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नम आंखों से दी शहीद धर्मेंद्र को अंतिम विदाई
नम आंखों से दी शहीद धर्मेंद्र को अंतिम विदाई
Updated Thu, 24 Nov 2016 12:05 AM IST
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नम आंखों से दी शहीद धर्मेंद्र को अंतिम विदाई
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते हुए मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर देने वाले लोहकरेरा गांव के वीर सपूत धर्मेंद्र को अंतिम विदाई देने के लिए जन सैलाब उमड़ पड़ा। आस पास के गांवों समेत शहर से भी बड़ी संख्या में लोग अंत्येष्टि में पहुंचे। हर किसी की आंख नम थी और जुबां पर धर्मेंद्र की बहादुरी का किस्सा था। अंत्येष्टि स्थल पर गूंज रहा था जब तक सूरज चांद रहेगा, धर्मेंद्र तेरा नाम रहेगा।
शहीद धर्मेंद्र सिंह (37) का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह आठ बजे घर पहुंचने की जानकारी होते ही इलाके के लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़े। घर में उनकी बूढ़ी मां सिया देवी, पत्नी ममता, दो बेटियां कृष्णा और खुशी का रो-रोकर बुरा हाल था। अंतिम संस्कार के लिए तिरंगे में लिपटा शहीद का शव लेकर सेना के जवान खेतों की ओर चले। उनके साथ सैकड़ों युवा राष्ट्रध्वज लेकर चल दिए। अंत्येष्टि स्थल पर गांव अटूस, पनवारी, लोहकरेरा, नागर, खड़वाई, रुनकता, भिलावटी आदि गांवों के बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। करीब 11 बजे धर्मेंद्र के गोद लिए बेटे जीतेंद्र उर्फ जीतू ने चिता को मुखाग्नि दी। इस दौरान हर किसी की आंख नम हो गईं।
धर्मेंद्र सिंह 152 एडी रेजीमेंट में हवलदार के पद पर श्रीनगर में तैनात थे। उनके पार्थिव शरीर के साथ श्रीनगर से आए सूबेदार दुष्यंत सिंह, नायब सूबेदार राजपाल सिंह, हवलदार ऋषिपाल, हवलदार प्रवीन कुमार, हवलदार विजय सिंह ने बताया कि धर्मेंद्र सिंह बहुत बहादुर सिपाही थे। वह आतंकवादियों से लोहा लेते समय वीरगति को प्राप्त हुए।
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धर्मेंद्र सिंह 1996 में सेना में भर्ती हुए थे। उनके सेवानिवृत्ति होने में 16 माह ही बचे थे। वह अपने चाचा छत्रपाल की त्रयोदशी संस्कार में शामिल होकर छह नवंबर को ही गांव से श्रीनगर गए थे। चचेरी बहन संजू की 12 दिसंबर की शादी में शामिल होने के लिए उन्हें तीन दिसंबर को गांव आना था।
उधर, शहीद की अंतिम विदाई के समय सांसद चौधरी बाबूलाल के पुत्र रामेश्वर सिंह, ब्लाक प्रमुख के पति चौधरी महाराज सिंह, विधायक ठाकुर सूरजपाल सिंह, राजकुमार चाहर, चौधरी उदयभान सिंह, पूर्व जिलाध्यक्ष भाजपा अशोक राणा, जितेंद्र फौजदार, सपा जिलाध्यक्ष रामसहाय यादव, रामनिवास शर्मा, रालोद जिलाध्यक्ष बृजेश चाहर, मोहन सिंह चाहर, बनैसिंह पहलवान आदि मौजूद रहे।
पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगे
लोहकरेरा गांव में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगे। लोगों ने सरकार से मांग की कि वह धर्मेंद्र की शहादत का बदला पाकिस्तान से ले। उसे ऐसा सबक सिखाए कि वह आतंकवाद की नीति ही छोड़ दे।
मुआवजे की घोषणा में देरी, एक घंटे रुकी रही अंत्येष्टि
