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आंगन की गौरेया ने कर लिया प्रकृति से समझौता
Updated Mon, 19 Nov 2018 03:03 AM IST
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डेस्क न्यूज, अमर उजाला, अलीगढ़
दाना पानी और अस्तित्व बचाए रखने की मजबूरी ने घर आंगन की चिड़िया गौरेया को भी अपनी प्राकृतिक दिनचर्या बदलने को मजबूर कर दिया है। दिन के शोरगुल और प्रदूषण से बौखलाई गौरेया को अब रात में सोडियम लाइट की रोशनी में भी दाना पानी तलाश करते हुए और दाना चुगते हुए देखा जा सकता है। (देखें तस्वीरें) पर्यावरण के जानकार और पक्षियों के विषय में जानकारी रखने वाले इसे शहर में अनुकूलन के लिए पक्षियों के संघर्ष से जोड़कर देखते हैं।
पक्षियों के विषय में जानकारी रखने वाले डॉ. राम प्रकाश कहते हैं कि गौरेया का प्राकृतिक चक्र सुबह के समय चहचहाट, दिन के समय दाना पानी और गोधूलि के समय बसेरों पर वापस आ जाने की है। सदियों से यही क्रम गौरेया के साथ रहा है। गौरेया एक ऐसा परिंदा है जिसने मनुष्यों के साथ अपना तालमेल शानदार तरीके से बैठाया है। पिछले कुछ दशकों से शहरों में आटोमोबाइल्स, मोबाइल टावर, बढ़ रहे कारखाने, बहुमंजिला इमारतें और फ्लैट्स गौरेया के लिए दिक्कत पैदा कर रहे हैं। दिन में उसके लिए दाना पानी तलाशना असहज हो रहा है। इसलिए अब गौरेया को सोडियम लाइट में भी आप दाना पानी तलाश करते हुए देख सकते हैं।
‘गैरेया के स्वाभाविक व्यवहार में यह बदलाव उसके अपने आसपास के वातावरण के साथ समायोजन कर लेने की कवायद है। पहले भी जब गौरेया को पेड़ों के तने नहीं मिले तो मकानों, कठियों के झरोंखों में उसने घोंसला बनाया है’
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- सुबोध नंदन शर्मा, पर्यावरणविद्
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दाना पानी और अस्तित्व बचाए रखने की मजबूरी ने घर आंगन की चिड़िया गौरेया को भी अपनी प्राकृतिक दिनचर्या बदलने को मजबूर कर दिया है। दिन के शोरगुल और प्रदूषण से बौखलाई गौरेया को अब रात में सोडियम लाइट की रोशनी में भी दाना पानी तलाश करते हुए और दाना चुगते हुए देखा जा सकता है। (देखें तस्वीरें) पर्यावरण के जानकार और पक्षियों के विषय में जानकारी रखने वाले इसे शहर में अनुकूलन के लिए पक्षियों के संघर्ष से जोड़कर देखते हैं।
पक्षियों के विषय में जानकारी रखने वाले डॉ. राम प्रकाश कहते हैं कि गौरेया का प्राकृतिक चक्र सुबह के समय चहचहाट, दिन के समय दाना पानी और गोधूलि के समय बसेरों पर वापस आ जाने की है। सदियों से यही क्रम गौरेया के साथ रहा है। गौरेया एक ऐसा परिंदा है जिसने मनुष्यों के साथ अपना तालमेल शानदार तरीके से बैठाया है। पिछले कुछ दशकों से शहरों में आटोमोबाइल्स, मोबाइल टावर, बढ़ रहे कारखाने, बहुमंजिला इमारतें और फ्लैट्स गौरेया के लिए दिक्कत पैदा कर रहे हैं। दिन में उसके लिए दाना पानी तलाशना असहज हो रहा है। इसलिए अब गौरेया को सोडियम लाइट में भी आप दाना पानी तलाश करते हुए देख सकते हैं।
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‘गैरेया के स्वाभाविक व्यवहार में यह बदलाव उसके अपने आसपास के वातावरण के साथ समायोजन कर लेने की कवायद है। पहले भी जब गौरेया को पेड़ों के तने नहीं मिले तो मकानों, कठियों के झरोंखों में उसने घोंसला बनाया है’
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- सुबोध नंदन शर्मा, पर्यावरणविद्