{"_id":"5a85f4864f1c1ba5268ba55d","slug":"111518728326-aligarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"ख्वाज हलीम की पहले पेज की खबर की बचत-Aligarh","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
ख्वाज हलीम की पहले पेज की खबर की बचत-Aligarh
Updated Fri, 16 Feb 2018 02:28 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दीपक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़।
लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहने और विभिन्न उच्च पदों पर आसीन रहने के बाद भी ख्वाजा हलीम के कैरियर पर कोई दाग नहीं रहा। वह नैतिकता और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति की मिसाल रहे। यही कारण था कि समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे और मुलायम सिंह यादव स्वयं उनसे परामर्श किया करते थे। वह सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे।
1980 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बनने के अलावा वह कांग्रेस के जिलाध्यक्ष भी रहे। यूपी कांग्रेस के महासचिव रहे। साथ ही सपा और लोकदल में भी वह महासचिव रहे।
1989 में वह मुलायम सरकार में राज्यमंत्री के अलावा राज्य अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन भी थे। इसके अलावा यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड और यूपी हज कमेटी के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कोर्ट के सदस्य भी रहे।
विज्ञापन
यही नहीं सन 2002 और 2006 में यूपी विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य भी रहे। सन 2001-02 में वह यूपी विधान परिषद की वित्तीय और प्रशासनिक विलंब कमेटी, चिकित्सा और स्वास्थ्य स्टैंडिंग कमेटी और विशेषाधिकार व अपील कमेटी के सदस्य भी रहे।
वर्ष 2002-03 में यूपी विधान परिषद शैक्षिक संसदीय समिति के सदस्य रहे। इसी क्रम में वर्ष 2004 में आश्वासन समिति और पुनर्विचार समिति के चेयरमैन भी रहे। मुलायम सरकार में औद्योगिक विकास मंत्री रहे। उन्होंने उज्बेकिस्तान, रूस सहित कई देशों की यात्रा की। इतने लंबे राजनीतिक सफर में उनका दामन पूरी तरह बेदाग रहा। वह राजनीति में शुचिता की मिसाल थे।
आखिरी जिम्मेदारी पर्यटन सलाहकार की थी
राजनीति में बेहद उच्चशिक्षित और बुद्धिजीवी के रूप में जाने पहचाने जाने वाले ख्वाजा हलीम को पिछली बार सपा सरकार में पर्यटन सलाहकार की भूमिका दी गई थी। उस वक्त उन्होंने कहा था कि पर्यटन वही नहीं जो ताज महल और लाल किले पर है। मथुरा और वृंदावन में जो श्रद्धालु आते हैं वह भी धार्मिक पर्यटन हैं। इन धार्मिक पर्यटक स्थलों को संवारने की उनकी बड़ी योजना था, लेकिन सपा सरकार फिर से सत्ता में नहीं आ सकी और ख्वाजा हलीम को भी अपना पद छोड़ना पड़ा था।
नेहरू से रही हैं ख्वाजा परिवार की करीबियां
ख्वाजा हलीम का परिवार बेहद उच्च शिक्षित और सभी बड़े पदों पर हैं। ख्वाजा हलीम तीन भाई थे। सबसे बड़े वह स्वयं थे। उनके छोटे भाई ख्वाजा कमाल हैं। सबसे छोटे ख्वाजा शाहिद भारतीय लोक सेवा आयोग के चेयरमैन रहे हैं। इसके अलावा ख्वाजा शाहिद जामिया मिलिया इस्लामिया के रजिस्ट्रार और मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी के सह कुलपति भी रहे हैं।
उनके चाचा ख्वाजा जमाल न सिर्फ अलीगढ़ के पहले सांसद रहे, बल्कि वह पंडित जवाहर लाल नेहरू के बेहद करीबी थे। इस परिवार के रसूख का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ख्वाजा जमाल के पिता अब्दुल मजीद ख्वाजा का जिक्र पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भी किया है।
