अपराजिता: खेल के जुनून से बदल दी लोगों की सोच, पढ़िए ताजनगरी की इन बेटियों की कहानी
लड़कियां मैदान में नहीं, घर में अच्छी लगती हैं। लोगों की इस धारणा को बदलने की वर्षों पहले ताजनगरी की महिला खिलाड़ियों ने कसम खाई और बदल दिया।
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आगरा में जिला स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक खेल में पहचान बनाने वाली इन महिला खिलाड़ियों की उपलब्धि पर अब वो भी तालियां बजाते हैं, जो कभी लड़कियों के मैदान में खेलने के खिलाफ रहा करते थे। इन महिला खिलाड़ियों ने अपने जुनून और कड़ी मेहनत से साबित किया कि वह अपराजिता हैं।
मेघा शर्मा: तानों की परवाह नहीं की, बस खेली
सन 2018-19 के सीजन में अरुणाचल प्रदेश से अंडर-19 वुमेंस ट्रॉफी के लीग मैचों में सर्वाधिक 349 रन बनाने वालीं बल्केश्वर निवासी क्रिकेटर मेघा शर्मा ने कभी उन बातों पर ध्यान नहीं दिया, जो उन्हें खेलने से रोकतीं। मेघा बताती हैं कि मेरा मकसद शुरू से यह रहा कि मैं जो भी करूं पूरी लगन से करूं।
परिवार के सहयोग से कोचिंग शुरू हुई। कोच फिरोज खान ने कहा कि अगर लोगों की बातों पर ध्यान दोगी, तो उसी में उलझ जाओगी। यह सूत्र मन में रख लिया और बल्ले से रन बनाकर लोगों की सोच को बदला। आगे बढ़ने की ठानी है और मैं रुकने वाली नहीं।
पूजा कुमारी: मैं राज्य के स्तर पर खेली तो सोच बदल गई
चार से अधिक बार राज्य स्तरीय हॉकी चैंपियनशिप और एक बार स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया में खेलने वाली पूजा कुमारी ने उन लोगों की कभी परवाह नहीं की जो लड़कियों को मैदान का हिस्सा नहीं मानते थे। पूजा का कहना है कि मेरा लक्ष्य सिर्फ खेलना था।
आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के बाद भी मेरे पापा ने कभी मेरे खेल को नहीं रुकने दिया। मां गीता कुमारी ने हमेशा मुझे समझाया कि लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दो। सिर्फ खेल पर ध्यान दो। जिस दिन मैंने पहली बार स्टेट खेला, लोगों की मेरे प्रति सोच बदल गई।
डॉ. अलका शर्मा: छुपकर खेलती रही पर हार नहीं मानी
सात सौ से अधिक टेबिल टेनिस खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दे चुकीं बालाजीपुरम, शाहगंज निवासी टीटी खिलाड़ी डॉ. अलका शर्मा का खेल को लेकर इस कदर जुनून था कि लोग टोकते तो वह छुपकर टेबिल टेनिस की प्रैक्टिस करती थी। जब उनके पिता कैलाश नाथ शर्मा को इस बारे में पता चला तो उन्होंने अलका का आगे बढ़ने में साथ दिया।
वर्ष 2005-06 में हैदराबाद में हुई नेशनल वेटरन्स टीटी चैंपियनशिप में 40 प्लस में ब्रॉन्ज मेडल विजेता अलका का कहना है कि उन्होंने ठान रखा था कि चाहे कुछ भी हो जाए लोगों की धारणा बदल कर रहूंगी। पहली बार जब 11 साल की उम्र में मैंने मेडल जीता, उस समय उन्हीं लोगों ने मेरी तारीफ की जो युवतियों के खेलने को ठीक नहीं मानते थे।