{"_id":"5a6f88374f1c1b90268b7318","slug":"161517258807-aligarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"सर सैयद का ध्येय उदारवादी सहिष्\nणुता की परंपरा को आगे बढ़ाना है","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सर सैयद का ध्येय उदारवादी सहिष् णुता की परंपरा को आगे बढ़ाना है
Updated Tue, 30 Jan 2018 02:16 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के कुलपति प्रो. फैजान मुस्तफा ने कहा कि सर सैयद का ध्येय दार्शनिकवाद को बढ़ावा देते हुए स्वतंत्र खोज एवं उदारवादी सहिष्णुता की परंपरा को आगे बढ़ाना था।
प्रो. मुस्तफा सोमवार को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एडवांस स्टडीज इन हिस्ट्री (इतिहास विभाग) के तत्वावधान में ‘सर सैयद अहमद खान : इतिहासकार, विद्वान तथा तर्कशास्त्री’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि एमएओ कॉलेज के स्थापना से ही यहां गैर मुस्लिम छात्रों की एक अच्छी संख्या उपस्थित रही है और इस संस्था में शैक्षणिक प्रक्रिया का स्तर मेरिट के आधार पर तय होता रहा है। प्रो. मुस्तफा ने कहा कि सर सैयद पहले भारतीय थे, जिन्होंने दक्षिणी एशिया में मुसलमानों के आधुनिकीकरण तथा शैक्षणिक प्रबलता के लिए कार्य किया।
विज्ञापन
एएमयू कुलपति प्रो. तारिक मंसूर ने कहा कि सर सैयद एक बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक थे। उनको दूरदृष्टि एवं बौद्धिकता ईश्वर की ओर से वरदान थी। किसी व्यक्ति की प्रतिभा का आकलन उसके काल, स्थान तथा तात्कालिक घटनाक्रम में उसकी भूमिका के आधार पर किया जाता है।
उन्हाेंने आसार-उस-सनादीद में दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों पर प्रकाश डालते हुए अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था। बाद में असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द लिख कर सर सैयद ने न केवल अंग्रेजों की राजनैतिक सूझ बूझ पर प्रश्न चिन्ह लगाया बल्कि 1857 की क्रांति के सर्व मान्य कारणों को चिह्नित किया, जिनसे स्वयं अंग्रेजों को सरकारी नीतियों में सुधार लाने का अवसर प्राप्त हुआ।
प्रख्यात इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब ने कहा कि धार्मिक पुस्तकों की व्याख्या द्वारा सर सैयद ने धार्मिक मूल्यों एवं तर्क पर आधारित अपनी विचार शक्ति का प्रदर्शन किया।
उन्होंने कहा कि सर सैयद का मानना था कि कुरान एक दैवीय कार्य है जो प्रकृति के नियम के विरुद्ध नहीं हो सकता। सर सैयद ने लोगों को प्रोत्साहित किया कि वह कुरान के उपदेशों को तर्क के आधार पर समझने का प्रयत्न करें।
यद्यपि सर सैयद को अत्यधिक विरोध का भी सामना करना पड़ा परंतु वह अपने दृष्टिकोण पर जमे रहे। विभागाध्यक्ष प्रो. अली नदीम रेजावी ने कहा कि सर सैयद आर्कोलोजी के ज्ञान के प्रथम विशेषज्ञों में गिने जाते हैं। कार्यक्रम में अमरीका तथा इंग्लैंड समेत विभिन्न देशों से 24 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।
सेमिनार के साथ ही सर सैयद की आर्कोलोजिकल सेवाओं तथा अलीगढ़ में पाये जाने वाले आर्कोलोजिकल नमूनों की एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया है, जो एक फरवरी 2018 तक चलेगी।
विज्ञापन
नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के कुलपति प्रो. फैजान मुस्तफा ने कहा कि सर सैयद का ध्येय दार्शनिकवाद को बढ़ावा देते हुए स्वतंत्र खोज एवं उदारवादी सहिष्णुता की परंपरा को आगे बढ़ाना था।
प्रो. मुस्तफा सोमवार को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एडवांस स्टडीज इन हिस्ट्री (इतिहास विभाग) के तत्वावधान में ‘सर सैयद अहमद खान : इतिहासकार, विद्वान तथा तर्कशास्त्री’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि एमएओ कॉलेज के स्थापना से ही यहां गैर मुस्लिम छात्रों की एक अच्छी संख्या उपस्थित रही है और इस संस्था में शैक्षणिक प्रक्रिया का स्तर मेरिट के आधार पर तय होता रहा है। प्रो. मुस्तफा ने कहा कि सर सैयद पहले भारतीय थे, जिन्होंने दक्षिणी एशिया में मुसलमानों के आधुनिकीकरण तथा शैक्षणिक प्रबलता के लिए कार्य किया।
विज्ञापन
एएमयू कुलपति प्रो. तारिक मंसूर ने कहा कि सर सैयद एक बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक थे। उनको दूरदृष्टि एवं बौद्धिकता ईश्वर की ओर से वरदान थी। किसी व्यक्ति की प्रतिभा का आकलन उसके काल, स्थान तथा तात्कालिक घटनाक्रम में उसकी भूमिका के आधार पर किया जाता है।
उन्हाेंने आसार-उस-सनादीद में दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों पर प्रकाश डालते हुए अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था। बाद में असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द लिख कर सर सैयद ने न केवल अंग्रेजों की राजनैतिक सूझ बूझ पर प्रश्न चिन्ह लगाया बल्कि 1857 की क्रांति के सर्व मान्य कारणों को चिह्नित किया, जिनसे स्वयं अंग्रेजों को सरकारी नीतियों में सुधार लाने का अवसर प्राप्त हुआ।
प्रख्यात इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब ने कहा कि धार्मिक पुस्तकों की व्याख्या द्वारा सर सैयद ने धार्मिक मूल्यों एवं तर्क पर आधारित अपनी विचार शक्ति का प्रदर्शन किया।
उन्होंने कहा कि सर सैयद का मानना था कि कुरान एक दैवीय कार्य है जो प्रकृति के नियम के विरुद्ध नहीं हो सकता। सर सैयद ने लोगों को प्रोत्साहित किया कि वह कुरान के उपदेशों को तर्क के आधार पर समझने का प्रयत्न करें।
यद्यपि सर सैयद को अत्यधिक विरोध का भी सामना करना पड़ा परंतु वह अपने दृष्टिकोण पर जमे रहे। विभागाध्यक्ष प्रो. अली नदीम रेजावी ने कहा कि सर सैयद आर्कोलोजी के ज्ञान के प्रथम विशेषज्ञों में गिने जाते हैं। कार्यक्रम में अमरीका तथा इंग्लैंड समेत विभिन्न देशों से 24 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।
सेमिनार के साथ ही सर सैयद की आर्कोलोजिकल सेवाओं तथा अलीगढ़ में पाये जाने वाले आर्कोलोजिकल नमूनों की एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया है, जो एक फरवरी 2018 तक चलेगी।