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रुपये असली लेते हैं, पर थमा देते हैं वाहन का नकली बीमा
Updated Sat, 14 Jul 2018 01:52 AM IST
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
आरटीओ कार्यालय में अंदर तक पैठ बनाकर बिचौलिये आए दिन कार्यालय की ‘विश्वसनीयता’ की पीठ पर छुरा घोंप रहे हैं। इनके झांसे में वाहन स्वामी भी फंस रहे हैं।
कम पैसे में फर्जी बीमा तैयार कर उसे वाहन स्वामी को थमाने में गुरेज तक नहीं कर रहे हैं। हैरत यह है कि इस फर्जी कागज को देखे बैगर कार्यालय के अधिकारी-लिपिक पास कर देते हैं। हालांकि, एआरटीओ प्रशासन रंजीत सिंह ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
बीमा के नाम पर हो रही धोखाधड़ी तब उजागर हुई, जब यूपी 81 एडी 2016 व यूपी 81 बीएच 0508 की फाइल अधिकारी को दिख गई। इसमें तमाम खामियां थीं। बावजूद इसके कागज पर लिपिक के हस्ताक्षर थे। इस पर एआरटीओ प्रशासन ने लिपिक को खरी-खोटी भी सुनाई। इसके बाद कार्यालय में खलबली मच गई। कुछ वाहन स्वामी भी अपने कागज वापस ले गए।
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800 का बीमा 50 रुपये में
दोपहिया वाहन का बीमा 800 रुपये में होता है। मगर, कार्यालय के बाहर बैठे बिचौलिये इस बीमा को 50 से 100 रुपये में बना देते हैं। यही नहीं बड़े वाहनों का बीमा दो हजार रुपये में कर देते हैं, जबकि इसकी फीस 20 हजार रुपये है।
बिचौलिये हैं टेक्नोलॉजी से लैस
आरटीओ के बाहर बिचौलियों की टेक्नोलॉजी से लैस दुकानें हैं। बिचौलियों को फोटोशॉप तक की जानकारी है। इसी फोटोशॉप के जरिये नाम, वाहन नंबर, तिथि बदलकर फर्जी बीमा की कॉपी फौरन तैयार कर देते हैं।
सावधानी में चूक
अक्सर आरटीओ के अधिकारी व कर्मचारी बीमा को लेकर बरती जाने वाली सावधानी में चूक कर बैठते हैं। बीमा से पहले वाहन स्वामी से मूल कॉपी मांग ली जाए, तो इस चूक को कम जा सकती है।
एप से जान सकते हैं सच्चाई
आरटीओ कार्यालय में अधिकारियों व कर्मचारियों के पास एंड्रायड मोबाइल होते हैं, इनमें कई ऐसे एप होते हैं, जिससे बीमा फर्जी और असली के अंतर को जान सकते हैं।
वाहन खरीदने वाले को होती परेशानी
फर्जी बीमा वाली गाड़ी बेचने वाले को कोई दिक्कत नहीं होगी, लेकिन खरीदने वाले को परेशानी हो सकती है। हादसा होने पर गाड़ी खरीदने वाला जब क्लेम का दावा करता है, तो पता चलता है कि बीमा फर्जी है।
जैसे ही मामला संज्ञान में आया, फौरन संबंधित बाबू को बुलाकर प्रपत्रों की सही से देखने के बाद ही हस्ताक्षर करने की हिदायत दी।
-रंजीत सिंह, एआरटीओ (प्रशासन)
--
बीमा विशेषज्ञ शरद बंसल की राय
-यदि आप गाड़ी खरीदते हैं तो पंजीकृत कंपनी से ही अपने वाहन का बीमा कराएं।
- बीमा के कागज पर बार कोड होता है, इसे मोबाइल से स्कैन कर देख सकते हैं।
- बीमा के कागज पर टोल फ्री नंबर अंकित होता है, जिससे बीमा संबंधी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
-बिचौलिये के चक्कर में पड़ने के बजाय बीमा अभिकर्ता से मिलकर बीमा कराएं।
