़ पर इन परिंदों की बस्ती गुलजार है। परिंदों की चहचहाहट सुनकर पक्षी प्रेमी जॉनी फॉस्टर को सुकून होता है कि उनकी और उनके साथियों की मेहनत रंग लाई। दो साल पहले अपनी समझदारी से वो परिंदों की जान बन गए।
दिसंबर 2019 को जॉनी फॉस्टर अलीगढ़ से दिल्ली जा रहे थे। उन्होंने सोफा नहर से लगभग एक मील का फासला तय किया था कि तभी उनकी नजर दाहिनी ओर एक खजूर के हरे भरे पेड़ पर पड़ी, जहां बहुत सारे बया के घोंसले लटक रहे थे। उस समय सड़क चौड़ीकरण होने का काम शुरू हो चुका था और रास्ते में आने वाले पेड़ भी काटे जा रहे थे। खतरा भांपते हुए उन्हें ख्याल आया कि इस पेड़ के कटने से बया की जीती जागती बस्ती उजड़ जाएगी। उन्होंने अपने बेटे से कार रुकवाई और पेड़, परिंदों और घोंसलों की मोबाइल में कुछ तस्वीरें कैद कीं और वीडियो भी बनाया।
जॉनी ने बताया कि अगले दिन एक खत जिलाधिकारी अलीगढ़ को लिखा कि किसी भी सूरत में इस पेड़ को सुरक्षित करने व इसे न काटने के निर्देश दिए जाएं, जिससे इन बया परिंदों की बस्ती को बचाया जा सके। इस खत के साथ में कुछ तस्वीरें भी लगाईं। इस खत पर उनके अलावा सुबोध शर्मा, औजमंड चार्ल्स व राकेश सक्सेना के हस्ताक्षर थे। जिला प्रशासन व वन विभाग में अधिकारियों से वह और सुबोध नंदन मिले और बयान रिकॉर्ड किया। इस छोटी मगर ईमानदार कोशिश और परिंदों की दुआ का नतीजा यह है कि आज भी यह पेड़ और बया परिंदों की बस्ती महफूज है।
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इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन नमूना बया का घोंसला
पक्षी प्रेमी व एएमयू के संगीत विभाग से सेवानिवृत्त जॉनी फॉस्टर ने बताया कि बया परिंदा कुछ ही पेड़ मसलन, झाड़ीदार बेर, बबूल, खजूर आदि पर अपना घोंसला बनाती हैं। इसके घोंसले इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन नमूना हैं, जिस पर तेज आंधी और पानी का भी असर नहीं होता और नुकसान पहुंचाने वाले जीव-जंतुओं से भी सुरक्षित रहता है। बया लगभग 15 से ज्यादा तरह के डिजाइन के घोंसले बनाती हैं।
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अलीगढ़। समझदारी और पहल से ‘बया’ परिंदों की बस्ती उजड़ने से बच गई। अब पेड़ पर इन परिंदों की बस्ती गुलजार है। परिंदों की चहचहाहट सुनकर पक्षी प्रेमी जॉनी फॉस्टर को सुकून होता है कि उनकी और उनके साथियों की मेहनत रंग लाई। दो साल पहले अपनी समझदारी से वो परिंदों की जान बन गए।
दिसंबर 2019 को जॉनी फॉस्टर अलीगढ़ से दिल्ली जा रहे थे। उन्होंने सोफा नहर से लगभग एक मील का फासला तय किया था कि तभी उनकी नजर दाहिनी ओर एक खजूर के हरे भरे पेड़ पर पड़ी, जहां बहुत सारे बया के घोंसले लटक रहे थे। उस समय सड़क चौड़ीकरण होने का काम शुरू हो चुका था और रास्ते में आने वाले पेड़ भी काटे जा रहे थे। खतरा भांपते हुए उन्हें ख्याल आया कि इस पेड़ के कटने से बया की जीती जागती बस्ती उजड़ जाएगी। उन्होंने अपने बेटे से कार रुकवाई और पेड़, परिंदों और घोंसलों की मोबाइल में कुछ तस्वीरें कैद कीं और वीडियो भी बनाया।
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जॉनी ने बताया कि अगले दिन एक खत जिलाधिकारी अलीगढ़ को लिखा कि किसी भी सूरत में इस पेड़ को सुरक्षित करने व इसे न काटने के निर्देश दिए जाएं, जिससे इन बया परिंदों की बस्ती को बचाया जा सके। इस खत के साथ में कुछ तस्वीरें भी लगाईं। इस खत पर उनके अलावा सुबोध शर्मा, औजमंड चार्ल्स व राकेश सक्सेना के हस्ताक्षर थे। जिला प्रशासन व वन विभाग में अधिकारियों से वह और सुबोध नंदन मिले और बयान रिकॉर्ड किया। इस छोटी मगर ईमानदार कोशिश और परिंदों की दुआ का नतीजा यह है कि आज भी यह पेड़ और बया परिंदों की बस्ती महफूज है।
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इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन नमूना बया का घोंसला
पक्षी प्रेमी व एएमयू के संगीत विभाग से सेवानिवृत्त जॉनी फॉस्टर ने बताया कि बया परिंदा कुछ ही पेड़ मसलन, झाड़ीदार बेर, बबूल, खजूर आदि पर अपना घोंसला बनाती हैं। इसके घोंसले इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन नमूना हैं, जिस पर तेज आंधी और पानी का भी असर नहीं होता और नुकसान पहुंचाने वाले जीव-जंतुओं से भी सुरक्षित रहता है। बया लगभग 15 से ज्यादा तरह के डिजाइन के घोंसले बनाती हैं।