{"_id":"5ccf4b4cbdec22076759e0be","slug":"191557089100-aligarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"डूडा दफ्तर से चलता था सीडीएस वर्कर का ‘गैंग’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
डूडा दफ्तर से चलता था सीडीएस वर्कर का ‘गैंग’
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
क्राइम न्यूज, अभिषेक शर्मा, अलीगढ़।
एलमपुर आवास परियोजना का उद्घोष ही भ्रष्टाचार से किया गया था। खुद डूडा ही इसका उद्घोषक था। तभी दलाल इस परियोजना में एंट्री की हिमाकत कर पाए और फर्जीवाड़े के सारे रिकॉर्ड तोड़ते चले गए। जी हां, डूडा में हर लाभार्थी से 7 से 12 तक रिश्वत ली गई, तब जाकर उन्हें फ्लैटों के आवंटन पत्र सौंपे। डूडा के तत्कालीन बाबू सीडीएस वर्करों की मदद से यह रकम लाभार्थी से वसूलते थे।
एक सीडीएस वर्कर ने रविवार को डूडा के भ्रष्टाचार की पोल खोल दी। ‘अमर उजाला’ के पास इस बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग मौजूद हैं। हालांकि डीएम से लेकर पीओ डूडा तक इस पूरे मामले में गंभीरता से जांच की बात पहले ही दिन से कह रहे हैं और जांच होने पर यह तथ्य सामने आएंगे। मगर आइए, आज बताते हैं डूडा में सीडीएस वर्कर की भूमिका और उन्होंने क्या क्या खुलासे किए। पेश है विस्तृत रिपोर्ट..
सीडीएस वर्कर की भूमिका
जिला नगरीय विकास अभिकरण की सभी योजनाओं को लागू कराने में 2 साल पहले तक सीडीएस वर्कर की भूमिका बेहद अहम थी। चाहे ऋण आवेदन हो या शहरी गरीब आवास। आवेदक की हकीकत पर पहली रिपोर्ट सीडीएस वर्कर ही देते थे। डूडा की किसी भी योजना का बेसलाइन सर्वे यही वर्कर करते थे। एलमपुर परियोजना में भी ऐसा ही हुआ। इनके सर्वे पर आधारित डीपीआर को ही लखनऊ पास कराने भेजा गया था।
विज्ञापन
उसके बाद उनकी पात्रता की जांच भले लेखपालों को दी गई, लेकिन लेखपालों ने भी इन्हीं की मदद से पात्रता परखी थी। उसी सूची पर अफसरों की चयन समिति ने अंतिम मोहर लगाई। लाभार्थी तय होने के बाद उन्हें आवंटन पत्र वितरण व उनसे लाभार्थी अंश वसूलने में भी सीडीएस वर्कर को ही इस्तेमाल किया गया।
इन्हें महज आवागमन के लिए 300 रुपये मासिक भत्ता दिया जाता था। शहर में आधा दर्जन से अधिक महिलाओं को सीडीएस वर्कर मनोनीत किया गया था। परंतु 2 वर्ष पूर्व सीडीएस वर्कर प्रणाली को खत्म कर यह कार्य एनजीओ को दे दिया गया है।
35 से 40 हजार लेते थे
सीडीएस वर्कर ने खुलासा किया कि एलमपुर परियोजना में जिस लाभार्थी का अंश 28 हजार रुपये था। उसे यह रकम चुकानी होती थी, इसकी रसीद भी मिलती थी। तभी आवंटन पत्र दिया जाता था। लेकिन इसके लिए लाभार्थी से 35 से 40 हजार रुपये तक लिए जाते थे।
तभी उसे 28 हजार की रसीद दी जाती थी। रिश्वत की इसी दर से लाभार्थियों को आवंटन पत्र दिए जाते थे। सीडीएस वर्कर पर दबाव था कि ये रकम वो लाभार्थी से वसूलकर डूडा के तत्कालीन बाबू को जमा कराकर रसीद व आवंटन पत्र लेजाकर लाभार्थी को दे दें। यानी लाभार्थी अंश से अतिरिक्त 7 से 12 हजार की रिश्वत लाभार्थियों से ली जाती थी।