विदेश में नेहरू अब्दुल मजीद ख्वाजा के साथ पढ़ा करते थे। बाद में प्रधानमंत्री बनने पर पंडित नेहरू उनके काजीपाड़ा स्थित घर पर भी आए। मडराक के पास उनकी बहुत संपत्ति है। ख्वाजा का बड़प्पन यह रहा कि उन्हें अपने जन्मस्थान काजी पाड़ा की गलियों से गुजरने में भी उतना ही सहज लगता था जितना लखनऊ के कालिदास मार्ग से गुजरने में लगता था।
विज्ञापन
लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहने और विभिन्न उच्च पदों पर आसीन रहने के बाद भी ख्वाजा हलीम के कैरियर पर कोई दाग नहीं रहा। वह नैतिकता और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति की मिसाल रहे। यही कारण था कि समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे और मुलायम सिंह यादव स्वयं उनसे परामर्श किया करते थे। वह सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे।
1980 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बनने के अलावा वह कांग्रेस के जिलाध्यक्ष भी रहे। यूपी कांग्रेस के महासचिव रहे। साथ ही सपा और लोकदल में भी वह महासचिव रहे।
विज्ञापन
1989 में वह मुलायम सरकार में राज्यमंत्री के अलावा राज्य अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन भी थे। इसके अलावा यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड और यूपी हज कमेटी के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कोर्ट के सदस्य भी रहे।
विज्ञापन
यही नहीं सन 2002 और 2006 में यूपी विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य भी रहे। सन 2001-02 में वह यूपी विधान परिषद की वित्तीय और प्रशासनिक विलंब कमेटी, चिकित्सा और स्वास्थ्य स्टैंडिंग कमेटी और विशेषाधिकार व अपील कमेटी के सदस्य भी रहे।
वर्ष 2002-03 में यूपी विधान परिषद शैक्षिक संसदीय समिति के सदस्य रहे। इसी क्रम में वर्ष 2004 में आश्वासन समिति और पुनर्विचार समिति के चेयरमैन भी रहे। मुलायम सरकार में औद्योगिक विकास मंत्री रहे। उन्होंने उज्बेकिस्तान, रूस सहित कई देशों की यात्रा की। इतने लंबे राजनीतिक सफर में उनका दामन पूरी तरह बेदाग रहा। वह राजनीति में शुचिता की मिसाल थे।
आखिरी जिम्मेदारी पर्यटन सलाहकार की थी
राजनीति में बेहद उच्चशिक्षित और बुद्धिजीवी के रूप में जाने पहचाने जाने वाले ख्वाजा हलीम को पिछली बार सपा सरकार में पर्यटन सलाहकार की भूमिका दी गई थी। उस वक्त उन्होंने कहा था कि पर्यटन वही नहीं जो ताज महल और लाल किले पर है। मथुरा और वृंदावन में जो श्रद्धालु आते हैं वह भी धार्मिक पर्यटन हैं। इन धार्मिक पर्यटक स्थलों को संवारने की उनकी बड़ी योजना था, लेकिन सपा सरकार फिर से सत्ता में नहीं आ सकी और ख्वाजा हलीम को भी अपना पद छोड़ना पड़ा था।
नेहरू से रही हैं ख्वाजा परिवार की करीबियां
ख्वाजा हलीम का परिवार बेहद उच्च शिक्षित और सभी बड़े पदों पर हैं। ख्वाजा हलीम तीन भाई थे। सबसे बड़े वह स्वयं थे। उनके छोटे भाई ख्वाजा कमाल हैं। सबसे छोटे ख्वाजा शाहिद भारतीय लोक सेवा आयोग के चेयरमैन रहे हैं। इसके अलावा ख्वाजा शाहिद जामिया मिलिया इस्लामिया के रजिस्ट्रार और मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी के सह कुलपति भी रहे हैं।
उनके चाचा ख्वाजा जमाल न सिर्फ अलीगढ़ के पहले सांसद रहे, बल्कि वह पंडित जवाहर लाल नेहरू के बेहद करीबी थे। इस परिवार के रसूख का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ख्वाजा जमाल के पिता अब्दुल मजीद ख्वाजा का जिक्र पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भी किया है।
विदेश में नेहरू अब्दुल मजीद ख्वाजा के साथ पढ़ा करते थे। बाद में प्रधानमंत्री बनने पर पंडित नेहरू उनके काजीपाड़ा स्थित घर पर भी आए। मडराक के पास उनकी बहुत संपत्ति है। ख्वाजा का बड़प्पन यह रहा कि उन्हें अपने जन्मस्थान काजी पाड़ा की गलियों से गुजरने में भी उतना ही सहज लगता था जितना लखनऊ के कालिदास मार्ग से गुजरने में लगता था।