शहर को स्मार्ट सिटी बनाने के ये तीन फार्मूले भूले अधिकारी
शहर को स्मार्ट बनाने को लेकर कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। तय समय-सीमा में शहर को स्मार्ट बनाने का लक्ष्य है। इसके लिए अधिकारियों को भी स्मार्ट होना होगा। उन्हें काम में भी स्मार्टनेस दिखानी होगी। शहर को स्मार्ट बनाने के लिए पूर्व मुख्य सचिव ने तीन बिंदुओं पर फोकस किया था। उनके रिटायर होने से पहले ही इन बिंदुओं पर काम करना मुश्किल हो रहा था। उनके रिटायर होते ही अधिकारी पूरी तरह से फार्मूले को भूल गए। इसके परिणाम आगरा में सामने आने लगे हैं। स्मार्ट सिटी पर भी सरकारी कामकाज के तरीकों का ग्रहण लगना शुरू हो गया। कामों में लेटलतीफी, गुणवत्ता की कमी दिखने लगी है।
शहर में स्मार्ट सिटी का एक भी काम समय-सीमा में पूरा नहीं किया जा सका है। अधिकांश काम लेट हैं। आगरा को स्मार्ट सिटी में सितंबर 2016 में शामिल किया गया। लगभग दो साल बीतने को हैं, लेकिन अब तक स्मार्ट सिटी का काम कागजों पर ही चल रहा है। कई योजनाओं की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) ही बन बिगड़ रही है। कुछ प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हुआ, लेकिन सरकारी विभागों की अड़चनें आई और काम रोक दिए गए। स्मार्ट सिटी का काम 5 साल की तय समय-सीमा में पूरे करने हैं।
इसे देखते हुए ही तत्कालिक मुख्य सचिव राजीव कुमार ने स्मार्ट सिटी पर एक बैठक की थी। उन्होंने स्मार्ट सिटी को बनाने के लिए तीन बिंदुओं पर फोकस किया था। ये समयबद्धता, प्रयोगिकता और मेजरमेंट थे। उनके कार्यकाल के दौरान ही इन पर काम करना मुश्किल हो रही थी। उनके जाते ही अधिकारी पूरी तरह से भूल गए। इसका नजीजा सामने है कि स्मार्ट सिटी के एक भी काम दो साल में पूरे नहीं हो सके हैं।
समयबद्धताः प्रोजेक्ट में सभी कार्यों की समय-सीमा तय हो। जैसे एडीबी (एरिया बेस्ड डेवलपमेंट) में ताजगंज एरिया को लिया गया है। इसमें भी सबसे पहले रिट्रोफिटिंग काम करना है। इसे तय समय-सीमा में ही खत्म किया जाए।
प्रायोगिकताः शहर की भौगोलिक, सामाजिक और संस्कृति को देखते हुए विकास करना, न कि दूसरे देशों या राज्यों के अनुरूप स्मार्ट सिटी बनाना है।
मेजरमेंटः स्मार्ट सिटी में ऐसे काम करने हैं, जिनका मेजरमेंट (नापतौल) हो सके। इससे गुणवत्ताऔर कार्य की पहचान हो सके। ये विकास कार्य में करने होंगे।
पहली ही सीढ़ी में फेल
स्मार्ट सिटी बनने को लेकर पहले ही फार्मूले पर आगरा स्मार्ट सिटी लिमिटेड फेल हो गया है। स्मार्ट सिटी में शामिल होने को दो साल बीत रहे हैं लेकिन धरातल में एक भी काम पूरे नहीं हो सके हैं। अभी-भी कामकाज कागजों पर ही चल रहा है। ऐसे में पांच साल में कामों को पूरा करना चुनौती है।