{"_id":"5b870ac542c792464f497799","slug":"141535576773-aligarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"22 साल बाद तिहरे हत्याकांड से बरी हुए आरोपी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
22 साल बाद तिहरे हत्याकांड से बरी हुए आरोपी
Updated Thu, 30 Aug 2018 02:36 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
क्राइम डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
बाइस बरस पहले कस्बा खैर के मोहल्ला उपाध्याय में हुए तिहरे हत्याकांड के उन तीन आरोपियों को हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है, जिन्हें सत्र न्यायालय से उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट का यह फैसला आते-आते हत्याकांड में उम्रकैद पा चुके एक आरोपी की मौत भी हो गई। अब हाईकोर्ट के इस आदेश का लाभ दो लोगों को मिलेगा। ऐसे में फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर यह हत्याएं किसने की थीं..?
बात 29/30 दिसंबर वर्ष 1995, रात डेढ़ बजे की है। खैर कस्बे के मोहल्ला उपाध्याय में हमलावरों ने पहले मोहल्ले के नौबत सिंह की दो गोलियां मारकर हत्या की। इसके बाद यह हमलावर मोहल्ले के ही रत्ना सिंह व भूदेव को खोजते हुए उनके बाग पर गए और वहां जाकर उनकी गला रेतकर हत्या कर दी। इस दौरान इनके साथ बाग पर मौजूद परिवार की महिला चीखती-चिल्लाती रह गई।
इस संबंध में 31 दिसंबर को नौबत सिंह के भाई चंद्रपाल ने यह कहते हुए हत्या का नामजद मुकदमा दर्ज कराया कि रात को वह अपने भाई नौबत के साथ बाग से घर लौटा था और घर के दरवाजे पर पड़ी दो अलग-अलग चारपाइयों पर दोनों सो गए। तभी नामजद मोहल्ले के ही बनवारी, महेश व रोशन और उनके दो अज्ञात साथी हमलावर होकर आए। जिन्हें उसने पहचान लिया। यह तीनों नौबत की हत्या के बाद भूदेव व रत्ना को खोजते हुए उन्हें भी देख लेने की बात कहते हुए बाग पर गए। वह खुद उनके पीछे कुछ ग्रामीणों संग गया। जहां उन्होंने भूदेव व रत्ना की हत्या की। इस दौरान मारे डर के वह दूर से सब देखते रहे।
विज्ञापन
मुकदमे में हत्या के पीछे इस रंजिश का उल्लेख किया कि यह नामजद कहते हुए आए थे कि यह लोग हमारी पुलिस से मुखबिरी करते हैं। हम अगर जमानत आदि के लिए मदद की कहें तो जमानत लेने भी नहीं आते। इसलिए तीनों की हत्या की गई।
चंद्रपाल की तहरीर पर दर्ज मुकदमे में पुलिस ने तीनों नामजदों के अलावा एक अन्य नाम उजागर करते हुए चार्जशीट दायर कर दी। इस पर सत्र परीक्षण के दौरान 18 अगस्त 2004 को अपर सत्र न्यायालय ने चंद्रपाल की चश्मदीद गवाही को मजबूत साक्ष्य मानते हुए। रोशन, बनवारी और महेश को तीन हत्याओं में उम्र कैद की सजा सुना दी। बहरहाल, बनवारी, महेश और रोशन ने उम्रकैद की सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर दी। सुनवाई के दौरान रोशन की मौत हो गई। बनवारी और महेश में पहले महेश को जमानत मिल गई। पैसों के अभाव में बनवारी की पैरोकारी नहीं होने से अदालत ने उसको एक वकील मुहैया कराया। गुजरी 24 अगस्त को हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश खारिज कर आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया।
हाईकोर्ट ने पुलिस की उस दलील को मना जिसमें मौके पर एक चारपाई और एक बिस्तर मिलने का नक्शा और बयान दिया गया था। आरोपियों के बरी होने का आधार भी यही बना। अदालत ने माना कि जब एक चारपाई और बिस्तर मौके पर थे तो चंद्रपाल भी मौके का गवाह नहीं हो सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया। इस मामले में पैरवी हाईकोर्ट के अधिवक्ता जनार्दन प्रसाद त्रिपाठी व जितेंद्र सिंह ने की है।
विज्ञापन
बाइस बरस पहले कस्बा खैर के मोहल्ला उपाध्याय में हुए तिहरे हत्याकांड के उन तीन आरोपियों को हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है, जिन्हें सत्र न्यायालय से उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट का यह फैसला आते-आते हत्याकांड में उम्रकैद पा चुके एक आरोपी की मौत भी हो गई। अब हाईकोर्ट के इस आदेश का लाभ दो लोगों को मिलेगा। ऐसे में फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर यह हत्याएं किसने की थीं..?
