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असदुद्दीन ओवैसी: स्कूल में हिजाब पहनने की नहीं मिली इजाजत; भड़के एआईएमआईएम सांसद, आदेश को बताया इस्लाम पर हमला

Wed, 26 Aug 2026 08:39 AM IST
प्रशांत तिवारी एएनआई, नई दिल्ली
एएनआई, नई दिल्ली Published by: प्रशांत तिवारी Updated Wed, 26 Aug 2026 08:39 AM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज के एक स्कूल की छात्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ स्कार्फ या हिजाब पहनने की अनुमति मांगी थी। कोर्ट के इस फैसले की आलोचना करते हुए  प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसे 'इस्लाम पर हमला' बताया और संविधान के अनुच्छेद 25 व 19 का हवाला दिया।

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Asaduddin Owaisi Denied permission to wear hijab in school lashes out calls order an attack on Islam
असदुद्दीन ओवैसी, सांसद, एआईएमआईएम - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश की कड़ी आलोचना की है, जिसमें प्रयागराज के एक स्कूल की नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज कर दी गई थी। छात्रा ने स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगी थी। मंगलवार को दारुस्सलाम स्थित पार्टी मुख्यालय में आयोजित ‘जलसा-ए-रहमतुल-लिल-आलमीन’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ओवैसी ने हाई कोर्ट के फैसले को 'इस्लाम पर हमला' बताया। उन्होंने कहा कि जब सबरीमाला मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और संविधान के तहत किसी धर्म में किसी प्रथा की ‘अनिवार्यता’ पर विचार किया जा रहा है, तब हाई कोर्ट को ऐसा आदेश नहीं देना चाहिए था।

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‘मैं हाई कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं’
एआईएमआईएम प्रमुख ने कहा,'इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक फैसला आया। एक लड़की स्कूल में हिजाब पहनकर जाती थी और कोर्ट ने फैसला सुनाया कि हिजाब नहीं पहना जा सकता। मैं हाई कोर्ट के इस फैसले से सहमत नहीं हूं; मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। सबरीमाला मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के सामने है, जहां नौ जज यह तय कर रहे हैं कि क्या जरूरी है।' 
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'फैसला अनुच्छेद 25 और 19 का उल्लंघन' 
आज का फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 19 का उल्लंघन करता है। आप कौन होते हैं यह तय करने वाले कि इस्लाम के लिए क्या जरूरी है? लड़कियां हिजाब अपने सिर पर पहनती हैं, दिमाग पर नहीं। यह इस्लाम पर हमला है।”
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हाई कोर्ट ने ‘धार्मिक अनिवार्यता’ के दावे पर क्या कहा?
मंगलवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई धार्मिक ग्रंथ या अन्य सामग्री पेश करने में नाकाम रही, जिससे यह साबित हो सके कि स्कार्फ पहनना उसके धर्म का ऐसा “जरूरी” हिस्सा है, जिसके बिना उसकी धार्मिक आस्था प्रभावित होगी। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि तस्वीरों में उसी धार्मिक समुदाय के कुछ अन्य छात्र बिना स्कार्फ के नजर आ रहे थे। अदालत ने कहा कि जब स्कूल का ड्रेस कोड सभी छात्रों के लिए समान हो, नेक नीयत से बनाया गया हो, भेदभावपूर्ण न हो और उसका उद्देश्य अनुशासन तथा संस्थागत पहचान बनाए रखना हो, तो यूनिफॉर्म तय करना मुख्य रूप से स्कूल के अधिकार क्षेत्र में आता है।

यूनिफॉर्म को लेकर स्कूल के अधिकार को माना अहम
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही छात्रा निचली कक्षाओं में बिना किसी रोक-टोक के स्कार्फ पहनती रही हो, लेकिन इससे उसे स्कूल की यूनिफॉर्म नीति में बदलाव की मांग करने का कोई स्थायी या कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार हासिल नहीं हो जाता। जस्टिस जे.जे. मुनीर और इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि स्कूल छात्रा की धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता को कम नहीं कर रहा है, बल्कि संस्थागत अनुशासन की मांग कर रहा है और यूनिफॉर्म उसी अनुशासन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

कक्षा 11 में दाखिले के दौरान शुरू हुआ विवाद
याचिकाकर्ता छात्रा ने इसी स्कूल से हाई स्कूल यानी कक्षा 10 की पढ़ाई पूरी की थी और कक्षा 11 में दाखिला लेना चाहती थी। छात्रा का कहना था कि वह कक्षा 6 से ही स्कूल यूनिफॉर्म के ऊपर स्कार्फ पहनती आ रही थी और इस पर स्कूल की ओर से कभी कोई आपत्ति नहीं जताई गई। हालांकि, कक्षा 11 में दाखिले के समय स्कूल प्रबंधन ने उसे बताया कि स्कार्फ पहनना स्कूल के ड्रेस कोड का उल्लंघन है। इसी आधार पर छात्रा को कक्षा 11 में दाखिला देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद उसने हाई कोर्ट का रुख किया था।


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सबरीमाला मामले का हवाला देकर ओवैसी ने उठाए सवाल
ओवैसी ने अपने बयान में सुप्रीम कोर्ट में लंबित सबरीमाला मामले का हवाला देते हुए धार्मिक प्रथाओं की ‘अनिवार्यता’ तय करने के सवाल पर भी आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि जब सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ इस व्यापक संवैधानिक प्रश्न पर विचार कर रही है, तब किसी धार्मिक प्रथा को लेकर ऐसा फैसला नहीं दिया जाना चाहिए था।
 

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