सीडीएस वर्कर ने यह भी स्वीकार किया कि इस रकम से 2 ढाई हजार की राशि डूडा बाबू इनाम स्वरूप सीडीएस वर्कर को भी देते थे। रसीद की रकम के अलावा 4-6 हजार की रिश्वत तो बहुत सामान्य बात थी। अधिकतर लाभार्थियों के पास पूरे दस्तावेज नहीं होते थे। जैसे जाति प्रमाण पत्र, मूल निवास और एक शपथ पत्र। ऐसे में इन दस्तावेजों को भी डूडा बाबू खुद बनवा लेते थे।
गरीब इस रकम से बेबस थे
जो वाकई गरीब थे उनके लिए 10 हजार रुपये की राशि जुटाना भी बड़ी बात थी। जो मेहनत मजदूरी से काम चला रहे थे उनके लिए भी इतनी रकम जुटाना आसान नहीं था। डूडा के नोटिस पर भी बहुत से लोग रसीद की रकम भी नहीं जुटा पाए थे। ऐसे 2 दर्जन लोगों के न आने का ही तो दलालों ने लाभ लिया।
उनके नाम के आवंटन उन्होंने खुद तैयार कर ढाई से साढे 5 लाख में बेच डाले। इस परियोजना में वास्तविक गरीबों को ही आवास के लिए चुना गया, इसमें भी संदेह है। सीएंडडीएस की 3 दिनी जांच में भी ये सवाल बार बार आ रहा है कि गरीबों के पास रिश्वत तो दूर लाभार्थी अंश जमा करना भी मुश्किल था।
पूरी रिश्वत न देने वालों को नहीं मिली रसीद
अभी भी 2 दर्जन आवंटी ऐसे हैं जिनकी रसीद डूडा ने काट दीं लेकिन लाभार्थियों तक नहीं पहुंची हैं। ऐसा उन लाभार्थियों के साथ हुआ जिनकी रिश्वत में हजार 2 हजार कम पड़ गए। क्योंकि इतना ही हिस्सा डूडा बाबू सीडीएस वर्कर को देते थे। तो उन्होंने रसीद सीडीएस वर्कर्स को सौंपते हुए कह दिया कि तुम्हारा हिस्सा लाभार्थी पर शेष है।
लाभार्थी से लेकर रसीद दे देना। 2 दर्जन लाभार्थी उस शेष को आज तक नहीं चुका पाए इसलिए उनकी रसीद भी सीडीएस वर्कर्स पर ही अटकी हैं। लेकिन सीएंडडीएस टीम की जांच के बाद रसीद जुटाने को दौड़भाग हो रही है। कुछ रसीद तो वर्कर्स से ही गुम हो गईं। ऐसे में उन्हें डूडा से डुप्लीकेट रसीद दिलवाई जा रही हैं।
विज्ञापन
एलमपुर आवास परियोजना का उद्घोष ही भ्रष्टाचार से किया गया था। खुद डूडा ही इसका उद्घोषक था। तभी दलाल इस परियोजना में एंट्री की हिमाकत कर पाए और फर्जीवाड़े के सारे रिकॉर्ड तोड़ते चले गए। जी हां, डूडा में हर लाभार्थी से 7 से 12 तक रिश्वत ली गई, तब जाकर उन्हें फ्लैटों के आवंटन पत्र सौंपे। डूडा के तत्कालीन बाबू सीडीएस वर्करों की मदद से यह रकम लाभार्थी से वसूलते थे।
एक सीडीएस वर्कर ने रविवार को डूडा के भ्रष्टाचार की पोल खोल दी। ‘अमर उजाला’ के पास इस बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग मौजूद हैं। हालांकि डीएम से लेकर पीओ डूडा तक इस पूरे मामले में गंभीरता से जांच की बात पहले ही दिन से कह रहे हैं और जांच होने पर यह तथ्य सामने आएंगे। मगर आइए, आज बताते हैं डूडा में सीडीएस वर्कर की भूमिका और उन्होंने क्या क्या खुलासे किए। पेश है विस्तृत रिपोर्ट..
