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‘वे’ पुरखों की कब्र सहेज रहे, हम आजादी दिलाने वालों को ही भूले

Tue, 10 May 2016 01:34 AM IST
अमर उजाला आगरा
अमर उजाला आगरा Updated Tue, 10 May 2016 01:34 AM IST
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They're saving the tomb of the patriarchs, We forget those who gave  us freedom
‘वे’ पुरखों की कब्र सहेज रहे, हम आजादी दिलाने वालों को ही भूले - फोटो : Amar Ujala
10 मई 1857, अंग्रेजों की खिलाफ क्रांति की पहली चिंगारी मेरठ में इसी दिन भड़की और देखते ही देखते पूरे हिंदुस्तान में ज्वाला में बदल गई। तब से शुरू हुई जंगे आजादी में शहीद हुए राष्ट्रसपूतों के स्मारक को हम ढंग से सहेज नहीं पा रहे, वहीं 1857 के संघर्ष में जो अंग्रेज मारे गए थे, उनके वंशज के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार उनकी कब्रों को सहेजने की योजना बना रही है। 
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आगरा छावनी क्षेत्र स्थित गोरा कब्रिस्तान में एक हजार से ज्यादा कब्रें हैं। इसमें 17 वीं सदी में भारत आए अंग्रेजों के अलावा 62 कब्रें फर्स्ट वर्ल्ड वार में मारे गए अंग्रेज सिपाहियों की हैं। बाकी उन अंग्रेज अफसरों की हैं जो 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मारे गए। सीडब्ल्यूवीसी (कॉमनवेल्थ वार ग्रेव कमीशन) इनकी देखरेख करता है। इसके उलट संजय प्लेस में बना शहीद स्मारक सरकारी उपेक्षा का शिकार है। जहां ब्रिटिश सरकार अंग्रेजों की कब्रों के संरक्षण पर इनके वंशजों की स्वयंसेवी संस्था और मिशनरियों की मदद ले रही है, वहीं शहीद स्मारक के सुंदरीकरण की योजना तीन साल से लटकी हुई है।
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आगरा ज्वाइंट सेमेट्री कमेटी के सचिव माइकल सिल्वेरा के मुताबिक कब्रों के रखरखाव के संबंध में मीटिंग होनी है। इसी में कब्रिस्तान की सफाई, जगह की कमी पर चर्चा के अलावा और क्या होना है, तय होगा।
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कब्र तलाशने न्यू जर्सी से आए
जिन ब्रिटिश अधिकारियों को गोरा कब्रिस्तान में दफनाया गया है उनके वंशज सात समंदर पार से उनकी कब्र की तलाश में 6 महीने पहले न्यू जर्सी से आगरा आए थे। यह 16 सदस्यीय दल घंटों मशक्कत के बाद दो कब्रों की पहचान कर सका था। इसके बाद ही संरक्षण की कवायद शुरू हुई।  

पुरखों की निशानी तलाशने आते हैं 
भारत आने वाले ब्रिटिश पर्यटकों में बड़ी संख्या में वे होते हैं जिन्हें अपने पुरखों की निशानी (कब्र आदि) की तलाश होती है। पर्यटन से जुड़े लोग बताते हैं कि 1857 में मारे गए अंग्रेजों के रिकार्ड सरकार व्यवस्थित कर ले तो मेरठ, झांसी, आगरा और कानपुर के क्रांतिस्थल नया टूरिस्ट सर्किट बन सकते हैं। एप्रूव्ड गाइड एसोसिएशन अध्यक्ष शमशुद्दीन यह रिकार्ड यूपी टूरिज्म की वेबसाइट पर डालने की सलाह देते हैं। ऐसे पर्यटकों के लिए कोलोनियल वॉक आयोजित करने वाले जेपी सिंह बताते हैं कि ये क्रांति स्थल ब्रिटिश पर्यटकों को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। 


शहीद स्मारक का हाल यह
तालों में इतिहास, तस्वीरों पर धूल
आगरा। अमर शहीदों की याद में संजय प्लेस में बने शहीद स्मारक में शहीदों से जुड़ी किताबें ताले में बंद हैं। पुस्तकालय बंद है। पाठक आते हैं तो मैगजीन भर मिलती है। एक कमरे में शीदों के चित्र लगे हैं। इन पर धूल जाने कब से साफ नहीं हुई है। स्मारक परिसर में गंदगी फैली है। अमर उजाला ने मुद्दा उठाया था तो समाजसेवियों की पहल पर तमाम अव्यवस्थाएं दूर की गई थीं। एडीए ने स्मारक को इसे सीधे एमजी रोड से जोड़ने के लिए बंद पड़े फव्वारों की जगह लैंडस्कैपिंग की योजना बनाई थी पर कोई काम नहीं हुआ। नतीजा फव्वारे चलते नहीं। वहां कूड़ा इकट्ठा होता रहता है।  

नगर निगम और एडीए भी स्मारक पर नियमित ध्यान नहीं दे रहा है। इसकी वजह से तमाम योजनाएं मूर्तरूप नहीं ले पा रही हैं।
- धमेंद्र यादव, सदस्य, सरदार भगत सिंह शहीद स्मारक समिति
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