बात 29/30 दिसंबर वर्ष 1995, रात डेढ़ बजे की है। खैर कस्बे के मोहल्ला उपाध्याय में हमलावरों ने पहले मोहल्ले के नौबत सिंह की दो गोलियां मारकर हत्या की। इसके बाद यह हमलावर मोहल्ले के ही रत्ना सिंह व भूदेव को खोजते हुए उनके बाग पर गए और वहां जाकर उनकी गला रेतकर हत्या कर दी। इस दौरान इनके साथ बाग पर मौजूद परिवार की महिला चीखती-चिल्लाती रह गई।
विज्ञापन
इस संबंध में 31 दिसंबर को नौबत सिंह के भाई चंद्रपाल ने यह कहते हुए हत्या का नामजद मुकदमा दर्ज कराया कि रात को वह अपने भाई नौबत के साथ बाग से घर लौटा था और घर के दरवाजे पर पड़ी दो अलग-अलग चारपाइयों पर दोनों सो गए। तभी नामजद मोहल्ले के ही बनवारी, महेश व रोशन और उनके दो अज्ञात साथी हमलावर होकर आए। जिन्हें उसने पहचान लिया। यह तीनों नौबत की हत्या के बाद भूदेव व रत्ना को खोजते हुए उन्हें भी देख लेने की बात कहते हुए बाग पर गए। वह खुद उनके पीछे कुछ ग्रामीणों संग गया। जहां उन्होंने भूदेव व रत्ना की हत्या की। इस दौरान मारे डर के वह दूर से सब देखते रहे।
विज्ञापन
मुकदमे में हत्या के पीछे इस रंजिश का उल्लेख किया कि यह नामजद कहते हुए आए थे कि यह लोग हमारी पुलिस से मुखबिरी करते हैं। हम अगर जमानत आदि के लिए मदद की कहें तो जमानत लेने भी नहीं आते। इसलिए तीनों की हत्या की गई।
चंद्रपाल की तहरीर पर दर्ज मुकदमे में पुलिस ने तीनों नामजदों के अलावा एक अन्य नाम उजागर करते हुए चार्जशीट दायर कर दी। इस पर सत्र परीक्षण के दौरान 18 अगस्त 2004 को अपर सत्र न्यायालय ने चंद्रपाल की चश्मदीद गवाही को मजबूत साक्ष्य मानते हुए। रोशन, बनवारी और महेश को तीन हत्याओं में उम्र कैद की सजा सुना दी। बहरहाल, बनवारी, महेश और रोशन ने उम्रकैद की सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर दी। सुनवाई के दौरान रोशन की मौत हो गई। बनवारी और महेश में पहले महेश को जमानत मिल गई। पैसों के अभाव में बनवारी की पैरोकारी नहीं होने से अदालत ने उसको एक वकील मुहैया कराया। गुजरी 24 अगस्त को हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश खारिज कर आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया।
हाईकोर्ट ने पुलिस की उस दलील को मना जिसमें मौके पर एक चारपाई और एक बिस्तर मिलने का नक्शा और बयान दिया गया था। आरोपियों के बरी होने का आधार भी यही बना। अदालत ने माना कि जब एक चारपाई और बिस्तर मौके पर थे तो चंद्रपाल भी मौके का गवाह नहीं हो सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया। इस मामले में पैरवी हाईकोर्ट के अधिवक्ता जनार्दन प्रसाद त्रिपाठी व जितेंद्र सिंह ने की है।