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आरटीओ कार्यालय में अंदर तक पैठ बनाकर बिचौलिये आए दिन कार्यालय की ‘विश्वसनीयता’ की पीठ पर छुरा घोंप रहे हैं। इनके झांसे में वाहन स्वामी भी फंस रहे हैं।
कम पैसे में फर्जी बीमा तैयार कर उसे वाहन स्वामी को थमाने में गुरेज तक नहीं कर रहे हैं। हैरत यह है कि इस फर्जी कागज को देखे बैगर कार्यालय के अधिकारी-लिपिक पास कर देते हैं। हालांकि, एआरटीओ प्रशासन रंजीत सिंह ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
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बीमा के नाम पर हो रही धोखाधड़ी तब उजागर हुई, जब यूपी 81 एडी 2016 व यूपी 81 बीएच 0508 की फाइल अधिकारी को दिख गई। इसमें तमाम खामियां थीं। बावजूद इसके कागज पर लिपिक के हस्ताक्षर थे। इस पर एआरटीओ प्रशासन ने लिपिक को खरी-खोटी भी सुनाई। इसके बाद कार्यालय में खलबली मच गई। कुछ वाहन स्वामी भी अपने कागज वापस ले गए।
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800 का बीमा 50 रुपये में
दोपहिया वाहन का बीमा 800 रुपये में होता है। मगर, कार्यालय के बाहर बैठे बिचौलिये इस बीमा को 50 से 100 रुपये में बना देते हैं। यही नहीं बड़े वाहनों का बीमा दो हजार रुपये में कर देते हैं, जबकि इसकी फीस 20 हजार रुपये है।
बिचौलिये हैं टेक्नोलॉजी से लैस
आरटीओ के बाहर बिचौलियों की टेक्नोलॉजी से लैस दुकानें हैं। बिचौलियों को फोटोशॉप तक की जानकारी है। इसी फोटोशॉप के जरिये नाम, वाहन नंबर, तिथि बदलकर फर्जी बीमा की कॉपी फौरन तैयार कर देते हैं।
सावधानी में चूक
अक्सर आरटीओ के अधिकारी व कर्मचारी बीमा को लेकर बरती जाने वाली सावधानी में चूक कर बैठते हैं। बीमा से पहले वाहन स्वामी से मूल कॉपी मांग ली जाए, तो इस चूक को कम जा सकती है।
एप से जान सकते हैं सच्चाई
आरटीओ कार्यालय में अधिकारियों व कर्मचारियों के पास एंड्रायड मोबाइल होते हैं, इनमें कई ऐसे एप होते हैं, जिससे बीमा फर्जी और असली के अंतर को जान सकते हैं।
वाहन खरीदने वाले को होती परेशानी
फर्जी बीमा वाली गाड़ी बेचने वाले को कोई दिक्कत नहीं होगी, लेकिन खरीदने वाले को परेशानी हो सकती है। हादसा होने पर गाड़ी खरीदने वाला जब क्लेम का दावा करता है, तो पता चलता है कि बीमा फर्जी है।
जैसे ही मामला संज्ञान में आया, फौरन संबंधित बाबू को बुलाकर प्रपत्रों की सही से देखने के बाद ही हस्ताक्षर करने की हिदायत दी।
-रंजीत सिंह, एआरटीओ (प्रशासन)
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बीमा विशेषज्ञ शरद बंसल की राय
-यदि आप गाड़ी खरीदते हैं तो पंजीकृत कंपनी से ही अपने वाहन का बीमा कराएं।
- बीमा के कागज पर बार कोड होता है, इसे मोबाइल से स्कैन कर देख सकते हैं।
- बीमा के कागज पर टोल फ्री नंबर अंकित होता है, जिससे बीमा संबंधी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
-बिचौलिये के चक्कर में पड़ने के बजाय बीमा अभिकर्ता से मिलकर बीमा कराएं।