अछनेरा / रुनकता। लोहकरेरा गांव पहुंचे कुछ नेताओं ने प्रशासन से शहीद के परिवारीजनों के लिए मुआवजे की राशि घोषित कराने की मांग की। वहां मौजूद उपजिलाधिकारी अजीत कुमार सिंह ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। इससे लोग नाराज हो गए। उन्होंने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को रोक दिया। लगभग एक घंटे बाद मौके पर पहुंचे सीडीओ नागेंद्र प्रताप सिंह ने शासन स्तर से 20 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दिलाने का आश्वासन दिया। तब लगभग 11 बजे शहीद के गोद लिए बेटे जीतेंद्र उर्फ जीतू ने चिता को मुखाग्नि दी।
उधर, शहीद के अंत्येष्टि स्थल को लेकर सुबह से ही मतभेद शुरू हो गया था। प्रशासन की ओर से ग्राम समाज की जमीन का प्रस्ताव रुनकता-किरावली मार्ग के समीप किया गया। लेकिन परिवारीजनों ने अपने खेत में अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। बाद में अंत्येष्टि यहीं पर की गई। उधर, शहीद को अंतिम विदाई देने पहुंचे कुछ नेताओं ने आर्थिक सहायता देने की घोषणा की तो वहां मौजूद कुछ लोग ताली बजाने लगे। इस एएसपी अनुराग वत्स ने कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि यह मौका ताली बजाने का नहीं है। उधर, डीएम और एसएसपी के नहीं पहुंचने पर लोगों ने विरोध जताया। भाजपा नेता मोहन सिंह चहार ने कहा कि हर शहीद की अंतिम यात्रा में जिले के डीएम और एसएसपी भी सलामी देने पहुंचते हैं। लेकिन यहां वे नहीं आए। उन्हें आना चाहिए था।
उधर, भाजपा नेता चौधरी रामेश्वर सिंह ने शहीद के गांव लोहकरेरा से पनवारी के बीच बन रहे मार्ग का नाम शहीद धर्मेंद्र सिंह के नाम पर रखे जाने की मांग की है। ब्लाक प्रमुख के पति महाराज सिंह ने शहीद के गांव से शहीद स्थल तक खड़ंजा बनवाने की घोषणा की है।
पिता ने लड़ी थी 1971 की लड़ाई
शहीद धर्मेंद्र सिंह के पिता बदले सिंह भी फौज से रिटायर्ड हैं। उन्होंने 1971 की जंग लड़ी थी। चाचा विजय सिंह के पुत्र सुनील एयरफोर्स में हैं। जबकि दूसरे चाचा विजेंद्र सिंह के पुत्र भी सेना में हैं। अटूस की प्रधान के पति मुरारीलाल छौंकर ने बताया कि अटूस, पनवारी, लोहकरेरा तीन गांवों के एक हजार से अधिक युवक मौजूदा समय में सेना में हैं। लोहकरेरा निवासी फौरन सिंह के पांच और रोहन सिंह के चार बेटे सेना में हैं।
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शहीद धर्मेंद्र सिंह (37) का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह आठ बजे घर पहुंचने की जानकारी होते ही इलाके के लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़े। घर में उनकी बूढ़ी मां सिया देवी, पत्नी ममता, दो बेटियां कृष्णा और खुशी का रो-रोकर बुरा हाल था। अंतिम संस्कार के लिए तिरंगे में लिपटा शहीद का शव लेकर सेना के जवान खेतों की ओर चले। उनके साथ सैकड़ों युवा राष्ट्रध्वज लेकर चल दिए। अंत्येष्टि स्थल पर गांव अटूस, पनवारी, लोहकरेरा, नागर, खड़वाई, रुनकता, भिलावटी आदि गांवों के बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। करीब 11 बजे धर्मेंद्र के गोद लिए बेटे जीतेंद्र उर्फ जीतू ने चिता को मुखाग्नि दी। इस दौरान हर किसी की आंख नम हो गईं।
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धर्मेंद्र सिंह 152 एडी रेजीमेंट में हवलदार के पद पर श्रीनगर में तैनात थे। उनके पार्थिव शरीर के साथ श्रीनगर से आए सूबेदार दुष्यंत सिंह, नायब सूबेदार राजपाल सिंह, हवलदार ऋषिपाल, हवलदार प्रवीन कुमार, हवलदार विजय सिंह ने बताया कि धर्मेंद्र सिंह बहुत बहादुर सिपाही थे। वह आतंकवादियों से लोहा लेते समय वीरगति को प्राप्त हुए।
