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संस्मरण का प्रतिनिधित्व करेगा ‘अक्स’ : विश्वनाथ
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वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि कथाकार अखिलेश की पुस्तक अक्स संस्मरण का प्रतिनिधित्व करेगी। बुधवार को वह राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, खैर में अखिलेश की पुस्तक के लोकार्पण के दौरान बोल रहे थे। परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि अखिलेश की यह पुस्तक संस्मरण विधा में एक नया प्रस्थान है। सुल्तानपुर, प्रयागराज और लखनऊ का मूल चरित्र इस पुस्तक है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि व प्रसिद्ध आलोचक विनोद तिवारी ने कहा कि इस पुस्तक की शुरुआत आत्महत्या के एक दृश्य से होती है। आत्महत्या का संदर्भ लेकर अखिलेश, मानव जीवन से जुड़ी एक बड़ी बात कहते हैं, मनुष्य की जिंदगी निजी होते हुए भी सिर्फ उसकी निज की संपत्ति नहीं है।
उसके निज में समाज के रिश्तों का सबका अक्स मौजूद होता है। उन्होंने कहा कालिया जी पर लिखते हुए अखिलेश ने प्रयागराज के साहित्यिक परिवेश और जीवन को जीवंत कर दिया है। उन्होंने बहुत अच्छा सवाल उठाया है कि ऐसा नहीं है कि स्मृतियां गढ़ंत नहीं होतीं, सिर्फ उपन्यास ही गढ़ंत होते हैं। स्मृतियों में भी बहुत कुछ ऐसा होता है, जो मनुष्य द्वारा गढ़ा गया हो।
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कथाकार अखिलेश ने कहा कि इस पुस्तक को लिखते हुए वह जितना दूसरे लोगों के बारे में लिख रहे थे, उतना ही अपने बारे में भी लिख रहे थे। एक तरह से देखा जाए तो यह एक ऐसी स्मृति यात्रा है, जिसमें जगह, चरित्र और स्व तीनों मिले हुए हैं। उन्होंने कहा कि मानव जीवन के जो बुनियादी सवाल हैं, उनसे टकराते हुए अपनी स्मृति को दर्ज किया गया है।
युवा आलोचक अमिताभ राय ने कहा कि इस पुस्तक में कथा साहित्य के तमाम तत्व मौजूद हैं। हिंदी साहित्य में रचनाओं की बाढ़ सी आई हुई है, लेकिन विधाएं संकुचित होती गई हैं। इस पुस्तक में अखिलेश का संपादक और आलोचक रूप मुखर होकर सामने आया है। भोपाल से आए युवा आलोचक अरुणेश शुक्ल ने कहा कि इस संस्मरण को लिखने की प्रविधि मौखिक इतिहास लेखन की प्रविधि है।
डॉ. दीपशिखा सिंह ने कहा कि इस पुस्तक में जो स्त्री चरित्र है, वे अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ उपस्थिति दर्ज कराती हैं। यह इसीलिए संभव हुआ है कि अखिलेश की वैचारिक प्रतिबद्धता और वर्गीय सोच लोकतांत्रिक और समतामूलक है।
संदीप तिवारी ने कहा कि अखिलेश की कथा भाषा में वह जादू है कि सहज ही अपनी तरह आकर्षित करती है। शोधार्थी सुनील चौधरी ने विचार व्यक्त किए। संचालन जगन्नाथ दुबे ने किया। प्राचार्य डॉ. आरके गोस्वामी व अजय प्रताप सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि व प्रसिद्ध आलोचक विनोद तिवारी ने कहा कि इस पुस्तक की शुरुआत आत्महत्या के एक दृश्य से होती है। आत्महत्या का संदर्भ लेकर अखिलेश, मानव जीवन से जुड़ी एक बड़ी बात कहते हैं, मनुष्य की जिंदगी निजी होते हुए भी सिर्फ उसकी निज की संपत्ति नहीं है।
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उसके निज में समाज के रिश्तों का सबका अक्स मौजूद होता है। उन्होंने कहा कालिया जी पर लिखते हुए अखिलेश ने प्रयागराज के साहित्यिक परिवेश और जीवन को जीवंत कर दिया है। उन्होंने बहुत अच्छा सवाल उठाया है कि ऐसा नहीं है कि स्मृतियां गढ़ंत नहीं होतीं, सिर्फ उपन्यास ही गढ़ंत होते हैं। स्मृतियों में भी बहुत कुछ ऐसा होता है, जो मनुष्य द्वारा गढ़ा गया हो।
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कथाकार अखिलेश ने कहा कि इस पुस्तक को लिखते हुए वह जितना दूसरे लोगों के बारे में लिख रहे थे, उतना ही अपने बारे में भी लिख रहे थे। एक तरह से देखा जाए तो यह एक ऐसी स्मृति यात्रा है, जिसमें जगह, चरित्र और स्व तीनों मिले हुए हैं। उन्होंने कहा कि मानव जीवन के जो बुनियादी सवाल हैं, उनसे टकराते हुए अपनी स्मृति को दर्ज किया गया है।
युवा आलोचक अमिताभ राय ने कहा कि इस पुस्तक में कथा साहित्य के तमाम तत्व मौजूद हैं। हिंदी साहित्य में रचनाओं की बाढ़ सी आई हुई है, लेकिन विधाएं संकुचित होती गई हैं। इस पुस्तक में अखिलेश का संपादक और आलोचक रूप मुखर होकर सामने आया है। भोपाल से आए युवा आलोचक अरुणेश शुक्ल ने कहा कि इस संस्मरण को लिखने की प्रविधि मौखिक इतिहास लेखन की प्रविधि है।
डॉ. दीपशिखा सिंह ने कहा कि इस पुस्तक में जो स्त्री चरित्र है, वे अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ उपस्थिति दर्ज कराती हैं। यह इसीलिए संभव हुआ है कि अखिलेश की वैचारिक प्रतिबद्धता और वर्गीय सोच लोकतांत्रिक और समतामूलक है।
संदीप तिवारी ने कहा कि अखिलेश की कथा भाषा में वह जादू है कि सहज ही अपनी तरह आकर्षित करती है। शोधार्थी सुनील चौधरी ने विचार व्यक्त किए। संचालन जगन्नाथ दुबे ने किया। प्राचार्य डॉ. आरके गोस्वामी व अजय प्रताप सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया।