अतरौली के 'भीष्म पितामह' अनवार खान का निधन: कल्याण सिंह को हराकर रचा था इतिहास, इंदिरा गांधी ने किया था प्रचार
डॉ. अनवार खान ने देश की राजनीति को पहले आम चुनाव की सादगी से लेकर गाड़ियों के काफिलों वाली मौजूदा सियासत तक अपनी आंखों से देखा था। अतरौली उनकी कर्मस्थली रही, जो प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कल्याण सिंह का गढ़ माना जाता है। उसी गढ़ में कल्याण सिंह को हराकर इतिहास रचने वाले नेता के रूप में उन्हें याद किया जाएगा।
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यूपी के अलीगढ़ स्थित अतरौली की सियासत के भीष्म पितामह कहे जाने वाले पूर्व विधायक राज्यमंत्री डॉ. अनवार खान का 89 वर्ष की आयु में मंगलवार देर रात निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरे अतरौली क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। उनके आवास पर पुत्र शाकिब अनवार और नवेद अनवार को ढांढस बंधाने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा। समर्थकों, नेताओं और आम जनता का तांता लगा हुआ है। पाली रोड स्थित कब्रिस्तान में उन्हें सुपर्द ए खाक किया गया।
कल्याण सिंह को हराकर रचा था इतिहास
डॉ. अनवार खान ने देश की राजनीति को पहले आम चुनाव की सादगी से लेकर गाड़ियों के काफिलों वाली मौजूदा सियासत तक अपनी आंखों से देखा था। अतरौली उनकी कर्मस्थली रही, जो प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कल्याण सिंह का गढ़ माना जाता है। उसी गढ़ में कल्याण सिंह को हराकर इतिहास रचने वाले नेता के रूप में उन्हें याद किया जाएगा।
जब 50 हजार में जीत गए थे चुनाव, प्रचार को आईं थीं इंदिरा गांधी
आज जहां चुनाव में करोड़ों खर्च होते हैं, वहीं डॉ. अनवार खान 1980 में प्रचार में मात्र 50 हजार रुपये खर्च कर चुनाव जीत गए थे। आज इतने में तो सभासद का चुनाव भी नहीं लड़ा जाता। तब प्रचार सिर्फ एक जीप से होता था और जनता से सीधा संवाद उसके द्वार पर जाकर किया जाता था। 1980 के चुनाव में उनके समर्थन में खुद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अतरौली आईं थीं। उन्होंने जनसभा में जनता से अपील की थी - "अनवार को जिता दो, यहां का विकास मेरी जिम्मेदारी है।" उस दौरान इंदिरा गांधी ने पगडंडियों पर चलकर जनसंपर्क किया। सिविल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष चंद्रशेखर राजपूत, बच्चू सिंह एडवोकेट कहते हैं कि विधायक बनने के बाद डॉ. अनवाार खान ने दर्जनों गांवों में सड़कों का जाल बिछाकर उन्हें शहर से जोड़ा। अतरौली से गोधा मार्ग का निर्माण, गन्ना मिल आदि उनके कार्यकाल की बड़ी उपलब्धि हैं।
छह प्रधानमंत्रियों से था नाम का रिश्ता
डॉ. अनवार खान एक बार विधायक और दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री रहे। कई चुनाव हारे जरूर, लेकिन उनकी शख्सियत इतनी बड़ी थी कि उन्हें छह प्रधानमंत्री - इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह नाम और चेहरे से बखूबी पहचानते थे।
- 1957 में नगर पालिका सभासद के रूप में सियासी पारी की शुरुआत, लगातार 20 साल तक सभासद रहे।
- 1974 में बीकेडी के टिकट पर पहला विधानसभा चुनाव लड़ा, जनसंघ के कल्याण सिंह से कुछ वोटों से हारे।
- 1977 में फिर बीकेडी से लड़े।
- 1980 में कांग्रेस के टिकट पर तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री कल्याण सिंह को हराकर पहली बार विधायक बने।
- 1980 से 1989 तक यूपी टेक्सटाइल प्रिंटिंग कॉर्पोरेशन के उपाध्यक्ष, यूपी ब्रासवेयर के चेयरमैन, रुड़की यूनिवर्सिटी सीनेट के सदस्य, यूपी 20 सूत्रीय कार्यक्रम के सदस्य, अतरौली मंडी समिति और कॉपरेटिव बैंक के चेयरमैन रहे।
- 1985, 1989, 1991, 1993 व 1996 में कांग्रेस से चुनाव लड़े लेकिन हार मिली।
204 वोट से हारे थे पहला चुनाव
वह कहते थे कि क्षेत्र में मुस्लिम आबादी चार फीसदी थी। 250 बूथों पर वह जीतते थे और 150 पर कल्याण सिंह। लोध बहुल बूथों पर 95 फीसदी और उनके बूथों पर 30 फीसदी पोलिंग होती थी। बूथ कैप्चरिंग भी बड़ी समस्या थी। 1990 के बाद राजनीति में सांप्रदायिक रंग आ गया, फिर भी 1993 की राम लहर में भी उन्हें 31 हजार वोट मिले थे। पहला चुनाव वह सिर्फ 204 वोटों से हारे थे।
कल्याण सिंह से कभी सीधी बात नहीं हुई
डॉ. अनवार खान बताते थे कि कल्याण सिंह के साथ उनकी कभी सीधी बात नहीं हुई। न उन्होंने कभी कल्याण सिंह से कोई काम कहा और न कल्याण सिंह ने उनसे। 2007 में जब कल्याण सिंह की पुत्रवधू प्रेमलता चुनाव लड़ रही थीं, तो कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें चुनाव लड़ने को कहा था। उन्होंने मना करते हुए कहा था - "प्रेमलता मेरी पुत्रवधू जैसी हैं, उनके सामने मैं नहीं लड़ सकता। हां, अगर कल्याण सिंह खुद लड़ें तो मैं जरूर लड़ूंगा।"
वह अक्सर अपनी तकरीर में यह शेर पढ़ते थे - "सितमगर तुझसे उम्मीद-ए-वफा होगी जिसे होगी, हमें तो देखना ये है कि तू जालिम कहां तक है"
वो किस्सा जब कल्याण सिंह बैठे अनशन पर
एक बार प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और ब्लॉक प्रमुख के चुनाव हो रहे थे। अतरौली ब्लॉक से कल्याण सिंह ने कृपाल सिंह को प्रत्याशी बनाया था, जबकि कांग्रेस के डॉ. अनवार खान विधायक और राज्यमंत्री थे। मुकाबला कांटे का था। आरोप था कि डॉ. अनवार खान ने रात में कल्याण सिंह पक्ष के तीन बीडीसी सदस्यों को उठवा दिया। इससे कल्याण सिंह के प्रत्याशी की हार तय मानी जा रही थी। तब कल्याण सिंह अपने समर्थकों के साथ ब्लॉक पर अनशन पर बैठ गए। इस संकट में राजेंद्र सिंह उनके काम आए। वे विधानसभा सत्र छोड़कर अलीगढ़ आए और डीएम से बात कर कल्याण सिंह पक्ष के सदस्यों को बरामद कराया।
ऐसे किस्सों से भरी रही डॉ. अनवार खान की सियासी जिंदगी। उनके जाने से अतरौली ने अपना सबसे बुजुर्ग और सादगी पसंद नेता खो दिया।