आगरा: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने किया कोविड डायग्नोसिस फैसिलिटी लैब का उद्घाटन
- आगरा के जालमा संस्थान में अब कोविड जांच के साथ शोध भी
- पहले केवल टीबी की हो रही थी जांच, अब कोविड-19 की जांच भी हो रही
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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने शनिवार को आगरा के जालमा संस्थान के देसिकन भवन और कोविड डायग्नोसिस फैसिलिटी लैब के उद्घाटन किया। इस मौके पर केंद्रीय मंत्री स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि लॉकडाउन में कोरोना महामारी से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने संसाधन तैयार किए। शुरू में कोरोना की जांच के लिए पुणे में ही एकमात्र लैब थी। लेकिन अब 2,400 से अधिक लैब हैं, रोजाना 13 लाख नमूनों की जांच की क्षमता है।
उन्होंने कहा कि लॉकडाउन में 37 हजार वेंटीलेटर, चार करोड़ एन-95 मास्क, 1.75 करोड पीपीई किट तैयार किए गए। 200 देशों को हाइड्रोक्लोरोक्वीन दवा भेजी गईं। आईसीएमआर के विज्ञानियों ने अकल्पनीय तेजी से दो कंपनी की सबसे पहले वैक्सीन बना दी।
स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि अब तक 1.95 करोड़ लोगों को टीका लग चुका है, इनमें से 1.60 करोड़ को पहली और 35 लाख को दूसरी डोज लगी है। स्थिति यह है कि कोरोना के 1.11 करोड़ मरीज में से 1.8 करोड़ ठीक हो चुके हैं। ठीक होने की दर 97 फीसदी से अधिक है, मौत की दर 1.41 फीसदी ही है, जो कई देशों से बेहतर है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि शुरुआती महीने में आगरा में 14 संक्रमित मिले। उस वक्त उत्तर भारत में आगरा की स्थिति सबसे खतरनाक थी। यहां के प्रशासन, डॉक्टरों के साथ सामंजस्य बनाकर व्यवस्थाएं सुधारी गईं।
सवाल उठाने वाले भी लगवा रहे वैक्सीन
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हमारे विज्ञानियों ने सबसे कम समय में वैक्सीन बनाई तो तमाम राजनीतिक दलों ने अफवाहें फैलाईं। लेकिन अब नतीजा सामने है, विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत दुनियाभर ने प्रधानमंत्री की सराहना की है। जो वैक्सीन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते थे, वह भी वैक्सीन लगवा रहे हैं।
'संस्थान ने लंबा सफर तय किया'
संस्थान के निदेशक डॉ. श्रीपद पाटिल के कहा कि एक समय राष्ट्रीय जालमा कुष्ठ एवं अन्य माइक्रोबैक्टीरियल संस्थान में अब कोविड जांच और विभिन्न बीमारियों पर शोध भी किया जा रहा है। कुष्ठ रोग से इलाज की शुरुआत के बाद संस्थान ने एक लंबा सफर तय किया है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1963 में संस्थान की नींव रखी गई थी। यह तीन साल में तैयार हुआ। वर्ष 1976 को इसे भारतीय चिकित्सकों के सुपुर्द कर दिया गया। तब सिर्फ कुष्ठ रोग का ही इलाज होता था, अब टीबी का इलाज, कोविड जांच और शोध कार्य भी हो रहे हैं। नए अनुसंधान भवन देसिकन में विभिन्न बीमारियों पर शोध कार्य हो सकेगा।
साइकिल से गांव-गांव जाकर खोजते थे मरीज
कार्यक्रम को संस्थान के पहले भारतीय निदेशक रहे डॉ. केवी देसीकन ने भी संबोधित किया। डॉ. देसीकन के नाम पर ही नया भवन है। उन्होंने बताया कि वह 10 साल तक संस्थान के निदेशक रहे। मूल रूप से वह कर्नाटक के रहने वाले हैं और कुष्ठ रोगियों को पहले घृणा की दृष्टि से देखते थे।
जिम्मेदारी आने पर वह रोजाना साइकिल लेकर गांव-गांव जाकर कुष्ठ रोगियों को खोजते और इलाज करते, लोगों को जागरूक भी करते थे। केंद्रीय मंत्री ने उनको स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। पूर्व निदेशक डॉ. वेद भारद्वाज और डॉ. यूडी गुप्ता को भी सम्मानित किया गया।