यूपी चुनाव 2022 : आगरा में आसान नहीं डगर पनघट की, दलित बहुल ग्रामीण विधान सभा क्षेत्र में मुश्किलों से पार पाना होगा
क्षेत्रीय विधायक को लेकर अजीजपुर निवासी प्रेम सिंह सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं, विधायक ने कोई काम नहीं कराया है। काम तो छोड़िए, पांच साल तक क्षेत्र में दिखाई नहीं दीं। रंगोली कॉलोनी के प्रदीप चाहर अपना सवाल अलग तरीके से रखते हैं। वे कहते हैं, आगरा ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र दो पाटों में फंसा हुआ है।
विस्तार
दलित बहुल ग्रामीण विधान सभा क्षेत्र को आगरा की हंसली (गले का हार) भी कहा जाता है। शहरी सीमा से सटे गांव इसमें शामिल हैं। 2012 में अस्तित्व में आई इस सीट पर 2017 में भाजपा की हेमलता दिवाकर ने मोदी लहर में बसपा के कालीचरन सुमन को 65,296 मतों के अंतर से हराया था। मौजूदा विधायक के प्रति जनता की नाराजगी का फीडबैक मिलने के बाद भाजपा ने हेमलता दिवाकर का टिकट काट कर उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल बेबीरानी मौर्य पर दांव लगाया है।
बसपा ने यहां किरन प्रभा केसरी को उतारा है, तो सपा-रालोद गठबंधन ने महेश जाटव को। कांग्रेस ने यहां पुराने चेहरे उपेंद्र सिंह को टिकट दिया है। वे यहां से पहले भी दो बार चुनाव लड़ चुके हैं। बेबीरानी मौर्य भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं। बड़ा चेहरा हैं। पर, उनके सामने अपनी ही विधायक के प्रति उपजी नाराजगी को दूर करने की भी चुनौती है।
इस सीट की आबादी में सबसे ज्यादा सवा लाख दलित मतदाता हैं। एक लाख से अधिक मुस्लिम, यादव, कुशवाह मतदाता भी हैं। सुरक्षित सीट होने से यहां सभी उम्मीदवार दलित हैं। ऐसे में बहुतायत दलित किधर रुख करते हैं, यह मायने रखता है। बहुतायत दलितों के साथ ही जो अन्य जातियों के मतदाताओं को अपने पाले में लाने में कामयाब हो गया, जीत उसी की होगी।
मुद्दों पर मुखर हैं मतदाता
अब बातें मतदाताओं के दिल की। क्षेत्रीय विधायक को लेकर अजीजपुर निवासी प्रेम सिंह सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं, विधायक ने कोई काम नहीं कराया है। काम तो छोड़िए, पांच साल तक क्षेत्र में दिखाई नहीं दीं। रंगोली कॉलोनी के प्रदीप चाहर अपना सवाल अलग तरीके से रखते हैं। वे कहते हैं, आगरा ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र दो पाटों में फंसा हुआ है। एक तरफ गांव हैं, तो दूसरी तरफ शहर। यहां विकास कार्य बमुश्किल हो पाते हैं।
विधायक का ध्यान गांवों की ओर रहता है। नगला जयराम की रामवती देवी कहती हैं, बरसों से पीवे को पानी नाय, जा तरफ कोऊ नै ध्यान ना दयौ। रामवती के ये शब्द बता देते हैं कि यहां पेयजल की कितनी किल्लत है। सरला देवी कहती हैं, शौचालय बनवा दिए मगर पानी नहीं है। हैंडपंप सूखे हैं। चुनावों की बात छिड़ते ही किसान विजय सिंह झुंझला कर कहते हैं, नील गाय और छुट्टा पशुओं की समस्या से किसान परेशान हैं।
नहरों में पानी नहीं आता है। नेताजी तो चुनाव में आते हैं, मगर गांव के लोग तो हर रोज इन समस्याओं से जूझते हैं। बाईंपुर के रोहतान सिंह कहते हैं, पानी की निकासी नहीं है। इस समस्या से लंबे समय से जूझ रहे हैं। श्यामवीर यादव का कहना है कि रोजगार के लिए पहल होनी चाहिए। उद्योग और फैक्ट्रियां हों, तो युवाओं को रोजगार मिल सके। पर, पिछले पांच साल में ऐसा कुछ नहीं हुआ।
कद-प्रतिष्ठा लगी है दांव पर
- बेबीरानी मौर्य, भाजपा
- महेश जाटव, सपा-रालोद
- किरन प्रभा केसरी, बसपा
- उपेंद्र सिंह, कांग्रेस
2017 का परिणाम
- हेमलता दिवाकर, भाजपा 1,29,887
- कालीचरण सुमन, बसपा 64,591
- उपेंद्र सिंह, कांग्रेस 31,312
- नारायण सिंह सुमन, रालोद 17,446
प्रत्याशी बदला, पर सवाल अब भी पीछा कर रहे
भाजपा ने यहां की विधायक के प्रति नाराजगी को लेकर प्रत्याशी तो बदल दिया, पर नाराजगी के सवाल अब भी पीछा कर रहे हैं। सबसे ज्यादा सवाल विधायक के पांच साल दिखाई नहीं देने को लेकर है। नाराजगी का आलम ये रहा है कि सिरौली, अजीजपुर में लोगों ने विधायक लापता के पोस्टर लगाए थे।
छावनी सीट पर भी पड़ता है प्रभाव
ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र की सीमाएं छावनी और खेरागढ़ विधानसभा क्षेत्र से सटी हुई हैं। ग्रामीण की तरह छावनी सीट भी दलित बहुल है, जबकि खेरागढ़ में जाट, क्षत्रिय व कुशवाह मतदाता अधिक हैं। ग्रामीण सीट का असर छावनी विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है, लेकिन खेरागढ़ में अधिक असर नहीं होता। इस बार भी इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में पुराने मुद्दे हैं। हालांकि, छावनी विधानसभा क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा शहर में होने के कारण यहां शहरी क्षेत्र के ही मुद्दे रहते हैं।