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धर्मेंद्र सिंह 1996 में सेना में भर्ती हुए थे। उनके सेवानिवृत्ति होने में 16 माह ही बचे थे। वह अपने चाचा छत्रपाल की त्रयोदशी संस्कार में शामिल होकर छह नवंबर को ही गांव से श्रीनगर गए थे। चचेरी बहन संजू की 12 दिसंबर की शादी में शामिल होने के लिए उन्हें तीन दिसंबर को गांव आना था।
उधर, शहीद की अंतिम विदाई के समय सांसद चौधरी बाबूलाल के पुत्र रामेश्वर सिंह, ब्लाक प्रमुख के पति चौधरी महाराज सिंह, विधायक ठाकुर सूरजपाल सिंह, राजकुमार चाहर, चौधरी उदयभान सिंह, पूर्व जिलाध्यक्ष भाजपा अशोक राणा, जितेंद्र फौजदार, सपा जिलाध्यक्ष रामसहाय यादव, रामनिवास शर्मा, रालोद जिलाध्यक्ष बृजेश चाहर, मोहन सिंह चाहर, बनैसिंह पहलवान आदि मौजूद रहे।
पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगे
लोहकरेरा गांव में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगे। लोगों ने सरकार से मांग की कि वह धर्मेंद्र की शहादत का बदला पाकिस्तान से ले। उसे ऐसा सबक सिखाए कि वह आतंकवाद की नीति ही छोड़ दे।
मुआवजे की घोषणा में देरी, एक घंटे रुकी रही अंत्येष्टि
अछनेरा / रुनकता। लोहकरेरा गांव पहुंचे कुछ नेताओं ने प्रशासन से शहीद के परिवारीजनों के लिए मुआवजे की राशि घोषित कराने की मांग की। वहां मौजूद उपजिलाधिकारी अजीत कुमार सिंह ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। इससे लोग नाराज हो गए। उन्होंने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को रोक दिया। लगभग एक घंटे बाद मौके पर पहुंचे सीडीओ नागेंद्र प्रताप सिंह ने शासन स्तर से 20 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दिलाने का आश्वासन दिया। तब लगभग 11 बजे शहीद के गोद लिए बेटे जीतेंद्र उर्फ जीतू ने चिता को मुखाग्नि दी।
उधर, शहीद के अंत्येष्टि स्थल को लेकर सुबह से ही मतभेद शुरू हो गया था। प्रशासन की ओर से ग्राम समाज की जमीन का प्रस्ताव रुनकता-किरावली मार्ग के समीप किया गया। लेकिन परिवारीजनों ने अपने खेत में अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। बाद में अंत्येष्टि यहीं पर की गई। उधर, शहीद को अंतिम विदाई देने पहुंचे कुछ नेताओं ने आर्थिक सहायता देने की घोषणा की तो वहां मौजूद कुछ लोग ताली बजाने लगे। इस एएसपी अनुराग वत्स ने कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि यह मौका ताली बजाने का नहीं है। उधर, डीएम और एसएसपी के नहीं पहुंचने पर लोगों ने विरोध जताया। भाजपा नेता मोहन सिंह चहार ने कहा कि हर शहीद की अंतिम यात्रा में जिले के डीएम और एसएसपी भी सलामी देने पहुंचते हैं। लेकिन यहां वे नहीं आए। उन्हें आना चाहिए था।
उधर, भाजपा नेता चौधरी रामेश्वर सिंह ने शहीद के गांव लोहकरेरा से पनवारी के बीच बन रहे मार्ग का नाम शहीद धर्मेंद्र सिंह के नाम पर रखे जाने की मांग की है। ब्लाक प्रमुख के पति महाराज सिंह ने शहीद के गांव से शहीद स्थल तक खड़ंजा बनवाने की घोषणा की है।
पिता ने लड़ी थी 1971 की लड़ाई
शहीद धर्मेंद्र सिंह के पिता बदले सिंह भी फौज से रिटायर्ड हैं। उन्होंने 1971 की जंग लड़ी थी। चाचा विजय सिंह के पुत्र सुनील एयरफोर्स में हैं। जबकि दूसरे चाचा विजेंद्र सिंह के पुत्र भी सेना में हैं। अटूस की प्रधान के पति मुरारीलाल छौंकर ने बताया कि अटूस, पनवारी, लोहकरेरा तीन गांवों के एक हजार से अधिक युवक मौजूदा समय में सेना में हैं। लोहकरेरा निवासी फौरन सिंह के पांच और रोहन सिंह के चार बेटे सेना में हैं।