विज्ञापन
सीडीएस वर्कर की भूमिका
जिला नगरीय विकास अभिकरण की सभी योजनाओं को लागू कराने में 2 साल पहले तक सीडीएस वर्कर की भूमिका बेहद अहम थी। चाहे ऋण आवेदन हो या शहरी गरीब आवास। आवेदक की हकीकत पर पहली रिपोर्ट सीडीएस वर्कर ही देते थे। डूडा की किसी भी योजना का बेसलाइन सर्वे यही वर्कर करते थे। एलमपुर परियोजना में भी ऐसा ही हुआ। इनके सर्वे पर आधारित डीपीआर को ही लखनऊ पास कराने भेजा गया था।
विज्ञापन
उसके बाद उनकी पात्रता की जांच भले लेखपालों को दी गई, लेकिन लेखपालों ने भी इन्हीं की मदद से पात्रता परखी थी। उसी सूची पर अफसरों की चयन समिति ने अंतिम मोहर लगाई। लाभार्थी तय होने के बाद उन्हें आवंटन पत्र वितरण व उनसे लाभार्थी अंश वसूलने में भी सीडीएस वर्कर को ही इस्तेमाल किया गया।
इन्हें महज आवागमन के लिए 300 रुपये मासिक भत्ता दिया जाता था। शहर में आधा दर्जन से अधिक महिलाओं को सीडीएस वर्कर मनोनीत किया गया था। परंतु 2 वर्ष पूर्व सीडीएस वर्कर प्रणाली को खत्म कर यह कार्य एनजीओ को दे दिया गया है।
35 से 40 हजार लेते थे
सीडीएस वर्कर ने खुलासा किया कि एलमपुर परियोजना में जिस लाभार्थी का अंश 28 हजार रुपये था। उसे यह रकम चुकानी होती थी, इसकी रसीद भी मिलती थी। तभी आवंटन पत्र दिया जाता था। लेकिन इसके लिए लाभार्थी से 35 से 40 हजार रुपये तक लिए जाते थे।
तभी उसे 28 हजार की रसीद दी जाती थी। रिश्वत की इसी दर से लाभार्थियों को आवंटन पत्र दिए जाते थे। सीडीएस वर्कर पर दबाव था कि ये रकम वो लाभार्थी से वसूलकर डूडा के तत्कालीन बाबू को जमा कराकर रसीद व आवंटन पत्र लेजाकर लाभार्थी को दे दें। यानी लाभार्थी अंश से अतिरिक्त 7 से 12 हजार की रिश्वत लाभार्थियों से ली जाती थी।
सीडीएस वर्कर ने यह भी स्वीकार किया कि इस रकम से 2 ढाई हजार की राशि डूडा बाबू इनाम स्वरूप सीडीएस वर्कर को भी देते थे। रसीद की रकम के अलावा 4-6 हजार की रिश्वत तो बहुत सामान्य बात थी। अधिकतर लाभार्थियों के पास पूरे दस्तावेज नहीं होते थे। जैसे जाति प्रमाण पत्र, मूल निवास और एक शपथ पत्र। ऐसे में इन दस्तावेजों को भी डूडा बाबू खुद बनवा लेते थे।
गरीब इस रकम से बेबस थे
जो वाकई गरीब थे उनके लिए 10 हजार रुपये की राशि जुटाना भी बड़ी बात थी। जो मेहनत मजदूरी से काम चला रहे थे उनके लिए भी इतनी रकम जुटाना आसान नहीं था। डूडा के नोटिस पर भी बहुत से लोग रसीद की रकम भी नहीं जुटा पाए थे। ऐसे 2 दर्जन लोगों के न आने का ही तो दलालों ने लाभ लिया।
उनके नाम के आवंटन उन्होंने खुद तैयार कर ढाई से साढे 5 लाख में बेच डाले। इस परियोजना में वास्तविक गरीबों को ही आवास के लिए चुना गया, इसमें भी संदेह है। सीएंडडीएस की 3 दिनी जांच में भी ये सवाल बार बार आ रहा है कि गरीबों के पास रिश्वत तो दूर लाभार्थी अंश जमा करना भी मुश्किल था।
पूरी रिश्वत न देने वालों को नहीं मिली रसीद
अभी भी 2 दर्जन आवंटी ऐसे हैं जिनकी रसीद डूडा ने काट दीं लेकिन लाभार्थियों तक नहीं पहुंची हैं। ऐसा उन लाभार्थियों के साथ हुआ जिनकी रिश्वत में हजार 2 हजार कम पड़ गए। क्योंकि इतना ही हिस्सा डूडा बाबू सीडीएस वर्कर को देते थे। तो उन्होंने रसीद सीडीएस वर्कर्स को सौंपते हुए कह दिया कि तुम्हारा हिस्सा लाभार्थी पर शेष है।
लाभार्थी से लेकर रसीद दे देना। 2 दर्जन लाभार्थी उस शेष को आज तक नहीं चुका पाए इसलिए उनकी रसीद भी सीडीएस वर्कर्स पर ही अटकी हैं। लेकिन सीएंडडीएस टीम की जांच के बाद रसीद जुटाने को दौड़भाग हो रही है। कुछ रसीद तो वर्कर्स से ही गुम हो गईं। ऐसे में उन्हें डूडा से डुप्लीकेट रसीद दिलवाई जा रही हैं।